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शख्सियत: सार्थक और प्रगतिशील सिनेमा का सारथी बिमल राय

1953 में आई ‘दो बीघा जमीन’ ने दुनिया भर के फिल्मकारों का ध्यान अपनी ओर खींचा था। बिमल दा के निर्देशन में बनी इस फिल्म से भारत में सार्थक, रचनात्मक और प्रगतिशील सिनेमा का न सिर्फ एक सघन दौर शुरू हुआ बल्कि फिल्म निर्माण की ऐसी संस्कृति का विकसित हुई जिसमें सिनेमा, साहित्य और समाज तीनों एक-दूसरे के सर्वाधिक करीब आए।

Author Published on: July 12, 2020 4:38 AM
समाज के लिए सार्थक सिनेमा बनाने वाले महान फिल्मकार बिमल राय।

सिनेमा और समाज के साझे को बुनने वाली कला की जब भी बात होगी तो बिमल राय का जिक्र जरूर होगा। वे एक ऐसे फिल्मकार रहे जिन्होंने हिंदुस्तानी सिनेमा के साथ हॉलीवुड तक को भी प्रेरित-प्रभावित किया। वे अपने नजरिए में कितने दूरदर्शी और तात्विक समझ वाले फिल्मकार थे, यह इस बात से समझी जा सकती है कि रवींद्रनाथ ठाकुर के ‘जन गण मन’ के राष्ट्रीय गान बनने से पहले वे इसे 1945 में आई अपनी फिल्म ‘हमराही’ में पेश कर चुके थे।

1953 में आई ‘दो बीघा जमीन’ ने दुनिया भर के फिल्मकारों का ध्यान अपनी ओर खींचा था। बिमल दा के निर्देशन में बनी इस फिल्म से भारत में सार्थक, रचनात्मक और प्रगतिशील सिनेमा का न सिर्फ एक सघन दौर शुरू हुआ बल्कि फिल्म निर्माण की ऐसी संस्कृति का विकसित हुई जिसमें सिनेमा, साहित्य और समाज तीनों एक-दूसरे के सर्वाधिक करीब आए।

दूसरे विश्वयुद्ध में फासीवाद ने इटली के समाज की परतें उधेड़ कर रख दी थीं। मुसोलिनी के डर से जहां अन्य फिल्मकार सब हरा-हरा ही दिखा रहे थे तो रॉबर्ट रोसेलिनी, वित्तोरियो डी सिका और विस्कोंती जैसे कुछ फिल्मकार भी थे जो समाज में उपजे वर्ग संघर्ष को दिखा रहे थे। सिनेमा और नव-यथार्थवाद की कहानी यहीं से शुरू होती है। शोषित और शासक के बीच के द्वंद्व को संवेदना के तमाम स्तरों पर स्पर्श करने वाली नव-यर्थाथवादी फिल्मों का भारतीय संदर्भ बिमल दा के नाम के साथ शुरू होता है।

भारतीय परिपेक्ष्य में इस संघर्ष को सबसे पहले दिखाती उनकी फिल्म ‘उदेर पाथेय’(1944) ने बांग्ला सिनेमा में तूफान ला दिया था। कहने की जरूरत नहीं कि बिमल राय वह नाम है जिनके जरिए भारतीय फिल्म जगत में प्रगतिशील और सार्थक सिनेमा का नजरिया सबसे पहले सामने आया। 12 जुलाई 1909 को ढाका में जन्मे बिमल राय की फिल्मी पारी बतौर फोटोग्राफर शुरू हुई थी।

अपने शुरुआती संघर्ष वाले दिनों में 1935 में प्रदर्शित प्रथमेश चंद्र बरुआ की ‘देवदास’ और 1937 में आई फिल्म ‘मुक्ति’ के लिए फोटोग्राफी का जिम्मा बिमल दा ने ही संभाला था। वैसे ये उनके सिनेमा के सपने सजाने की शुरुआत भर थी। 1944 तक आते-आते कैमरे से कलाकारी करने वाले बिमल दा ‘लाइट, कैमरा और एक्शन’ बोलने को तैयार थे। फिल्मकार के तौर पर उन्होंने अपनी पहली बंग्ला फिल्म बनाई ‘उदेर पाथेय’, जिसकी चर्चा हम पहले कर चुके हैं।

बंबई बिमल दा की मंजिल थी। 1942 में बॉम्बे टॉकीज के लिए उन्होंने ‘मां’ जैसी कामयाब फिल्म बनाई लेकिन उनकी असल पहचान बनकर पर्दे पर उतरी ‘दो बीघा जमीन’। इस फिल्म ने बिमल दा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान दी। समाजवाद से प्रेरित और सिनेमा के सर्वहारा की आवाज उठाने वाले बिमल दा पर व्यावसायिक फिल्में बनाने का जबरदस्त दबाव रहा। पर यह उनका ही कमाल था कि बॉक्स ऑफिस की जरूरत को ध्यान में रखते हुए भी वे अपने मनपसंद विषयों पर फिल्म बना लेते थे।

‘नौकरी’(1954) और ‘मधुमती’ (1958) इसी का नतीजा थीं। आगे उन्होंने आगा हश्र कश्मीरी की कहानी ‘यहूदी की लड़की’ से प्रेरित होकर ‘यहूदी’ बनाई। जात-पात और छूत-अछूत के मुद्दे पर ‘सुजाता’ (1959) हो या लोकतंत्र पर व्यंग्य करती ‘परख’(1960) या फिर स्त्री केंद्रित विषय पर बनी ‘बंदिनी’ (1963), ये सारी फिल्में उनकी रचनात्मक विविधता को साधने के कौशल को जाहिर करती हैं। बिमल दा ने सलिल चौधरी, ऋषिकेश मुखर्जी, ऋत्विक घटक, कमल बोस, नबेंदु घोष, रघुनाथ झालानी और गुलजार जैसे नगीने हिंदी सिनेमा को दिए। भारतीय सिनेमा में रचनात्मकता और सार्थकता की सघन और सराहनीय पारी खेलने वाले इस नायाब फिल्मकार का लंबी बीमारी के बीच आठ जनवरी 1966 को निधन हो गया।

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