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बहाग – उल्लास का नृत्य

रंगाली बिहू कृषिजीवियों और पशुपालकों का लोक-उत्सव है।

लोक नृत्य करती महिलाएं।

ऐसे कई अंदाज हैं, जिनमें असम का सानी नहीं है। जैसे अपने उल्लास को व्यक्त करने का असम का अंदाज। असम अनेक जातियों-जनजातियों और विभिन्न प्रजातियों का गुलदस्ता है। इन सभी विभिन्नताओं के बावजूद असमिया समाज की एकता अटूट है। असम की जातीय एकता के गठन में शंकरदेव की समन्वय-साधना, ब्रम्हपुत्र की नदी की अजस्र धारा तथा बिहू नृत्य की भावात्मक अपील का योगदान अहम है । शंकरदेव ने असम को भाषा-साहित्य, कला-शिल्प, धर्म-दर्शन के राजमार्ग पर ला खड़ा किया तो ब्रह्मपुत्र नदी ने इस अंचल को यातायात का सुगम मार्ग दिया और रंगाली बिहू ने पारस्परिक सौहार्द के महापाश में सबको बांध लिया।

रंगाली बिहू कृषिजीवियों और पशुपालकों का लोक-उत्सव है। इसे बहाग (असमिया संवत्सर का पहला महीना- बिहू) भी कहते हैं। असम के लोकजीवन के जितने भी उज्ज्वल पक्ष हैं, रंगाली बिहू उन सबकी एक रंगोली-सी है। नवता इस बिहू का बीज शब्द है तो उल्लास-भाव इसका सर्वस्व है। इसमें नववर्ष के स्वागत की उत्कंठा है, मनुष्य ही नहीं देवताओं, बड़े-बूढ़ों और मवेशियों तक के लिए समादर-भाव है, भावों का गीतात्मक सहजोल्लास है, वाद्य है और वाद्य के साथ संगत कर रहा नृत्यमान पंचभूतात्मक शरीर है। रंग-बिरंगी पोशाक में बिहू मनाने को प्रस्तुत जन प्रकृति के रंगाली भाव को मानवीय संस्पर्श देता है। इसकी जड़ें परंपरा में गहराई तक गई हैं और इसकी शाखाओं-प्रशाखाओं का विस्तार आधुनिकता के खुले आकाश में हुआ है। एक गीत में बहाग बिहू के आगमन का चित्र इस प्रकार मिलता है-
चोते गोए-गोए बहागे पाले हि
फूलिसे कपौफूल गसत ।
मोर नाचोनी हाते तते नाइइ
हुनि धुलिया धुलस सेओट।
चैत्र के जाते ही बहाग (वैशाख) आ गया है। पेड़ों पर कपौफूल (एक प्रकार का आॅर्किड) खिल गए हैं। इस मनोहारी मौसम के साथ संगति करने को मनुष्य तैयार है। बिहू ऋतुओं की वयसंधि का द्योतक है। कहते हैं प्रकृति के प्रांगण में हुए इस परिवर्तन का कारण विषुव (संक्रांति) है। भारतीय त्योहार अक्सर ऋतु परिवर्तन के समारोह हैं । हमारे उत्सव शरद और वसंत ऋतुओं में मनाए जाते हैं। ये दोनों ही मनभावन ऋतुएं हैं। शरद ऋतु वर्षा के बाद आती है और वसंत ठिठुराती ठंड से निजात दिलाती है। इसलिए दोनों ही ऋतुएं उत्सवों के अनुकूल पड़तीं हैं। इस समय भारतीय किसान कृषि कार्य से मुक्त रहते हैं। उत्सव मनाने का यह भी एक कारण हो जाता है ।

शीत को विदाई देकर लौटती हुई सनसनाती हवा, कपौ-तगर आदि से कुसुमित परिवेश, कोयल की काकली से गूंजता दिगंत- ये सभी बिहू की अगवानी में सोल्लास लग जाते हैं। आंधी-पानी लेकर मौसम और वर्षा आ धमकती है। ललनाओं के मूंगा रेशम के हेमवर्ण वस्त्र, चंचल अपांग और पारंपरिक आभूषण बिहू के सौंदर्य को सौभाग्य-सफल करते हैं। रंगाली बिहू सभी ज्ञानेंद्रियों को तृप्त करता है। रंगाली बिहु के उल्लास से हमारी ज्ञानेंद्रियां ही तृप्त नहीं होतीं, हमारा मन भी बाग-बाग हो उठता है । बहागीर बिया शीर्षक कविता में कवि रघुनाथ चौधुरी ने बहाग माह के उल्लसित परिवेश का वर्णन इन शब्दों में किया है-
जड़ जगतत जीव जगतत
पाओं सकलोते देखा
महाविश्व जुरि बिरिंगिसे जेन
आनंदर पूर्ण रेखा ।
(इस प्रकार मैं देख रहा हूं कि अखिल विश्व के जड़-चेतन जगत में आनंद का पारावार लहरा रहा है।)
रंगाली बिहू नाना जातियों-उपजातियों के संलयन और उसके फलस्वरूप गठित हुए रूढ़िमुक्त वृहत्तर असमिया समाज की मुक्तावस्था है। रंगाली बिहू ‘आनंदो आमार जाति आनंदो अमार धर्म’ का संदेश है। धार्मिक कर्मकांड से अछूता, यौवन, उत्साह और आशाओं से लबालब रंगाली बिहू अपने नाम को सर्वथा सार्थक करनेवाला असम का वसंतोत्सव है। हालांकि, ग्रामीण परिवेश में विकसित हुआ है पर आज यह देश-विदेश में मनाया जाता है। सर्जन की इच्छा रंगाली बिहू की मूल भावना है। रंगाली बिहू के हर उपक्रम में इस भावना की सशक्त अभिव्यक्ति होती है। उद्दाम नृत्य और उसकी संगति कर रहे प्रखर वाद्यों और गीतों के भावप्रवण बोल ये सभी मिलकर रंगाली बिहू का चित्रपट तैयार करते हैं। इस चित्रपट पर सबसे मुखर रहता है प्रेम का रंग। एक बिहू गीत की यह कड़ी याद आ रही है-
प्रथमे ईश्वरे पृथ्वी सरजिले लगते सरजिले जीव
सेइजने ईश्वरे पिरिति करिले आमि न करिम किय
(पहले ईश्वर ने पृथ्वी बनाई, फिर बनाए जीव। उसी ईश्वर ने जब किया प्रेम तो मैं क्यों न करूं।)
पिरिति यानी प्रीति रंगाली बिहू का सर्वस्व है। पिरिति की परिधि में सभी संबंध, सभी समवाय आ जाते हैं। इसमें परिवेश आता है, जीव-जंतु आते हैं, ज्येष्ठ और कनिष्ठ आते हैं। रंगाली बिहू इन सबके लिए आता है। बिहू के स्वागत में सारा समाज अपनी-अपनी वृत्ति के अनुसार तन-मन-धन से लगा हुआ है। पर सबसे उन्मन हो रही है किसी की प्रेमिका। एक बिहूगीत में उल्लेख किया गया है कि भक्तगण स्नान-ध्यान कर के पूजा-पाठ में लगे हैं, ब्रह्मपुत्र नदी के घाट की सेवा के लिए नाव लगी है। पर इस सबसे अलग है मेरी स्थिति। मेरी तो बस यही चिंता कि किस प्रकार समय मिले और मैं अपने प्रियतम को एकांत में पा सकूं। गीत के बोल देखिए-
गा धुई भगते गुरुर करे सेवा
घाटर सेवा करे नाव
मोर्इं चिंता करूं कोर सोनमुआक
केनेकै अकले पाम।
रंगाली बिहू प्रकृति और मानव की अंतर्कि्रया का सुपरिणाम है। रंगाली बिहू संबंध बनाने की ऋतु है, संबंध निभाने का पर्व है। रंगाली बिहू का धमाल जो कभी खेत-खलिहान में, पीपल-नाहर के तले मचा हुआ था, वह आज आज नगरों-महानगरों के मंचों से लाखों को भी प्राणवंत कर रहा है। इसमें संयोग शृंगार मुखर है, ऐक्य की पुकार मुखर है, परंपरा की धार मुखर है। बिहू हमें अपने वर्तमान की संवेदना से जोड़ता है तथा भविष्य के लिए आश्वस्त करता है। इससे भी बढ़कर तो यह कि यह हमें अतीत से बांध कर रखता है। जीवन में प्रगति, शांति और मैत्री की जिस त्रिवेणी की हम कामना करते हैं बिहू उस त्रिवेणी का सांस्कृतिक वैतालिक है। ०

 

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