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विमर्शः भाषा प्रयोग में मनमानी

समाजशास्त्रीय दृष्टि से विचार करते हुए प्रमाणित हो चुका है कि भाषा लोकजीवन के विविध प्रसंगों में प्रवहमान रह कर समृद्धि पाती है, भिन्न-भिन्न प्रयुक्तियों से संपन्न होती है; बुद्धिजीवियों, वैयाकरणों और भाषाशास्त्रियों के सहयोग से लिखित रूप में आकर स्थिरता पाती है; और राजसत्ता द्वारा मान्य होकर सर्वस्वीकृत हो जाती है।

Author September 2, 2018 6:26 AM
जिस भारत की प्राचीन धरोहरों की ओर पश्चिमी विचारक खिंचे चले आते हैं, वहां के नागरिक अपनी परंपराओं को भदेस और पिछड़ा मान कर त्यागने में लगे हुए हैं। अपनी भाषा के प्रति ऐसा विराग-भाव तो शायद ही दुनिया के किसी खंड में हो।

देवशंकर नवीन

हर भाषा के विकास और प्रचार-प्रसार में ‘लोक’ की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। समाजशास्त्रीय दृष्टि से विचार करते हुए प्रमाणित हो चुका है कि भाषा लोकजीवन के विविध प्रसंगों में प्रवहमान रह कर समृद्धि पाती है, भिन्न-भिन्न प्रयुक्तियों से संपन्न होती है; बुद्धिजीवियों, वैयाकरणों और भाषाशास्त्रियों के सहयोग से लिखित रूप में आकर स्थिरता पाती है; और राजसत्ता द्वारा मान्य होकर सर्वस्वीकृत हो जाती है। इन तीन चरणों से जो भाषा बार-बार गुजरती है, उसका विकास सर्वाधिक होता है। हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी का यह सौभाग्य है कि इसे ये तीनों अवसर निरंतर प्राप्त होते रहे। पर इसका दुर्भाग्य साथ-साथ चलता आ रहा है कि लोकजीवन के प्रयोगशील क्षणों को छोड़ कर, शेष दो क्षणों में यह पल-पल छद्म का शिकार होती गई।

सन 1955 में प्रथम राजभाषा आयोग का गठन हुआ। 1956 में इस आयोग द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट पर संसद के दोनों सदनों ने विचार किया और राष्ट्रपति के पास वह रिपोर्ट भेजी गई। राष्ट्रपति की अनुशंसा पर प्रथम राजभाषा आयोग की रिपोर्ट के अनुसार अनुच्छेद 343 के अधीन संसद ने राजभाषा अधिनियम, 1963 बनाया। अनुच्छेद 351 के अधीन संघ का यह कर्तव्य बताया गया कि वह हिंदी भाषा का प्रसार और उसका विकास करे ताकि वह भारत की मिली-जुली संस्कृति के सभी तत्त्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके। यह भी बताया गया कि उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिंदुस्तानी के, और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं के प्रयुक्त रूप, शैली और पदों को आत्मसात करे, जहां आवश्यक या वांछनीय हो, वहां उसके शब्द-भंडार के लिए मुख्यतया संस्कृत और गौणतया अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे। भाषा संबंधी उपबंधों का अंतिम लक्ष्य हिंदी का प्रचार-प्रसार करना और शासकीय प्रयोजन तथा संपर्क भाषा के रूप में हिंदी को प्रतिस्थापित करना माना गया।
समस्त संवैधानिक सूचनाएं भी मोटे तौर पर यही जानकारी देती हैं कि हिंदी भाषा के विकास और प्रचार-प्रसार की अनंत संभावनाएं, लोकजीवन की शब्दावलियों में, हिंदी क्षेत्र की विभिन्न उपभाषाओं के शब्दों में और अन्य भारतीय भाषाओं के शब्द-भंडार में दिखती है। विद्यापति-पदावली, रामचरितमानस या ऐसे अन्य किसी भी सर्वप्रचलित कृति के शब्द-भंडार का अवलोकन करें, तो यह तथ्य और स्पष्ट हो उठता है।

पर परांगमुखी हम भारतीयों की गुलाम मानसिकता को कौन समझाए कि सब कुछ का स्वामी होने के बावजूद, अपनी राष्ट्रभाषा से दूर रहने का तमगा उनके गले लटका हुआ है। लोक-प्रचलित तथ्य है कि क्षेत्रीय बोलियों, संस्कृत या पड़ोसी राज्य की मातृभाषाओं से लिए गए शब्दों से हिंदी भाषा की सहजता और प्रवाहमयता बढ़ेगी; संवैधानिक निर्देश भी इस बात की पुष्टि करते हैं, पर हम भारतीय हैं कि लगातार अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग से अपनी भाषा को दूषित करते जा रहे हैं।
किसी भी भाषा के प्रचार-प्रसार में संचार माध्यमों की अहम भूमिका होती है। जब से मुद्रण और ध्वन्यंकन के जरिए आम जन तक सूचनाएं पहुंचाने की बात आई, यह बात और मुखर हो उठी। असल में साधारण जनता के भाषा-संस्कार का विकास या ह्रास इस बात पर निर्भर करता है कि वह क्या सुनता है, क्या पढ़ता है, क्या देखता है। पुराने लक्षण ग्रंथों में भी यह प्रमाण दिया जा चुका है कि रंगमंच के माध्यम से किसी भाव या घटना विशेष का प्रभाव लोकमानस पर गहरा पड़ता है। यह प्रभाव केवल घटना और मुद्रा-भंगिमा का नहीं; भाषा का भी होता है।

मुद्रित सामग्री के रूप में आज हमारे सामने दो दृश्य हैं- सस्ती लोकप्रियता की धारणा और गलीज मानसिकता से लिखी-छपाई गई घटिया पुस्तक-पुस्तिका-पत्रिकाएं, पीत-पत्रकारिता की सामग्री और श्रेष्ठ साहित्य। पहली कोटि की मुद्रित सामग्री हमारे समाज के भाषा-संस्कार और चिंतन-प्रणाली को किस तरह दूषित कर रही है, पूरी की पूरी किशोर पीढ़ी हमारे यहां कैसे बर्बाद हो रही है, यह बात किसी से छिपी नहीं है। इंटरनेट पर ये सब काम पहले तो हिंदी में नहीं होते थे, पर अब हिंदी की दुनिया भी इस दिशा में किसी से पीछे नहीं है।

सब जानते हैं कि संचार-माध्यमों का काम केवल सूचना पहुंचाना नहीं होता। हर समय का संचार-माध्यम एक सभ्य सामाजिक व्यवस्था का सृजन करता है। संचार-माध्यम अपने समय की लोकसत्ता और राजसत्ता- दोनों के जिज्ञासु मन का गुरु और उद्दंड मन का नियंत्रक होता है। सभ्य नागरिक और ज्ञानी शासक के बिना कहीं भी एक अच्छी सामाजिक व्यवस्था की कल्पना नहीं की जा सकती और कोई भी नागरिक श्रेष्ठ भाषा-संस्कार के बिना सभ्य और ज्ञानी नहीं हो सकता। मात्र तीन दशक पहले के संचार-माध्यमों को याद करें, तो उक्त बातें साफ दिखने लगती हैं। समय, उच्चारण और व्याकरण के लिए हमारे यहां रेडियो को प्रमाण माना जाता था, पर आज जिस खिचड़ी भाषा का प्रयोग रेडियो-दूरदर्शन में हो रहा है, उसे सुन कर भाषा-शिल्प के मामले में सजग व्यक्ति अपनी संतानों और शिष्यों को सावधान करते दिखते हैं कि वे अपना भाषा-संस्कार रेडियो-दूरदर्शन की वजन पर न बनाएं।

दूरदर्शन और रेडियो में भाषा-संस्कार का राजपाट संभालने वाले अधिकारियों-कर्मचारियों का कथन है कि भाषा का मूल उद्देश्य है संप्रेषण। इसलिए संचार-माध्यमों में संप्रेषण का ध्यान रखना जरूरी होता है। इन अधिकारियों की इस तरह की उक्ति में कितनी बड़ी विडंबना है कि वे अपनी एक पंक्ति के उद्धरण से अपने समस्त पूर्वजों के किए-कराए पर पानी फेर देते हैं। संप्रेषण मात्र, न तो संचार-माध्यमों का लक्ष्य होता, न भाषा का उद्देश्य। हजारों-हजार वर्षों की लंबी विकास-प्रक्रिया में मानव-सभ्यता जहां आ पहुंची है, वहां भाषा और संप्रेषण का सौष्ठव साथ-साथ न दिखे, तो न तो किसी संचार-माध्यम की कोई आवश्यकता है और न ही किसी भाषा परिवार की। व्यावसायिक उन्नति को ध्यान में रख कर परिवेश के तमाम व्यापार इन दिनों राष्ट्रभाषा हिंदी की दुर्दशा करने में लिप्त हैं; नागरिक परिवेश से लेकर प्रशासनिक मंडल तक इस कृत्य में जी-जान से जुटे हुए हैं। वे सोचने को राजी नहीं हैं कि यह भाषा उनकी निजी पहचान है, क्योंकि अपनी भाषिक-साहित्यिक गरिमा से ही किसी राष्ट्र की सांस्कृतिकता ऊंची होती है। भाषिक धरोहर के प्रति समकालीन नागरिकों की ऐसी विरक्ति निश्चय ही आत्मघाती है।

जिस भारत की प्राचीन धरोहरों की ओर पश्चिमी विचारक खिंचे चले आते हैं, वहां के नागरिक अपनी परंपराओं को भदेस और पिछड़ा मान कर त्यागने में लगे हुए हैं। अपनी भाषा के प्रति ऐसा विराग-भाव तो शायद ही दुनिया के किसी खंड में हो। हिंदी लिखने-बोलने वालों को वर्तमान भारतीय परिवेश में अबौद्धिक और भदेस समझने वाला हमारा समाज अवनति के जिस मार्ग पर चल पड़ा है, उसे कौन सद्बुद्धि दे, यह दिख तो नहीं रहा। कार्यालयों में काम करने वाले लोग अशुद्ध और हास्यास्पद अंग्रेजी बोल कर अपना गौरव बढ़ाते हैं, पर शुद्ध हिंदी बोलना-लिखना तौहीन समझते हैं। याद रहे कि मौलिकता का त्याग, अपनी पहचान का त्याग है; पहचानविहीन मनुष्य राह का लुढ़का पत्थर होता है, जिसे कोई भी ठोकर मार सकता है।

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