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परंपरा का ज्ञान पोसते वनवासी

छत्तीसगढ़ के घने जंगलों में बैगा समुदाय भ्रमरमार और तेलियाकंद नामक दुर्लभ औषधि का उपयोग रक्त कैंसर की चिकित्सा में करते हैं। हड्डी टूटने पर हड़जुड़ी की पत्तियों का लेप बना कर उस स्थान पर बांधने और खाने से हड्डी कुछ ही दिनों में जुड़ जाती है..

Author नई दिल्ली | Updated: December 27, 2015 3:58 AM

आदिवासी समाज के सभी समुदायों की ज्ञान-परंपरा बहुत समृद्ध रही है। यह तथ्य पिछले दिनों राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक (मध्यप्रदेश) में मिले डॉ. विजय चौरसिया ने भी पुष्ट किया। उन्होंने आदिवासी समाज की परंपरागत ज्ञान-पद्धति पर काम किया है। कुछ और जगहों से भी यह जानकारी पुष्ट हुई है। छत्तीसगढ़ के घने जंगलों में बैगा समुदाय भ्रमरमार और तेलियाकंद नामक दुर्लभ औषधि का उपयोग रक्त कैंसर की चिकित्सा में करते हैं। हड्डी टूटने पर हड़जुड़ी की पत्तियों का लेप बना कर उस स्थान पर बांधने और खाने से हड्डी कुछ ही दिनों में जुड़ जाती है। शरीर में कहीं भी चोट लगने पर ये लोग कुरकुट के पत्तों को पीस कर उसका लेप लगाते हैं, जिससे घाव भर जाता है और टांके लगाने की जरूरत नहीं होती।

मलेरिया बुखार आने पर पीपल की दातून करते हैं। उसकी पहली पीक थूक दें और शेष को गटक लें। कैसा भी मलेरिया बुखार हो, दो दिन में ठीक हो जाएगा। दांत दर्द के लिए चितावर की डेढ़ पत्ती को दांतों में दबाने से दांत के कीड़े मर जाते हैं। आक या अकवन के दूध की दो-तीन बूंद दांत में लगाने से दर्द ठीक हो जाता है। सिर या दाढ़ी के बाल अचानक झड़ने पर शराब बनाने वाले मटके की कालिख को एकत्र कर उस स्थान पर लगाने से दूसरे दिन से ही बाल आने लगते हैं।

मूत्र विकार में जरिया पौधे की ढाई पत्ती को चबा कर उसके रस को निगलने और उसकी पत्तियों को चबा कर उसे गुदी में लगाने से पेशाब की जलन ठीक हो जाती है। जुलाब लाने के लिए वन अंडी की जड़ को अंगुली से नाप कर अधिकतम दो या तीन अंगुल चूसने से दो या चार बार जुलाब हो जाता है। आई फ्लू हो जाने पर या आंखों में लालिमा बने रहने पर नमक की डली को आंख पर लगा कर उस नमक की डली को पानी के मटके के नीचे रख देते हैं। जैसे ही नमक घुलना शुरू हो जाता है, आंखों को राहत मिलनी शुरू हो जाती है। इसका दूसरा निदान है जिसमें जरिया की पत्तियों को चबा कर आंखों में फूंकने से आंखों का दर्द ठीक हो जाता है। बच्चों को सूखा रोग हो जाने पर आसाढ़िया सर्प की केंचुली या उसकी रीढ़ की हड््डी की माला बना कर बच्चे के गले में पहना देते हैं।

छोटे बच्चों को दस्त लग जाने पर मुर्गी के अंडे को फोड़ कर उसे जमीन पर एक पट्टे पर रख कर उसके ऊपर बच्चे को बैठा देते हैं, जिससे बच्चे की गुदा में संकुचन होता है और उस अंडे का द्रव गुदा-द्वार से बच्चे के पेट में पहुंच जाता है और बच्चे के दस्त बंद हो जाते हैं। सर्पदंश पर इंद्रावन की जड़ खिलाने, करौंदे की जड़ को पानी में उबाल कर पिलाने और राहर की जड़ों को चबाने से जहर उतर जाता है। या जिस स्थान पर सर्प ने काटा है उस स्थान पर मुर्गी के चूजे की गुदी लगाई जाती है। चूजा मर जाता है। यह क्रिया जहर उतरने तक की जाती है और तब तक चूजों का मरना बंद हो जाता है।

पागल कुत्ते या सियार के काटने पर राहर की डाल के पौधे में पाया जाने वाला एक प्रकार का कीड़ा, मक्का का पुष्पांग और इंद्रावन की जड़ को पीस कर गुड़ या महुआ की शराब के साथ पिलाते हैं, जिसके कारण पेशाब से खून के कतरे गिरते हैं। इस विधि से उपचार किया जाता है। सफेद आक की जड़, काली हल्दी और अजवाइन को कूट कर उसके पाउडर को गुड़ के साथ खिलाने से दमा और एलर्जिक अस्थमा का शर्तिया इलाज किया जाता है। जिन्हें तथाकथित विकसित लोग पिछड़े और जंगली कहते हैं उनके आदिम और ‘जंगली’ ज्ञान को निकट जाकर देखने से ही असलियत का पता चलता है।

वैसे बैगा मध्यप्रदेश का एक प्रमुख आदिवासी समुदाय है, लेकिन उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड में भी इस समुदाय के लोग रहते हैं। इस समुदाय की अन्य शाखाएं बिझवार, नारोटिया, भारोटियानाहर, रायभैना और कधभैना के नाम से भी जानी जाती हैं। सतपुड़ा पर्वत शृंखला के पूर्वी भाग, शहडोल, बिलासपुर, राजनांदगांव, मंडला और बालघाट इलाकों में इनकी बहुलता है। इनकी कुल जनसंख्या चार लाख के करीब है।

मध्य भारत के बैगाओं की मान्यता है कि कभी दूसरे के यहां मजदूरी नहीं करना। काम करना केवल अपने लिए। ये खुद को वन-पुत्र कहते हैं और आखेट तथा वनोपज पर निर्भर रहते आए हैं। कालांतर में ये लोग ‘चल खेती’ करने लगे, जिसमें बाद में ये बड़े पारंगत होते गए। इसके पीछे इनकी मान्यता है कि धरती हमारी मां है। मां की छाती के एक ही स्थल को दूह कर बार-बार पेट नहीं भरना चाहिए। ऐसा करने से मां कमजोर होती है। वे अपनी माता को किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं पहुंचाना चाहते।

बैगाजन अपनी विशिष्ट संस्कृति के लिए मशहूर हैं। बाहरी लोगों से मिलना-जुलना कतई पसंद नहीं करते। यहां तक कि दीगर आदिम समूहों से भी। इनके यहां जिस घर में कोई मौत हो जाती है, उसे नष्ट कर दूसरा आवास बना कर रहते हैं। गोदना कला के माध्यम से विशेषकर स्त्रियों में तन-सौंदर्य उभारना इन्हें बहुत भाता है। मध्यभारत के आदिवासी समुदायों में अस्तित्व का सबसे अधिक खतरा इस समुदाय को है। सन 1960 के बाद बाघ संरक्षण अभयारण्यों के नाम पर सर्वाधिक विस्थापन इनका हुआ है।

बैगाओं की मुख्य विशेषताओं में महिलाएं गोदने की शौकीन हैं, लेकिन ललाट पर बिंदी नहीं लगातीं। वे नासिका छिद्र नहीं करवातीं। पुरुष लंबे केश रखते हैं। स्त्री और पुरुष घुटनों के ऊपर कपड़े पहनते हैं। स्त्रियां सिर नहीं ढंकतीं। दशहरा, करमा, दादरिया, फाग और बिलमा के अवसरों पर स्त्री-पुरुष दोनों नृत्य-गान के बड़े शौकीन होते हैं।

होली के अवसर पर महीना भर चलने वाले ‘मड़ई’ पर्व के प्रति खासकर छत्तीसगढ़ के बैगाओं का उत्साह देखते ही बनता है, इससे आगे यह उत्सव संपूर्ण छत्तीसगढ़ प्रांत में उल्लास पर्व के रूप में मनाया जाता है।
प्रख्यात नृतत्त्व विज्ञानी वेरियर एल्विन ने बैगाओं पर काफी शोध कार्य किया है। मध्यप्रदेश के पूर्वी जिले डिंडोरी के घने जंगलों में बसे एक बैगा गांव रैतवार में वेरियर एल्विन सन 1940 में आए। वहीं बस गए। वहां करीब बारह साल रह कर छब्बीस पुस्तकें लिखीं। एक चौदह वर्षीय कोशीबाई नामक बैगा किशोरी से वेरियर एल्विन ने शादी की तब एल्विन की उम्र चालीस वर्ष की थी। वेरियर एल्विन जवाहरलाल नेहरू के प्रिय मित्र थे। अपनी पत्नी को भारत भर में अपने संग भ्रमण करवाया। नेहरूजी से भी मिलवाया।

कोशीबाई ने दो पुत्रों को जन्म दिया। लेकिन वक्त बदला। शादी के नौ साल बाद ही वेरियर एल्विन ने उसे तलाक दे दिया। इसके बाद उस महिला ने बेहद गरीबी और अभावों की जिंदगी काटी। कोशीबाई ने अंगरेज पति के महज तेईस साल की उम्र में कोर्ट द्वारा एकतरफा तलाक के बाद भी पूरी जिंदगी उस रिश्ते को मन से माना और दुबारा शादी नहीं की। जब उसकी मृत्यु हुई तो उसकी लाश को कंधा देने उसके ही बैगा आदिवासी समुदाय के लोग नहीं आए। बताया जाता है कि एल्विन ने दो अन्य आदिवासी लड़कियों से भी शादी की और उन्हें त्याग दिया। अब भी बैगाओं का ध्यान खेती-बाड़ी की तरफ है ही नहीं। अब भी ये लोग वनोपज पर निर्भर रहते हैं। किस विकास की बात करें, इस वर्तमान में और भारत के हृदयांचल में ऐसे बैगाओं के अनेक गांव हैं, जहां एकाध व्यक्ति भी आठवीं तक पढ़ा नहीं है!

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