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शख्सियत: वकील बन जाते मन्ना डे, चाचा से प्रभावित हो 3 हजार से अधिक गान गाए, पढ़ें जीवन से जुड़ी बातें

भारत सरकार ने उन्हें 1971 में पद्म श्री, 2005 में पद्म भूषण और 2007 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया।

Author Published on: May 5, 2019 3:09 AM
मन्ना डे ने संगीत की शुरुआती शिक्षा अपने चाचा केसी डे से ली थी। (जन्म : 1 मई, 1919-निधन : 24 अक्तूबर, 2003)

मन्ना डे का मूल नाम प्रबोध चंद्र डे था। उनका जन्म कोलकाता में हुआ। उनकी शुरुआती शिक्षा इंदु बाबूर पाठशाला से हुई। इसके बाद उनका दाखिला स्कॉटिश चर्च कॉलेज में हुआ। उन्होंने विद्यासागर कॉलेज से स्नातक किया। उनके पिता उन्हें वकील बनाना चाहते थे। संगीत के क्षेत्र में आने से पहले मन्ना डे इस बात को लेकर लंबे समय तक दुविधा में रहे कि वे वकील बनें या गायक। अंत में वे अपने चाचा कृष्ण चंद्र डे से प्रभावित हुए और उन्होंने तय किया कि वे गायक ही बनेंगे। मन्ना डे ने सुलोचना कुमारन से शादी की थी।

संगीत की शिक्षा: मन्ना डे ने संगीत की शुरुआती शिक्षा अपने चाचा केसी डे से ली थी। इसके अलावा उन्होंने उस्ताद दबीर खान से संगीत सीखा। मन्ना डे चालीस के दशक में अपने चाचा के साथ मुंबई आ गए और वहां उन्होंने फिल्मों में सहायक संगीत निर्देशक के रूप में काम करना शुरू कर दिया। उन्होंने अपने करिअर की शुरुआत फिल्म तमन्ना में ‘जागो आई उषा’ से की। इस तरह उनके सपनों का सफर शुरू हुआ।

खाने के शौकीन मन्ना डे: किसी ने ठीक ही कहा है कि किसी के दिल तक पहुंचने का रास्ता उसके पेट से जाता ैहै। यही किया था मदन मोहन ने। अमिय चक्रवर्ती की फिल्म ‘देख कबीरा रोया’ में संगीत का जिम्मा मदन मोहन पर था। मदन मोहन फिल्म में एक खास गाना मन्ना डे से गवाना चाहते थे। फिल्म में ‘कौन आया मेरे मन के द्वारे’ गीत का संगीत शास्त्रीय था और मन्ना डे शास्त्रीय संगीत में माहिर थे। इसलिए मदन मोहन ने एक दिन मन्ना डे को फोन करके घर पर खाने के लिए बुलाया। मन्ना डे खाने के शौकीन थे और यह भी जानते थे कि मदन मोहन खाना अच्छा बनाते हैं। सो, मन्ना डे मदन मोहन के घर आ गए और भिंडी-मटन का स्वादिष्ट भोजन किया। मन्ना डे को भोजन पसंद आया। इसी बीच मदन मोहन ने फिल्म में गीत गाने की बात कही और मन्ना डे मान गए। मदन मोहन ने ‘बैरन हो गई’ और ‘कौन आया’ दोनों गीत मन्ना दा से गवाए।

सदाबहार गाने: मन्ना डे ने अपने समय में एक से एक सुपरहिट गाने गाए। उन्होंने ‘तमन्ना’ में बतौर पार्श्वगायक गाया था। यह गीत उन्होंने सुरैया के साथ गाया। दिलचस्प यह था कि यही एकमात्र फिल्म थी, जिसे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी देखने आए थे। उनके ‘तेरे बिना चांद ये चांदनी’ (आवारा), ‘प्यार हुआ इकरार हुआ (श्री 420), ‘ये रात भीगी-भीगी’ (चोरी-चोरी), ‘जहां मैं जाती हूं वहीं चले आते हो’ (चोरी-चोरी), ‘मुड़-मुड़ के न देख मुड़-मुड़ के’ (श्री 420), जैसे अनेक गीत सफल हुए। यही नहीं, मन्ना डे की आवाज की छटा ऐसी थी कि हिंदी कवि हरिवंश राय बच्चन की कृति ‘मधुशाला’ को स्वर देने के लिए भी उन्हें चुना गया था। मन्ना डे को संगीत की दुनिया में और अधिक सफलता 1961 में संगीत निर्देशक सलिल चौधरी के संगीत निर्देशन में आई फिल्म ‘काबुलीवाला’ में ‘ऐ मेरे प्यारे वतन’ से मिली। उन्होंने तीन हजार से अधिक गानों को अपनी आवाज दी थी। उन्होंने हिंदी और बांग्ला के अलावा लगभग हर भारतीय भाषा में गीत गाए।

सम्मान: भारत सरकार ने उन्हें 1971 में पद्म श्री, 2005 में पद्म भूषण और 2007 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया।

निधन: 24 अक्तूबर, 2013 को उनका निधन बंगलुरु में दिल का दौरा पड़ने से हो गया।

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