artical about Thirteenth century famous poet, philosopher, Sufi saint, musician Amir Khusro - चल खुसरो घर आपने... - Jansatta
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चल खुसरो घर आपने…

कहते हैं, प्रतिभा कुछ तो अर्जित की जाती है और कुछ कुदरती होती है। तेरहवीं सदी के मशहूर शायर, दार्शनिक, सूफी संत, संगीतज्ञ अमीर खुसरो के बारे में यही कहा जा सकता है कि वे पैदाइशी प्रतिभावान थे। सात साल की उम्र से ही वे बेमिसाल शायरी करने लगे थे। सूफी संत निजामुद्दीन औलिया ने उन्हें अपना शागिर्द बनाया तो उनकी प्रतिभा चमक उठी। खुसरो ने करीब निन्यानबे ग्रंथों की रचना की, साहित्य को अनेक नई शैलियां दीं, संगीत के क्षेत्र में उन्होंने अनेक नए राग गढ़े, तो वाद्ययंत्रों में बदलाव कर उन्हें नई शक्ल दे डाली। ऐसे ही ढेर काम उन्होंने किए, जो आज भी उनके नाम के साथ कायम हैं। अमीर खुसरो की शख्सियत और उनके योगदान के बारे में बता रहे हैं प्रदीप शर्मा खुसरो।

Author February 11, 2018 4:18 AM
तेरहवीं सदी के मशहूर शायर, दार्शनिक, सूफी संत, संगीतज्ञ अमीर खुसरो।

प्रदीप शर्मा खुसरो

मीर खुसरो एक शायर, कहानीकार, व्यंग्यकार, शब्दकोषकार, भाषाविद, बहुभाषी, इतिहासकार, दार्शनिक, अखबारनवीस, पुस्तकालयाध्यक्ष, खुशनवीस, नीतिकार, गणितज्ञ, खगोलशास्त्री, ज्योतिषी, हकीम, महान संगीतज्ञ, जानवरों और परिंदों की जबान के ज्ञाता, बहादुर और कुशल फौजी योद्धा तथा बड़े सूफी संत थे। अमीर खुसरो की याददाश्त बहुत अच्छी थी। पहली दफा में जो कुछ भी वे सुनते थे, वह उन्हें फौरन याद हो जाता था। उन्होंने शायरी और संगीत का हुनर खुद-ब-खुद सीखा। वे बचपन से ही बहुत महत्त्वाकांक्षी और मेहनती थे। वे कई जबानों के उस्ताद थे। मसलन, फारसी, अरबी, तुर्की, पश्तो, दरी, पहलवी, संस्कृत, सराईकी, मुल्तानी, कश्मीरी, सिंधी, पंजाबी (पुरानी), हिंदवी या खड़ी बोली हिंदी और उसकी उपभाषाएं जैसे बृजभाषा, हरियाणवी, राजस्थानी, अवधी, भोजपुरी, मैथिली, गुजराती, मराठी, गूजरी, बांगरू, कौरवी, बघेली, बुंदेली, गढ़वाली आदि। बचपन से ही खुसरो का लेखन बेहद खूबसूरत था। छह बरस की उम्र में खुसरो मकतब यानी विद्यालय पढ़ने गए। बचपन से ही उन्होंने कुरान, हदीस, इस्लामी शरीअत या धार्मिक कानून, फलसफा (दर्शन शास्त्र), गीता, महाभारत, रामायण, वेद, पुराण, उपनिषद्, दर्शन शास्त्र, आयुर्वेद, यूनानी दवा आदि के गहन अध्ययन का मौका मिला। खुसरो जन्मजात फिलबदीं शायर यानी आशु कवि थे। वे मौके की नजाकत को समझ कर तुरंत कविता या तुकबंदी कर लेते थे। उन्होंने फारसी, हिंदवी (हिंदी खड़ी बोली) और पंजाबी में तकरीबन निन्यानबे ग्रंथ लिखे थे, जिनमें से अब केवल एक चौथाई ग्रंथों की ही खबर है। उनके इन ग्रंथों की उनके दौर से लेकर मुगल जमाने के आखिरी वक्त तक पूरी दुनिया में नकल की गई। इसीलिए खुसरो के ग्रंथों की पांडुलिपियां दुनिया के विभिन्न देशों के संग्रहालयों, पुस्तकालयों, दरगाहों, खानकाहों, संस्थाओं, निजी कुतुबखानों आदि में बिखरी पड़ी हैं।

हिंदी और उर्दू दोनों जबानों के खुसरो पहले शायरों में शुमार हैं। खुसरो की फारसी शायरी की शोहरत का यह आलम था कि पंद्रहवीं शती में अमीर तैमूर के पोते सुल्तान सैद बाईसंधार खान ने अपने पसंदीदा शायर सैफी को सारी दुनिया से अमीर खुसरो की फारसी शायरी जमा करने का मुश्किल कार्य सौंपा। बहुत धैर्य के साथ कवि सैफी ने पहले खुसरो के एक सौ बीस हजार फारसी शेर जमा किए। बाद में उन्होंने दो हजार शेर और खोज निकाले। हिरात के गवर्नर कवि अमीर अली शेर नवाई ने भी एक लंबे अर्से तक खुसरो के फारसी अशआरों को जमा किया। सेंट पीटर्सबर्ग में रखा अमीर खुसरो का नायाब कलाम आज तक हम हिंदुस्तानियों के पास नहीं पहुंचा। यह हमारा सरमाया या विरासत है और इसे हमारे पास भी होना चाहिए। भारत में अमीर खुसरो की सबसे प्राचीन पांडुलिपियां मद्रास (चेन्नई) के मदरसा-ए-मोहम्मदिया, बाग दीवान साहब, टीटीके रोड में सुरक्षित हैं। अमीर खुसरो जब सात साल के थे तब उनके पिता अमीर सैफुद्दीन महमूद उन्हें चिश्तिया सूफीमत के महान संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया का मुरीद बनाने, दिल्ली की गयासपुर बस्ती स्थित उनकी ख़ानकाह में ले गए, जो आज ‘चिल्ला निज़ामुद्दीन’ के नाम से मशहूर है। शायरी, संगीत, शाही दरबार और फौजी जंगों से अलग हट कर ये सूफी संतों की एक रूहानी दुनिया और थी खुसरो की जिंदगी में। अमीर खुसरो जैसे मोहब्बत भरे दिल को यहां रूह का सुकून मिलता था। उस जमाने की देहली के बाहर गयासपुर बस्ती में, जहां आज जमुना किनारे हुमायूं बादशाह का मकबरा है, यहां थे वे लोग जिन्होंने मन की शांति के लिए दीन के पैगाम से मोहब्बत बांटी और सभी धर्मों का सत निकाल कर दुखी आत्माओं के लिए मरहम बनाया। मुरीद बनाने के बाद हज़रत निज़ामुद्दीन ने जो उस वक्त करीब बाईस साल के थे, सात साल के खुसरो से पूछा कि आज से उन्हें एक गुरु, एक सरपरस्त मिल गया है, तो वे अब कैसा महसूस कर रहे हैं? उनके दिल में क्या खयाल आ रहे हैं? खुसरो ने इसका जवाब एक फारसी अशआर से दिया, ‘मन तू शुदम तू मन शुदी, मन-तन शुदम तू जान शुदी, ता कस न गूयद बाद अजीं, मन दीगरम तू दीगरी। खुसरो गरीब अस्तो गदा, उफतादा दर शहरे शुमा। बाशद की अज बहरे खुदा, सूए गरीबां बिन गरी।’ यानी ‘मैं’, ‘तू’ हो गया और ‘तू’ ‘मैं’ हो गया। मैं बदन हो गया और तू जान बन गया। हम दोनों अभी तक अलग-अलग जिस्म थे, जो इसी पल से एक जान हो गए हैं। अब यह किसकी मजाल है यह कह दे कि तेरा वुजूद और है और मेरा वुजूद और है। खुसरो एक गरीब (मुसाफिर) आदमी है, एक परदेसी फकीर है, जो तेरे इस अनजान और अनोखे शहर में चला आया है। शायद खुदा के नाम पर तुम खुसरो की तरफ कुछ कर्म की नजर करो।’

एक सात साल के बच्चे से इतना उम्दा फारसी शेर सुन कर हज़रत निज़ामुद्दीन ने फरमाया, ‘ऐ मर्दे हकीकत, आ जा आ जा। इस फकीर के सीने से लग जा और इसी दम से इसका हमराज हो जा।’ इस तरह हज़रत निज़ामुद्दीन ने खुसरो के हाथ पर अपना हाथ रख कर बैत किया, उन्हें अपना मुरीद बनाया तो खुसरो ने फौरन कुछ तंगा राशि उन्हें नजराने में दी। जिस दिन खुसरो, शेख निज़ामुद्दीन के मुरीद हुए उस दिन इत्तेफाक से होली का त्योहार था। इस दोहरी खुशी का इजहार करते हुए खुसरो ने एक हिंदवी गीत गाया- ‘‘आज रंग है ऐ मां रंग है री, मोरे महबूब के घर रंग है री। अरे अल्लाह तू है हर, मोहे पीर पायो निज़ामुद्दीन औलिया, अरे वो तो जहां देखो मोरे संग है री। जग उजियारो, जगत उजियारो, वो तो मुंह मांगे बर संग है री। देस विदेस में ढूंढ़ी फिरी हूं, आहे आहे आहे वा। ऐ तोरा रंग मन भायो निज़ामुद्दीन। मैं तो ऐसो रंग और नहीं देखी सखी री, वो तो जब देखो मोरे संग है री। सजन मिलावरा इस आंगन में, इस आंगन में, उस आंगन में।’’ अमीर खुसरो ने सोलह से उन्नीस वर्ष की अल्पायु में सन् 1271 ई. में अपना पहला फारसी दीवान ‘तोहफतुस्सिग्र’ (जवानी का तोहफा) पूरा किया। खुसरो की एक खासियत थी कि उन्होंने अपनी कमियों के बारे में भी सच्चाई से बयान किया है।

खुसरो की आशु कविता करने की प्रतिभा देख कर एक दिन उनके उस्ताद सादुद्दीन उन्हें एक विद्वान ख़्वाजा इज्जुद्दीन अजीज के पास ले गए। उस्ताद ने कहा, खुसरो उनके बहुत काबिल शागिर्द हैं, जो सुरीली आवाज में बहुत उम्दा शेर पढ़ता है। विद्वान ने फौरन एक किताब देकर, उसमें से शेर गाकर सुनाने की फरमाइश की। खुसरो ने गाकर शेर पढ़े। उनकी जादुई आवाज के असर से सबकी आंखें तर हो गर्इं और हर कोई उनकी तारीफ करने लगा। फिर विद्वान ने कहा कि चलो पढ़ना तो सुन लिया, अब जरा एक ताजा शेर तो कहो? उन्होंने खुसरो को चार अलग शब्द दिए- मू (बाल), बैजा (अंडा), तीर और खरबूजा। कहा, इन चारों बेमेल चीजों को एक अशआर में इस्तेमाल करके तो दिखाओ? खुसरो ने फौरन एक फारसी रूबाई सुनाई, ‘‘हर मूये कि दर दो जुल्फ, आं सनम अस्त। सद बैजे अम्बरी, बर आं मूये जम अस्त। चूं तीर मदां रास्त दिलश्रा जीरा, चुं खरबूजा ददांश मिया ने शिकस अस्त।’’ अर्थात महबूब की चोटियों में जो बाल हैं, उनमें सैकड़ों चमकदार अंडों जैसे मोती हैं। उसके दिल को तीर की तरह सीधा न समझो, क्योंकि खरबूजे की तरह उसके दांत भी पेट के अंदर हैं।’’
दीवान तोहफतुस्सिग्र की प्रस्तावना में खुसरो ने अपनी मिलनसार तबीयत और दरियादिली का ब्यौरा देते हुए लिखा है, ‘‘खाना खाने का वक्त छोड़ कर मैं कभी चुप नहीं रहता। मुझे जो भी शख्स मिलता है, मैं उससे खूब बातें करता हूं, बिना किसी जात-पात, अमीर-गरीब का भेद किए बिना। मैं गंवारों, गरीबों, आम और साधारण लोगों से जी भर कर बतियाता हूं और बच्चों को बहुत प्यार करता हूं। इन्हीं सब लोगों में मुझे इंसानियत के सच्चे गुण मिलते हैं। मैं हिंदुस्तान के सीधे, सच्चे, पवित्र और स्वाभिमानी आम लोगों को बहुत प्यार करता हूं बल्कि उन्हें पूजता हूं और यही मेरा शगल है। मुझे यह कहते हुए खुशी होती है कि खुश रहने के लिए ये सीधे-सादे, मासूम व भोले लोग काफी हैं। इन्हीं सबसे हिंदुस्तान का नाम दुनिया में सोने की चिड़िया है। अगर मेरे पास कभी कोई बगीचा होता तो उसमें फूलों, कुंजों और चश्मों के लिए कोई जगह नहीं होती। मैं तो सिर्फ इतनी जगह चाहता हूं कि जहां मैं खुलकर घूम-फिर सकूं और इन इंसानी फूलों का दर्द अपने सीने में छुपा लूं। ये मासूम, शर्मीले, उत्फुल्ल और फरिश्तों के से मिजाज वाले आम लोग और बच्चे ही, सही मानी या मायनों में हमारे वतन के बेला-चमेली हैं। जहां भी मैं जाता हूं, ऐसे ही लोगों की भीड़ मुझे घेर लेती है। मैं उनसे बातें करता हूं, उनके साथ हंसता-गाता हूं और खूब मजे उड़ाता हूं।’’
खुसरो ने अपनी मां के अलावा इन्हीं आम लोगों से हिंदवी सीखी। दिल्ली के कालका जी मंदिर से अमीर खुसरो ने, अपने उदास गुरु को खुश करने के लिए, बसंत पंचमी का प्राचीन हिंदू त्योहार मनाने का रिवाज शुरू किया।

खुसरो ने सुलतानों के साथ कई फौजी मुहिमों में जंगें भी लड़ीं। वे शूरवीर योद्धा भी थे। शहजादे मुहम्मद के साथ मुल्तान में अमीर खुसरो एक मंगोल तातारी द्वारा बंदी भी बनाए गए थे, मगर वे ईश्वर की कृपा से जल्दी अजाद हो गए थे। सुलतान बलबन के चचेरे भाई खानेजहां अमीर अली सरजानदार के साथ खुसरो अवध में दो साल रहे। वहां अमीर खुसरो ने मसनवी फिराकनामा लिखी। इसमें अमीर खुसरो ने भगवान श्रीराम और उनकी जन्मभूमि अवध (अयोध्या) तथा लक्ष्मण और माता सीता की तारीफ में करीब 180 शेर हैं। मसनवी फिराकनामा की भारत में कोई पांडुलिपि नहीं है। इसकी एक दुर्लभ खूबसूरत पांडुलिपि तुर्की की राजधानी इस्तांबुल की सुलयमानिया लाइब्रेरी में है। पांडुलिपि संख्या 3912 है। यह मंगलवार रात, सन 1278 ई. को लिखी गई। हिंदी साहित्य में अमीर खुसरो ने कई नई विधाएं आविष्कृत कीं। जैसे बूझ पहेलियां, बिन बूझ पहेलियां, दोहा पहेलियां, निस्बतें, दो सखुने हिंदवी, दो सखुने फारसी-हिंदी मिश्रित, ढकोसले या तुकबंदी, अनमेलियां या चौबोले, पद्यमय नुस्खे, नसीहत, हंसोड़, फारसी-हिंदी मिश्रित कते, गजलें और पद, चुटकुले, सनअते मुनकलिब, ईहाम (श्लेष), चीस्तान (लुग्ज), मुखम्मस, मुसल्लस आदि। इसके अलावा खुसरो ने फारसी और हिंदी में दोहे, गीत, गजलें, हम्द, नात, मनकबत, मर्सिया, चीस्तान (पहेली), किस्सा, रागमाला आदि पहले से मौजूद विधाओं में भी लिखा।

कुछ के नमूने : पहेली- उज्जवल बरन अधीन तन, एक चित्त दो ध्यान। देखत मैं तो साधू है पर निपट पाप की खान। जवाब- बगुला पक्षी।
निस्बत- आदमी और गेहूं में क्या निस्बत (समानता) है? जवाब- बाल।
सखुने-हिंदवी- घर क्यों अंधियारा? फकीर क्यों बिगड़ा? जवाब- दिया न था। दिया- देना, दिया- दीपक या चिराग।
कहमुकरी- वो आवे तब शादी होवे, उस बिन दूजा और न कोय/ मीठे लागे वाके बोल, ऐ सखी साजन न सखी डोल।
ढकोसला- खीर पकाई जतन से और चरखा दिया चलाय? आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजाय, ला मोहे पानी पिलाय।
दोहे- पंखा होकर मैं डुली, साती तेरा चाव/ मुज जलती का जनम गया, तेरे लेखन बाव।
मर्सिया- सेज सूनी देख के, रोवत मैं दिन-रैन/ पिया-पिया कहती मैं, पल भर सुख न चौन।
गीत (विदाई)- काहे को ब्याही बिदेस, अरे सुन बाबुल, हम तो हैं बाबुल तोरे बेले की कलियां, रे घर घर मांगी जाए रे, सुन बाबुल मोरे हम तो बाबुल तोरे पिंजरे की चिड़िया, अरे कुहुक-कुहुक रह जाएं, अरे सुन बाबुल मोरे, हम तो बाबुल तोरे खूंटे की गइया, हांको जिधर हंक जाए, अरे सुन बाबुल मोरे।
फारसी-हिंदवी मिश्रित गजल- जिहाले मिस्कीं मकनु तगाफुल, दुराय नैंना बनाय बतियां/ किताबे हिजरां, न दारम ऐ जां, ना लेहू काहे लगाय छतियां/ शबाने हिजरां दराज चूं जुल्फ व रोजे वस्लत चूं उम्र कोतह/ सखी पिया को जो मैं ना देखूं तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां/ यकयक अज दिल दो चश्मे जादू, बसद फरेबन बबुर्द तस्कीं/ किसे पड़ी है जो जा सुनावे, पियारे पी को हमारी बतियां।
भगवान श्रीकृष्ण भक्ति गीत- बन के पंछी भए बावरे/ कैसी बीन बजाई सांवरे/ तार-तार की तान निराली, झूम रही सब बन की डाली/ पीर निजामुद्दीन बीन बजावें, खुसरो निजाम सब मिल गावें।
भगवान श्रीराम भक्ति पंक्ति- शोखिए हिदू बबी कू दिन बेबुर्द, अज खास ओ आम/ राम इ मन हरगिज न शुद, हरचंद गुफतम राम राम यानी हर खास और आम व्यक्ति यह बात भलीभांति समझ ले, राम हिंद के एक शानदार शख्स हैं। राम तो मेरे दिल में बसे हैं। वे मुझसे हरगिज अलग न होंगे और मैं जब भी बोलूंगा तो राम-राम बोलूंगा।
किताबों में प्रस्तावना लिखने का रिवाज सर्वप्रथम अमीर खुसरो ने शुरू किया। दुनिया का पहला फारसी से हिंदवी पद्यमय शब्दकोष ‘खालिक बारी’ के नाम से खुसरो ने लिखा। अपने गुरु हज़रत निज़ामुद्दीन के आग्रह पर अमीर खुसरो ने भगवान कृष्ण पर एक गद्य पुस्तक हिंदी में, ‘हालाते कन्हैय्या व किशना’ के नाम से लिखी थी।

संगीतज्ञ खुसरो

हिंदुस्तानी संगीत में अमीर खुसरो का बहुमूल्य योगदान है। उन्होंने सितार और तबला वाद्य यंत्रों का आविष्कार किया। उन्होंने तानपुरा और वीणा के संयोग से सितार बनाया। उस वक्त तंबूरे पर गाना और वीणा बजाना कष्टकर प्रतीत होने लगा था। इसलिए खुसरो ने तानपुरे से झंकार और वीणा से सप्तस्वरों को लेकर और दोनों वाद्यों को मिला कर सितार बनाया। वीणा में दो तोम्बे, सात तार तथा उन्नीस पर्दे होते हैं, मगर खुसरो ने इसमें एक तोंबा चौदह पर्दे रख कर तीन तार कायम किए। उन्होंने सितार में केवल बाईस कायदे कायम किए। हिंदुस्तानी संगीत में खुसरो ने नई विधाएं भी आविष्कृत कीं, जैसे कौल, कव्वाली, तराना, खयाल, नक्शोगुल, नक्शो निगार, बसीत, तिरवट, चतुरंग, सुहेला, सवेला, कल्बाना, हवा, आदि। उन्होंने सत्रह तालों का आविष्कार किया, जैसे अव्वल खम्सा, सूल फाख्ता, फरोदस्त, सवारी, चपक, पहलवान, जनानी सवारी, पश्तो, कव्वाली ताल आदि। खुसरो ने ईरानी फारसी और भारतीय रागों के मिश्रण से नए रागों का आविष्कार किया। जैसे राग मुजीब- गारा और अन्य फारसी धुनें, राग साजगिरी- पूर्वी, गोरा, गुनकली और एक फारसी आहंग। राग यमन- हिंडोल और नैरेज, राग उश्शाक- सारंग, बसंद और नवा। राग मुवाफिक- तोड़ी, मालश्री, दुर्गा और हुसैनी। राग गनम- पूर्वी का परिवर्तित रूप। राग जीलफ- राग खत और शहनाज। राग फरगाना- गुनकलियंद और राग गोरा। राग सरपरदा- सारंग, रास्त और बिलावल, राग बागरू- देशकर और एक फारसी आहंग। खुसरो ने संगीत का उल्लेख मसनवी नूह सिपहर (नौ आसमान), मस्नवी किरानुस्सादैन (दो शुभ सितारों का मिलन), मसनवी देवल रानी खिज्र खान और अपने फारसी ग्रंथ ‘ऐजाजे खुसरवी’ (खुसर के चमत्कार) में किया है। सितार वाद्य का पूरा विवरण ऐजाजे खुसरवी में है। लयकारी को अमीर खुसरो ने बाकायदा ज्ञान के तौर पर पेश किया है। इसका छोटा-सा खाका यों है, कि अमीर खुसरो ने कहा, ‘उसूल मुनहसिर व चहार अस्त व तमाम अकी फिरोइस्त’ यानी लय की बुनियाद चार उसूलों पर है। बाकी सब उसकी शाखें हैं। ये चार उसूल हैं- ‘तन, तना, त न न, त न न न’ यानी त न की आवाज लगाने में जो वक्त लगे वह लय की ईकाई है, जिसे अमीर खुसरो जमान कहते हैं। चार उसूलों को अमीर खुसरो ने दरअसल लय के अरबी और ईरानी कायदों से लिया और दक्षिण एशिया में मौजूद कायदों को इनसे मिला कर फन और जमाल की ऐसी इमारत बनाई कि दक्षिण एशिया में लय की सूरत ही बदल गई। अमीर खुसरो का इंतकाल दिल्ली में बहत्तर साल की उम्र में सन 1325 में हुआ।

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