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सेहत- मन की गांठें लाइलाज शक

कहते हैं शक एक ऐसा मर्ज है, जिसका इलाज हकीम लुकमान के पास भी नहीं था। दरअसल शक, जो असल में भ्रम होता है, एक तरह का मनोरोग है।

Author November 19, 2017 5:48 AM
प्रतीकात्मक चित्र

कहते हैं शक एक ऐसा मर्ज है, जिसका इलाज हकीम लुकमान के पास भी नहीं था। दरअसल शक, जो असल में भ्रम होता है, एक तरह का मनोरोग है। शक की बीमारी को मनोविज्ञान में डिल्यूशन डिसआॅर्डर कहते हैं। शक ही धीरे-धीरे भ्रम की स्थिति बनाता है। यह बीमारी धीरे-धीरे बढ़ती है, लेकिन जब गंभीर रूप धारण कर लेती है, तो इसका इलाज मुश्किल हो जाता है। इसमें मरीज अपने दिमाग में गलत सोच बना लेता है और उसी के बारे में सोचने लगता है, जो हकीकत में सही नहीं होती है। ऐसे मरीजों को लगता है कि वे जो सोच या कर रहे हैं वही सही है, बाकी सब गलत। मनोचिकित्सकों का कहना है कि शक करना इंसान की फितरत होती है। पर ज्यादा होने पर यह बीमारी का रूप ले लेती है। इसे भ्रम या मतिभ्रम भी कहा जाता है। समाज और परिवारों में बिखराव और बढ़ती हिंसक प्रवृत्ति आजकल इसके बड़े कारण बन गए हैं। पर समय रहते लक्षण पता चल जाएं तो ऐसे मानसिक रोगों को काबू किया जा सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की इकाई- वर्ल्ड फेडरेशन फॉर मेंटल हेल्थ के मुताबिक पूरी दुनिया में तीन करोड़ लोग भ्रम जैसे मनोरोग से ग्रस्त हैं। इसमें करीब सवा करोड़ मरीज भारत में ही हैं। इनमें भी यह बीमारी ज्यादातर पच्चीस से पैंतीस साल के बीच के लोगों में देखने को मिल रही है।
भारत में मनोरोगों के बारे में ज्यादा जागरूकता न होने की वजह से छोटी-छोटी दिक्कतें बड़ी बीमारियों का रूप ले लेती हैं। इसलिए रोगी में अगर शुरू में ही किसी भी तरह के मनोरोग के लक्षण नजर आने लगें, तो तत्काल मनोचिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।
कई तरह के हैं भ्रम
शक के रोग से ग्रस्त मरीज कई तरह के भ्रमों का शिकार हो सकता है। जैसे- नियंत्रण का भ्रम। जिन मरीजों को इस तरह का भ्रम होता है उनमें एक ऐसा गलत विश्वास या सोच बैठ जाती है कि उनका मन, उसके विचार या बर्ताव पर किसी दूसरे का नियंत्रण हो गया है। इसी तरह खुद को दोषी मान बैठना और उस बारे में लगातार गलत सोचते रहना भी भ्रम का ही एक प्रकार है। जिन मरीजों को यह समस्या होती है, वे अपराधबोध से भर जाते हैं। उन्हें हमेशा यही लगता रहता है कि जो कुछ हो रहा है, उनकी वजह से हो रहा है।
इसी तरह एक और भ्रम होता है- प्यार का भ्रम। सबसे ज्यादा लोग, खासकर नौजवान इसके शिकार होते हैं। इस भ्रम में रहने वाले को हमेशा यह लगता है कि कोई उससे प्यार करता है। उसे लगता है कि किसी दूसरे ने खास तरीकों से जैसे नजरें मिला कर, इशारे करके अपने प्यार का इज़हार किया है। ऐसा भ्रम होता है- ताकतवर होने का। जो लोग इससे ग्रस्त होते हैं उन्हें लगता है कि उनमें ऐसी शक्तियां मौजूद हैं, जो किसी दूसरे में नहीं हैं। ऐसा रोगी यह समझ लेता है कि दुनिया उसकी वजह से ही सुरक्षित है। इस तरह के भ्रम से पीड़ित मरीज अपने आपको किसी ताकतवर से कम नहीं समझते। इस रोग से ग्रस्त कई मरीज ऐसे होते हैं, जो मन की बात को पढ़ने का भ्रम पाले रहते हैं। इसमें इंसान सोचता है कि वह किसी के भी मन या दिमाग की बात आसानी से पढ़ सकता है।

इनके अलावा भ्रम से ग्रस्त मरीजों को कई बार लगता है कि उनके चारों तरफ होने वाली घटनाएं उनसे जुड़ी हुई हैं। ऐसे मरीज हमेशा यह सोचते रहते हैं कि उनके बारे में ही बातें हो रही हैं। कई बार मरीज को ऐसा भ्रम हो जाता है कि वह बीमार है या फिर उसके शरीर के ऊपर कीड़े रेंग रहे हैं, जबकि असल में ऐसा कुछ नहीं होता।एक होता है उत्पीड़न का भ्रम। इसमें रोगी को लगता है कि लोग उसके खिलाफ साजिश रच रहे हैं। इस भय से ग्रस्त रोगियों को अपना पीछा किए जाने, अपनी जासूसी होने, परेशान किए जाने, धोखा देने, जहर देने, हमला होने या अपने खिलाफ साजिश होने जैसी शिकायतें रहती हैं। अगर भ्रम से ग्रस्त मरीज में ऐसे लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत मनोचिकित्सक को दिखाना चाहिए। मनोचिकित्सकों का कहना है कि ऐसे रोगियों में ज्यादातर की स्थिति लाइलाज नहीं होती है। हां, इतना जरूर है कि इन्हें लंबे वक्त तक दवाएं खाने की जरूरत होती है। अगर इस बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति तीन-चार साल तक इसी अवस्था में रहे तो वह लाइलाज की श्रेणी में आ जाता है।

रोगी के साथ बर्ताव
इसके अलावा सबसे जरूरी बात यह है कि मनोरोग से ग्रस्त रोगी के साथ बर्ताव अच्छा हो। जिसकी दिमागी हालत ठीक न हो उसके साथ बहुत संभल कर व्यवहार करना चाहिए। ऐसे लोग बहुत संवेदनश्ील होते हैं। ऐसे लोगों के साथ कभी भी क्रूरता न करें, उनकी उपेक्षा न करें। उन्हें इस बात का अहसास न होने दें कि उनकी दिमागी स्थिति ठीक नहीं है। भ्रम या फिर दूसरे मनोरोग से ग्रस्त लोगों के साथ हमेशा प्यार से बात करें, मारपीट या दुर्व्यवहार बिल्कुल न करें। क्योंकि अभद्र व्यवहार से मरीज की दिमागी हालत बेकाबू हो सकती है।
मनोरोग से पीड़ित व्यक्ति को सबसे पहले किसी मनोचिकित्सक को जरूर दिखाएं, झाड़ फूंक के चक्कर में न पड़ें। ऐसे मरीजों के इलाज के लिए सुरक्षित और प्रभावकारी दवाइयां मौजूद हैं। ये दवाइयां दिमाग में रासायनिक असंतुलन को सुधारती हैं। ल्ल

 

 

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