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ओम पुरी: कद्दावर अभिनेता का यों जाना

1993 में उन्होने भावावेश और तनाव में नंदिता से शादी की। दूसरी शादी भी असफल रही। नंदिता सें उन्हे एक बेटा हुआ ईशान पुरी।

Author January 15, 2017 5:57 AM
ओम पुरी शुक्रवार को अपने घर में मृत पाए गए थे।

अजित राय

यह 1972 की सर्दियों की बात रही होगी। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निर्देशक इब्राहीम अलकाजी ने देखा कि उनका एक छात्र बहुत परेशान रहता है। उन्होंने एमके रैना को इस बात का कारण पता करने को कहा। कुछ दिन बाद रैना ने अलकाजी साहब को बताया कि वह छात्र अंग्रेजी न जानने की वजह से परेशान रहता है। उसे केवल पंजाबी और हिंदी आती है। रैना ने यह भी बताया कि वह छात्र अंग्रेजी के आतंक से घबरा कर नाट्य विद्यालय छोड़ने की सोच रहा है। अलकाजी ने उस छात्र को अपने कमरे मे बुलाकर बड़े प्यार से समझाया कि अंग्रेजी केवल एक भाषा ही तो है। उसे सीखा जा सकता है। कल से तुम रोज एक घंटा अंग्रेजी सीखने मेरे पास आना। इतिहास गवाह है आगे चलकर वही छात्र भारत का अकेला ऐसा अभिनेता बना जिसके खाते में छब्बीस अंतरराष्ट्रीय फिल्में हैं। उन्हें 2004 में ब्रिटेन की महारानी ने आॅनरेरी आॅफिसर आॅफ द आर्डर आॅफ द ब्रिटिश एंपायर सम्मान दिया। वह छात्र और कोई नहीं ओम पुरी थे।
भारतीय सिनेमा में ओम पुरी का ऐतिहासिक योगदान दो कारणों से है। पहला, उन्होंने आम आदमी को नायकत्व प्रदान किया। दूसरा, वे अकेले ऐसे भारतीय अभिनेता हैं जिन्हें विश्व सिनेमा में जाना जाता है। सिटी आॅफ ज्वाय (1992), ब्रदर इन ट्रबुल ( 1995), दघोस्ट एंड द डार्कनेस (1996), माई सन: द फैनेटिक(1997), ईस्ट इज ईस्ट (1999), वेस्ट इज वेस्ट (2010), चार्लीश्ज विल्संस वार (2007), द हंड्रेड फुट जर्नी (2014_) आदि। यह सूची काफी लंबी हो सकती है।

यह एक ऐसे अभिनेता की अद्वितीय यात्रा है जिसकी ठीक-ठीक जन्म तिथि किसी को मालूम नहीं। जब वह छह साल के थे तो उनके पिता सीमेंट चोरी के आरोप में जेल चले गए। जिससे उसे सड़क किनारे ढाबे में जूठे बर्तन साफ करने से लेकर रेल की पटरियों के किनारे किनारे कोयला चुनने तक का काम करना पड़ा। बहुत बाद में मुंबई आने के बाद ओम पुरी ने मां की दशहरे के दो दिन बाद वाली बात से 18 अक्टूबर 1950 को अपने जन्म तिथि घोषित की। उन्होंने कई बार रहा है-जीवन में जब लगा कि आगे रास्ता बंद है, कोई न कोई देवदूत की तरह आया और हाथ पकड़कर नया रास्ता दिखाकर चला गया।
श्याम बेनेगल की ‘आरोहण’ और गोविंद निहलाणी की अर्धसत्य ने ओम पुरी को सुपर स्टार बनाया। बॉक्स आफिस पर अर्धसत्य ने अमिताभ बच्चन की ‘कुली’ को टक्कर दी थी। इसी साल भारतीय सिनेमा में मील का पत्थर माने जानेवाली कुंदन शाह की कामेडी फिल्में ‘जाने भी दो यारों’ ने कमाल कर दिखाया था। उन दिनों ओम पुरी अपनी गंभीर भूमिकाओं से ऊब से गए थे। मन बदलाव के लिए वे रंजीत कपूर के पास गए। रंजीत कपूर उन दिनो फ्रेंड कॉमेडी मोलियर का ‘बिच्छू’ करने जा रहे थे। उन्होंने ने पुरी साहब को मुख्य भूमिका दे दी। इसी नाटक को देखकर कुंदन शाह ने उन्हें ‘जाने भी दो यारों’ में लिया था।

इससे पहले सत्यजीत रे ने उन्हें प्रेमचंद की कहानी पर बन रही फिल्म में काम करने के लिए रायपुर बुलाया था। 1980 में जब वे ट्रेन से रायपुर पहुंचे तो शाम ढल चुकी थी। उन्होंने ट्रेन के दरवाजे के बाहर झांककर देखा तो दूर से कोई हाथ हिला रहा था। उन्हें स्टेशन पर लेने सत्यजीत रे खुद आए हुए थे। उस प्रसंग को याद करते हुए ओम पुरी अक्सर अभिभूत हो जाया करते थे। जब 2008-9 में अच्छे सिनेमा को कॉलेजों-विश्व विद्यालयों में ले जाने का आंदोलन शुरू हुआ तो ओम पुरी हमेशा उसके साथ होते थे। अडूर गोपालाकृष्णन, गिरीश कासरावल्ली, गौतम घोष, कुंदन शाह, रंजीत कपूर, संजय सहाय, त्रिपुरारि शरण, लेस्ली वुडविन, केतन वगैरह उनके गहरे दोस्तों में थे। वे उनके साथ खूब मस्ती भी करते थे और अक्सर कहते थे कि काश यहां कुछ दिन और रह सकते। मुंबई के ‘नरक’ में जाने का मन नहीं हो रहा है। यमुनानगर, कुरुक्षेत्र, पटियाला फरीदाबाद से लेकर रायपुर उनका आना-जाना लगा रहता। उन्हें हमेशा अपने बचपन का संघर्ष याद रहता था। वे जहां भी जाते समाज के आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति से जरूर हाथ मिलाते-फोटो खिंचवाते। वे स्टार थे और भीड़ उनको घेरे रहती। पर वे सबको परे कर मजदूरों, सुरक्षाकर्मियों, सफाई मजदूरों, वेटरों से खुद आगे बढ़कर हाथ मिलाते। उन्होंने कभी भी केवल पैसा कमाने को तरजीह नहीं दी। मध्य प्रदेश नाट्य विद्यालय भोपाल में जब उनसे पूछा गया कि इतने बड़े अभिनेता होने के बावजूद वे ‘डर्टी पॉलिटिक्स’ जैसी घटिया फिल्में क्यों करते हैं तो उनका जवाब था कि इसी कमाई से बेटे के लिए दवाई खरीदते हैं।

इधर वे दोबारा नाटकों की ओर लौटना चाहते थे। उन्होंने पंजाबी में ‘तुम्हारी अमृता’ नाटक किया भी, पर यह बचकाना साबित हुआ। उन्होंने कई बार रंजीत कपूर से अपने लिए कोई अच्छा नाटक शुरू करने को कहा, पर बात आई-गई होकर रह गई। दो साल पहले वामन केंद्रे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के भारत रंग महोत्सव में उन्हें आमंत्रित किया गया तो तो वे सारा काम छोड़कर चले आए थे। सीमा कपूर से उनकी शादी (1991) एक साल भी नहीं टिकी। सीमा गर्भवती थीं। एक दिन अचानक तबियत बहुत खराब हो गई। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। तब वे ओम पुरी से अलग हो गई थीं। वे अस्पताल पहुंचे। उन्होंने सीमा को कुछ रुपए का चेक चेक देना चाहा। सीमा ने मना कर दिया। आखिरकार सीमा के गर्भ में पल रहा बच्चा भी नहीं रहा। ओम पुरी जिंदगी भर उस अजन्मे बच्चे की मृत्यु से उबर नहीं पाए।

1993 में उन्होने भावावेश और तनाव में नंदिता से शादी की। दूसरी शादी भी असफल रही। नंदिता सें उन्हे एक बेटा हुआ ईशान पुरी। वे अपने बेटे से बहुत प्रेम करते थे। जब नंदिता पुरी ने उन पर एक किताब लिखी-अनलाइकली हीरो : द स्टोरी आॅफ ओम पुरी’ तो एक काफी हो-हल्ला हुआ। ओम पुरी का कहना था कि नंदिता ने बिना उन्हें बताए शोहरत और विवाद के लिए उनकी वैसी निजी बातें सार्वजनिक कर दी हैं जो ठीक नहीं है। वे दोबारा सीमा कपूर के पास लौटे। 2013 से नंदिता से उनका अदालत में विवाद चल रहा था। एक दुर्भाग्यपूर्ण तनावग्रस्त परिस्थिति में सिनेमा के इस महान कलाकार ने दुनिया को अलविदा कह दिया। वे अक्सर अपने बारे में कहते थे कि लगता है, ‘मुझे किसी चारपाई पर लिटाकर रस्सियों से बांध दिया गया है और मैं मुक्त होने के लिए तड़प रहा हूं।’ शायद यही ओम पुरी का अपना सच भी है। ०

 

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