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माध्यम कॉलम में विनय जायसवाल का लेख : सोशल मीडिया पर बेलगाम होती भाषा

लेखकों, पत्रकारों और ब्लॉगरों पर इस तरह के शाब्दिक हमलों की लंबी शृंखला है। रोज कोई न कोई इस हादसे का शिकार हो रहा है।

Author नई दिल्ली | June 12, 2016 3:02 AM
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भारत में छियालीस करोड़ इंटरनेट उपभोक्ता हैं। इनमें पंद्रह करोड़ से भी ज्यादा लोग सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं। यह जानकारी आई है इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन आॅफ इंडिया (आईएएमएआई) की ताजा रिपोर्ट में। बड़ी-बड़ी कंपनियों से लेकर राजनीतिक दल, सरकार के विभिन्न मंत्रालय, प्रशासनिक और पुलिस विभाग भी सोशल मीडिया पर आ गए हैं। यह मीडिया जनता के एक बड़े वर्ग को प्रभावित करने का बहुत बड़ा माध्यम बन गया है। इस पर युवाओं का वर्चस्व है। यह विचारधारा की लड़ाई का भी एक बड़ा अखाड़ा बनता जा रहा है।

यह वैचारिक लड़ाई जब तक प्रबुद्ध बहस की सीमाओं में रहती है तब तक तो ठीक, लेकिन जैसे ही यह अभद्र भाषा, अपशब्द और निजी आलोचना पर उतरती है, सारा गुड़ गोबर हो जाता है। आलम यह हो गया है कि यह अदृश्य सैनिकों की कई टुकड़ियों में बंटा नजर आता है, जिसमें सब अपनी-अपनी विचारधारा के लिए हथियारों से लैस खड़े हैं और जैसे ही कोई विरोधी विचार आता है, बाकी उस पर टूट पड़ते हैं। वहां पर न तो तर्क होता है, न दूसरे के विचारों का सम्मान, न ही सीखने की लालसा और न ही सम्मानजनक असहमति। कई बार तो मामला निजी स्तर पर गाली-गलौज और आपराधिक अवमानना तक पहुंच जा रहा है।

हाल ही में, एक राजनीतिक संगठन की महिला शाखा की सचिव को जिस तरह से सोशल मीडिया पर निशाना बनाया गया और उन पर व्यक्तिगत टिप्पणी की गई, उससे यह सवाल एक बार फिर से खड़ा हो गया है कि हम किस तरह से भाषाई असहिष्णुता की ओर बढ़ रहे हैं और किसी विचार या मत का तार्किक खंडन करने की बजाय उस पर सड़कछाप लंपट भाषा में हमला कर रहे हैं। इसी तरह एक टीवी महिला पत्रकार को लेकर जिस तरह की टिप्पणियां की जा रही हैं, वह भी कम काबिले-एतराज नहीं है।

लेखकों, पत्रकारों और ब्लॉगरों पर इस तरह के शाब्दिक हमलों की लंबी शृंखला है। रोज कोई न कोई इस हादसे का शिकार हो रहा है। ऐसा नहीं है कि केवल बौद्धिक तबका ही इस तरह के आक्रमण का शिकार है। वहां मौजूद हर कोई डरा हुआ है कि पता नहीं उसकी किस पोस्ट पर किस तरह की प्रतिक्रिया आनी शुरू हो जाएगी। यही कारण है कि इस पर मौजूद लोगों का एक बड़ा तबका सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर बोलने से कतराता है या चुप्पी साधे रहता है। महिलाएं तो खासतौर पर एहतियात बरतती हैं।

इसके बावजूद जो सक्रियता दिखाते भी हैं तो उन्हें भी उसी तरह की शाब्दिक अतिचार का शिकार होना पड़ता है। सूचना समाज के अतिविकासित दौर में आने के बाद भी हमारी चेतना बस इतनी है कि हम तर्कों पर बात करने की बजाय गालियों से बात करने लग जाते हैं। पिछले चार-पांच साल में सोशल मीडिया एक सशक्त माध्यम के तौर पर उभरा है। 2014 के लोकसभा चुनाव में इस मीडिया का सभी दलों ने अपने लिए इस्तेमाल किया। लेकिन, जैसे-जैसे यह मीडिया विस्तार ले रहा है, वैसे-वैसे आलोचना सुनने और सहने की क्षमता घट रही है। आलोचना चाहे सरकार की हो या किसी संस्था या व्यक्ति की। देखा जा रहा है कि जरा-सी आलोचना के जवाब में लोग हर तरह की घिनौनी गालियां बकने लगते हैं।

इस तरह की अतिवादिता किसी दल के सोशल मीडिया के समर्थकों में बहुत ज्यादा है तो किसी में कम, लेकिन थोड़ा-बहुत सभी में है। इस तरह का माहौल बनाने में कई बार राजनीतिक दलों की जनसंपर्क एजेंसियों की भी बहुत बड़ी भूमिका होती है और इन पर लगाम न लग पाने का एक बहुत बड़ा कारण नकली एकाउंट की भारी संख्या में मौजूदगी है।

निश्चित रूप से संविधान हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। यह वही स्वतंत्रता है जो प्रेस और मीडिया को मिली हुई है। अपनी स्वतंत्रता को बनाए रखने की जिम्मेदारी भी हमारे ऊपर है। जब तक लोग अपनी जिम्मेदारी को समझेंगे तभी उनकी स्वतंत्रता कायम रहेगी। अगर हम ऐसे ही बेलगाम होते रहे तो वह दिन दूर नहीं, जब सरकार इसे अपने शिकंज में ले लेगी। सरकार पहले ऐसा कर भी चुकी है।

गौरतलब है कि पांच फरवरी 2009 को भारत सरकार ने इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी अधिनियम 2000 (संशोधित 2008) को लागू किया था। इस कानून के शिकार कई निर्दोष लोग भी हुए। बाद में उच्चतम न्यायालय ने मार्च 2015 में इस अधिनियम की धारा-66 को असंवैधानिक घोषित कर दिया। लेकिन, इसका मतलब यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया में कुछ भी लिखने या पोस्ट करने या फिर टिप्पणी करने का अधिकार दे दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने भले सोशल मीडिया को सीधे-सीधे सरकार द्वारा नियंत्रण में लेने के उसके मंसूबे पर पानी फेर दिया हो। लेकिन आज भी ऐसे लोगों पर विभिन्न प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जा सकती है, जो अपमानजनक टिप्पणी करते हैं, सार्वजनिक रूप से गाली पोस्ट करते हैं, महिलाओं के लिए अनुचित भाषा का प्रयोग करते हैं और किसी का नुकसान करने के लिए दुष्प्रचार करते हैं। कुछ मामलों एफआईआर भी दर्ज हो चुकी है।

इसलिए यह कहावत आज भी पूरी तरह से चरितार्थ है, ‘जहां से मेरी नाक शुरू होती है, वहीं तुम्हारी स्वतंत्रता खत्म हो जाती है।’ वैज्ञानिक प्रगति और तकनीकी उन्नति की आजादी का आनंद लेने का हक हर किसी को है, लेकिन याद रखना चाहिए भाषा ऐसी चीज नहीं है, जिसका कोई बेजा इस्तेमाल कर ले। जो लोग भाषा का गलत इस्तेमाल इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि उनकी पहचान छिपी है या उनके पकड़े जाने का खतरा नहीं है, वे गलतफहमी में हैं। कानून उन तक पहुंचा हुआ है, बस उसे थोड़ा सक्रिय होने की जरूरत है। १

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