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‘रिपोर्ट’ कॉलम में पवन गौतम का लेख : वृंदावन की दीनदशा

राधाकृष्ण की रासस्थली वृंदावन का नाम लेते ही लोगों के मन में यह विचार उमड़ता है कि वृंदा यानी तुलसी और वन यानी जंगल होगा। तुलसीवन यानी वृंदावन।
Author नई दिल्ली | August 21, 2016 00:02 am
गीता का परम ज्ञान देने वाले भगवान कृष्ण श्रीविष्णु के 8वें अवतार हैं (Source: Express Archives)

राधाकृष्ण की रासस्थली वृंदावन का नाम लेते ही लोगों के मन में यह विचार उमड़ता है कि वृंदा यानी तुलसी और वन यानी जंगल होगा। तुलसीवन यानी वृंदावन। लोग सोचते हैं कि वहां नूपुरों की मधुर छनछनाहट का रस बरस रहा होगा। इसी वृंदावन के उन वृंदादलों की सुगंध ने अपनी पवित्रता और मधुरता के लिए न जाने कितने महान ऋषि-मुनियों और महान कवियों, संत-महात्माओं को यहां आने के लिए प्रेरित किया होगा। भारतवर्ष के हर कोने से असंख्य लोग यहां आते रहे हैं। यहां की माटी ने देश के लोगों को ही नहीं विदेशी कृष्ण भक्तों को भी आकर्षित किया है। जिस काल में उसकी गरिमा अपनी वास्तविकता को इतिहास के अतीत में समेटे हुए लुप्त हो रही थी, उस समय श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त चैतन्य महाप्रभु का इस स्थान पर प्रथम बार आगमन हुआ। इसकी दशा देखकर वह विह्वल हो उठे।

यह कृष्ण नाम कोई एक समय-रेखा से आबद्ध नहीं है लेकिन यह नगरी अपनी पहचान धीरे-धीरे खो रही है। वृंदावन से प्राचीन प्रतिमाओं की तस्करी लंबे समय से होती रही है। वर्तमान में वृंदावन के ऐतिहासिक स्वरूप को मिटाने का एक बहुत बड़ा षडयंत्र चल रहा है, जिसमें बाहरी ताकतें भी शामिल हैं। इन अद्वितीय प्रतिमाओं की कीमत लाखों करोड़ों में आंकी जाती है। बंगाल के घर-घर में आज भी श्रद्धा और भक्ति से चैतन्य महाप्रभु का नाम लिया जाता है, वह चाहे पश्चिम बंगाल हो या पूर्वी बंगाल। श्री चैतन्य महाप्रभु ने वृंदावन से अधिक बंगाल के घर-घर में श्रीकृष्ण के नाम को बसा दिया। श्री चैतन्य महाप्रभु के दिखाए श्रीकृष्ण प्रेम के मार्ग पर चलकर श्रीकृष्ण के निश्छल प्रेम से अभिभूत बंगाल से विधवाएं और असहाय महिलाएं वृंदावन के नाम से नतमस्तक होकर अपने जीवन को धन्य मानते हुए यहां आने को लालायित रहतीं हैं, लेकिन आज जब वे वृंदावन आतीं हैं तो उनका रोम-रोम कांप उठता है कि क्या यही वह वृंदावन है, जिसे चैतन्य महाप्रभु ने चाहा था?

चैतन्य महाप्रभु के वृंदावन को ढूढ़ती हुई अनेक महिलाओं के जीवन के अनेक बसंत व्यतीत हो चुके हैं, लेकिन आज तक वही वृंदावन खोजने का क्रम जारी है और 10-15 वर्ष की अवस्था में वृंदावन आर्इं ये बेसहारा महिलाएं अपने यौवन और शक्ति को खोकर वृद्ध और लाचार हो चुकी हैं। आज इन महिलाओं के पास सस्ते और सुरक्षित रहने को मकान तक नहीं हैं। जब वे वृंदावन आई थीं, उस समय इन महिलाओं के पास पचास पैसे या एक रुपया महीने पर मकान किराए पर मिले थे। असल में वृंदावन मुख्य रूप से सात देवालयों की जागीर थी और इन देवालयों में से अधिकतर बंगालियों से संबंधित थे। उस समय मदन मोहनजी, गोविंद देव, राधा दामोदर, श्याम सुंदर, राधारमण , गोपीनाथ और गोकुलानंदजी मुख्य देवालय थे। वृंदावन की सारी जायदाद मदन मोहनजी महाराज और गोविंद देवजी के हाथों में थी। बताया जाता है कि इन मंदिरों के भक्त धनी-मानी राजाओं और व्यक्तियों ने अपने जीवन के कुछ समय के लिए वृंदावन वास के लिए बड़ी-बड़ी इमारतों का निर्माण कराया था। इन लोगों में कुछ धनीमानियों ने अपनी जायदाद मंदिर को समर्पित कर दी थीं।

इ न जायदादों के साथ मंदिरों को काफी अचल संपत्ति प्राप्त हो गई। कभी जागीरदारी के मालिक रहे इन मंदिरों की हालत काफी खस्ता नजर आने लगी है। पहले जहां इन जायदादों की कोठरियों में बंगाल से आई कृष्ण भक्त महिलाएं काफी सस्ते में आराम से जीवन व्यतीत कर लेती थीं, आज वे ही दर-दर भटक रही हैं। कुछ मंदिरों के महंतों ने अपने मंदिर की बेशकीमती जायदादों को भू माफियों को ऊंची-ऊंची कीमतों पर बेचकर दौलत बनानी शुरू कर दी है।

इन मंदिरों के पास अपनी देखभाल के लिए कोई आर्थिक स्रोत नहीं है। सेवायत महंत कानूनों का उल्लंघन करके मंदिरों की जायदाद भू-माफियाओं और भू-पतियों को बेच रहे हैं। क्या इसमें प्रशासन की मौन स्वीकृति है या भू-माफियाओं के हाथ इतने लंबे हैं कि प्रशासन या शासन उनके हाथों बिक चुका है। ब्रजवासियों का ध्यान अभी इस ओर नहीं जा रहा है कि अगर वृंदावन की असली पहचान समाप्त हो गई तो क्या मंदिरों की बजाय फ्लैटों या कोठियों को देखने के लिए श्रद्धालु वृंदावन आएंगे? अगर बात विकास की हो तो बुरा नहीं लगेगा लेकिन जब वहां की संस्कृति को बिगाड़कर उसका स्वरूप बदला जा रहा हो तो दुख होना स्वाभाविक है। वर्तमान में वृंदावन में जो फ्लैट संस्कृति शुरू हुई है उसकी वजह से वृंदावन में लता-पता, कुंड-सरोवर, बाग-बगीचे, कुंज-निकुंज के अस्तित्व खत्म हो रहे हैं।

होड़ शुरू हुई है दिल्ली की पांच सितारा संस्कृति की। वृंदावन में ऊंची-ऊंची इमारतें खड़ी हो गई हैं। इमारतों के नीचे पार्किंग का धंधा चल रहा है। बहुमंजिली इमारतों में रहने, सोने, खाने-पीने के सभी सुख साधन मौजूद हैं। गेस्ट हाउस बनाकर यात्रियों को ठहराकर उनकी जेब हल्की करने का धंधा वृंदावन में आजकल जोरों पर है। इस प्रकार की मारामारी के बीच वृंदावन में जमीनों के दर आसमान छू रहे हैं। किसी जगह का मालिक कोई है, फर्जी झगड़ाकर मुकदमा अदालत में दाखिल करा दिया जाता है गुमराह करके स्टे आर्डर हासिल कर लिया जाता है।

जब मालिक को इस घटना का पता चलता है, तब तक वह जमीन या जायदाद बिककर असरदार लोगों के हाथ में पहुंच जाती है या उस पर जबरन कब्जा कर लिया जाता है। इस प्रकार के घटनाक्रम में पुलिस की भी अप्रत्यक्ष सहमति रहती है। कुछ लोग हैं जो वृंदावन में विलासिता से दूर आकर शनिवार और रविवार को भ्रमण के आनंद के साथ-साथ धार्मिक बनने का प्रयास कर रहे हैं। इन्हीं लोगों में से कुछ लोगों ने वृंदावन में अपना स्थायी निवास बनाने का मन बना कर जमीनों को खरीदना शुरू कर दिया है।

इनकी देखादेखी अन्य स्थानीय छोटे-छोटे मध्यस्थों ने भी इस व्यवसाय को अपनाकर जमीनों और मकानों को खरीदने-बेचने का धंधा शुरू कर दिया है। आज स्थिति यह है कि जिसको जहां जगह मिल रही है वहीं फ्लैट बनाए जा रहे हैं। बहुमंजिली इमारतों और फ्लैटों के निर्माण के लिए जमीनों की खरीद-फरोख्त का सिलसिला अधिक पुराना नहीं है। सर्वप्रथम रमणरेती मार्ग पर इस्कॉन मंदिर की स्थापना से ही इस क्षेत्र में जमीनों और मकानों की कीमत दिनदूनी रात चौगुनी बढ़ने लगी थी।

(पवन गौतम)

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