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कहानीः और वह भाग गया

रमाकांत ने कॉलर से पकड़ कर चोर को ढसाढस कई लात-घूंसे जड़ दिए। चोर दुकान के बाहर फर्श पर कोने में जा गिरा था। नाक से खून निकल आया था।

Author July 31, 2016 2:22 AM

रमाकांत ने कॉलर से पकड़ कर चोर को ढसाढस कई लात-घूंसे जड़ दिए। चोर दुकान के बाहर फर्श पर कोने में जा गिरा था। नाक से खून निकल आया था। इस बीच पूछताछ करने और चोर की खबर लेने वालों की संख्या बढ़ती जा रही थी। घटना का ब्योरा लेने के बाद चोर जैसे निरीह प्राणी पर कोई भी अपनी ताकत आजमाने से कैसे चूक सकता था! ऊपर से मामला पास-पड़ोस और जनहित का था।
रमाकांत की हार्डवेयर की दुकान में चोर तब पकड़ा गया जब रमाकांत रात में दुकान को ताला लगाने आया। अंदर कुछ खटपट सुनाई दी। घर दुकान के ऊपर ही था। कभी रात को वापस बिखरा हुआ सामान जमाने लौटना होता, तो रमाकांत शटर गिरा कर खाना खाने चला जाता। वापस आकर हिसाब-किताब लगाता। दस बजे के बाद ही दुकान में ताला लगता। बाजार का रास्ता था और आमने-सामने वाले सभी पुराने पड़ोसी थे, इसलिए गिरा हुआ शटर उठा कर सामान उठा लेने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था।
‘जरूर बिजली के कट का फायदा उठा कर अंदर घुसा होगा।’
‘अरे ये लोग पहले कई दिन तक इलाके का जायजा लेते हैं, तब चोरी करते हैं।’
‘लगता तो नहीं है इतना अकलमंद, वरना चोर क्या ऐसे पकड़े जाते हैं।’
अपनी-अपनी समझ से लोग राय दे रहे थे।
चोर मरियल-सा था। शक्ल से कहीं बाहर का जान पड़ता था।
‘क्यों बे कहां का है…?’ चोर के जवाब देने का इंतजार किए बिना जमनालालजी ने एक तमाचा रसीद कर दिया था। जमनालाल खुद सींकिया पहलवान थे। शाम ढलते ही दो-एक पैग खींच लेते थे। तमाचा लगाते हुए उनके खुद के गिर जाने का खतरा बना हुआ था, पर संतुलन साध कर उन्होंने दूसरा तमाचा रसीद कर ही दिया था और बाजू पलटते हुए अपने से कम उम्र वालों के बीच जवानी के किस्से बयान करने लगे थे।
‘ये पूरबिए होते ही चोर हैं…’ जमनालाल के समर्थन में एक आवाज आई थी।
‘बोलने की बातें हैं जी… इन्ही लोगों के आने से लेबर-मिस्त्री मिलने लगे हैं… जीतोड़ मेहनत करते हैं बेचारे… हमने तो कभी किसी पूरबिए को चोरी करते नहीं देखा… और चोर की कोई जात होती है क्या…’
‘… आप भी… घर से बाहर तो निकलते नहीं… मंदिर से चोरी हुई अंगीठियां और दरियां इन्हीं लोगों के कमरे से मिली थीं…।’
‘… भई, अपने यहां के क्या कम हैं… दुनिया भर के चोर-नशेड़ी… मैं कहता हूं सारा काम ठप हो जाए पूरबिए न हों तो… लेबर आजकल मिलती कहां है। … मनरेगा का टंटा ऊपर से अलग है… लोकल दिहाड़ीदार तो भूल जाओ अब।…’
जनतंत्र में सबको अपनी राय रखने का अधिकार है। ढेरों न्यूज चैनल आ जाने से आम आदमी की तर्क शक्ति और विशेष टिप्पणी देने की क्षमता विकसित हुई है।
चोर बेचारा सिटपिटाया-सा दोनों हाथों से सिर पर कवच बनाए अगले हमले को झेलने के इंतजार में गठरी बना पड़ा हुआ था। ठीक वैसे ही जैसे कोई बेचारा सांप हमलावरों को भांप कर कुंडली मार कर बैठ जाता है।
‘देखने में तो लगता है कि इस जैसा शरीफ कहीं ढूंढ़ने से नहीं मिलेगा।’ जम्मू लाला ने सीमेंट के थड़े पर बैठते हुए कहा। ‘क्यों बे… देयां तैनू इक रख के… जान ते है नी तेरे विच… फुटबाल वर्गा जाउगा उड़दा-उड़दा…’ लालाजी अपने एक क्विंटल के शरीर को अभी कष्ट देने की स्थिति में नहीं थे। जल्दबाजी भी कोई नहीं थी। आखिर चोर कौन-सा भागा जा रहा था। हार्डवेयर की दुकान रमाकांत की थी। वह तो शुरू में ही हाथ आजमा कर फारिग हो चुके थे, इसलिए इत्मिनान से वहां पहुंचने वाले हर व्यक्ति से घटना का विश्लेषण कर रहे थे। इस घटना के चलते चोर के बाद उन्हीं को सबसे ज्यादा अहमियत मिल रही थी। इस बीच दामोदर पंडित ने सलाह दी- ‘पुलिस को फोन कर देना चाहिए। हालत देखो इसकी, कहीं मर-खप गया तो लेने के देने पड़ जाएंगे।’
पंडित व्यापार मंडल के प्रधान रह चुके थे। पुलिस थाने में अच्छी-खासी जान-पहचान थी। रमाकांत के सहमति में सिर हिलाते ही तुरंत फोन मिलाना शुरू कर दिया।
इतने में कहीं से शास्त्री अपना छोटा हाथी लेकर प्रकट हो गया था। उसके कैरियर आॅटो के पीछे लिखा था ‘बड़ा होकर ट्रक बनूंगा’। टॉप गेयर में फट-फट करता निकला तो मजमा देख कर बीच सड़क में कस कर ब्रेक लगा दी। कभी रवि शास्त्री की तरह क्रिकेट के मैदान में आल राउंडर था। तभी से शास्त्री नाम चल निकला था। अब एक नंबर का दारूबाज और बाजार भर के लिए फ्री का एंटरटेनमेंट चैनल था। चोर का नाम सुनते ही शास्त्री डॉन बन गया था।
‘बुर्रर्रर्र… अपणे इलाके में चोर… हट जाओ… कित्थे है ओ पैण दा दिना… लालाजी… मैनू दस्सो जरा…’
‘ओए शास्त्री अप्पे ते सीधा खड़ा हो जा पैले।’ लालाजी उसे हवा देते हुए बोले।
‘शास्त्री की बैटिंग नहीं देखी लालाजी आपणे अबी तक। आज आप वी देख लो… ओए चोर खड़ा हो जा साले, आज शास्त्री की बैटिंग देख ले तू बी।’ बालों से पकड़ कर चोर को ऊपर उठाया शास्त्री ने और पीछे से घुमा कर लात जमा दी। चोर सड़क पर औंधे मुंह जा गिरा और वैसे ही पड़ा रहा। शास्त्री लड़खड़ाता हुआ आगे आया।’ साला बहुत नौटंकी करता है। उठ ऊपर उठ… हिम्मत है तो शास्त्री से आंख मिला कर बात कर साले…’ अब शास्त्री ने उसे कॉलर से पकड़ कर अपने सामने कर दिया था। चोर क्या आंख मिलाता, वह घिघिया रहा था और शास्त्री उसे पकड़ कर नशे की झोंक में आगे ठेल रहा था। लोग अपनी-अपनी जगह पर बैठे लोट-पोट हो रहे थे।
किसी ने बीच में चुटकी ली- ‘ओए शास्त्री… बैटिंग आर्डर में तेरा नंबर छठा है। अभी लाइन में कई बाकी हैं शॉट लगाने वाले…।’ अब शास्त्री पर एंग्री यंग मैन का भूत चढ़ आया था- ‘लाइन वहीं से शुरू होती है जहां शास्त्री खड़ा होता है… बुर्रर्रर्र…।’ इधर लोगों ने ठहाका लगाया, उधर शास्त्री ने चोर को आगे ठेल दिया।
अरे…रे रे… भागा भागा… पकड़ो पकड़ो… पकड़ो साले को…
बस जैसे कमान से तीर निकलता है वैसे ही सर्र से चोर भागा था। पीछे चार-पांच जवान छोकरे दौड़े थे। लेकिन कमान से निकला तीर कभी हाथ आता है क्या।
‘साला… मरने को हो रहा था… मिनटों में मिल्खा सिंह बन गया… सारी शास्त्री की मेहरबानी है… लगाओ इसको भी पकड़ कर…।’ दामोदर पंडित ने कहा।
इतने में पुलिस की जीप आ पहुंची थी और शास्त्री मैदान छोड़ कर पतली गली से खिसक चुका था। थानेदार ने एक कांस्टेबल को रमाकांत का बयान दर्ज करने के लिए छोड़ कर जीप उस दिशा में घुमा ली थी, जिस ओर चोर भागा था। पर चोर भी क्या उन रास्तों पर भागते हैं, जिन रास्तों पर पुलिस की जीप भागती है!
इधर बिजली के कट लगने से लोग परेशान थे। लोग आसपास की बंद दुकानों के थड़े पर अपनी सुविधा से गप्पबाजी करते हुए समय बिता रहे थे। कुछ महिलाएं भी वहां इकट्ठा हो चुकी थीं। वे अब अपने मनपसंद सीरियल के छूट जाने की पीड़ा बयान कर रही थीं। बच्चे गलियों में दौड़ते या खाली सड़क पर साइकिल चलाते मस्त थे। टीवी चलते नहीं थे, सो बाजार के लोगों को शगल हो गया था। आज थड़े पर देर रात तक चोर पुराण के कई पुराने अध्याय खुलते चले गए थे। ०

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