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उजड़ते पहाड़, वीरान होते गांव

उत्तराखंड राज्य को बने अठारह साल हो गए। नया राज्य बनने के बाद उम्मीद जगी थी कि वहां विकास कार्यों में तेजी आएगी, शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं बेहतर होंगी। रोजगार के नए अवसर उपलब्ध होंगे। मगर हुआ इसका उलट है। यही वजह है कि उत्तराखंड से पलायन बढ़ा है। वहां के करीब आठ सौ गांव पूरी तरह वीरान हो चुके हैं। हालांकि रोजगार के लिए पलायन देश के सभी हिस्सों में बढ़ा है, पर उत्तराखंड में यह स्थिति ज्यादा चिंताजनक है। वहां क्यों इतनी तेजी से पलायन बढ़ रहा है, विश्लेषण कर रहे हैं सुनील दत्त पांडेय।

उत्तराखंड राज्य गठन के बाद जितनी भी सरकारें बनी हैं उन्होंने विकास की मुख्य धुरी पर्वतीय जिलों के गांवों को बनाने के बजाय सूबे के तीन मैदानी जिलों देहरादून, हरिद्वार और उधमसिंह नगर को बनाया है

उत्तराखंड राज्य का निर्माण पहाड़ की जवानी और पहाड़ के पानी का उपयोग इस पर्वतीय सूबे के विकास की उम्मीदों को लेकर किया गया था। पर बीते अठारह सालों में पहाड़ की जवानी और पानी दोनों ही राज्य के विकास में काम नहीं आए और पहाड़ से पलायन आज भी जारी है और उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी अपने को ठगा-सा महसूस कर रहे हैं। अठारह साल पहले उत्तराखंड राज्य के निर्माण के वक्त पहाड़ों की समस्याओं को लेकर जो मुद्दे- रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य- उठे थे, वे आज भी ज्यों के त्यों खड़े हैं। इन अठारह सालों में सूबे में जो भी सरकार बनी उसने पहाड़ से पलायन को रोकने की बड़ी-बड़ी बातें की, पर धरातल पर कुछ नहीं किया। उत्तराखंड की मौजूदा त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार ने पलायन की समस्या को लेकर छह महीने पहले ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग का गठन किया था। आयोग के उपाध्यक्ष एसएस नेगी ने अपनी पहली अंतरिम रिपोर्ट जारी की है। जिसने उत्तराखंड के पहाड़ों से लगातार हो रहे पलायन की तस्वीर खोल कर रख दी है। साथ ही आयोग ने पहाड़ों में पलायन रोकने के तरीके भी सुझाए हैं। ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग उत्तराखंड की अंतरिम रिपोर्ट के मुताबिक उत्तराखंड की 7950 ग्राम पंचायतों का सर्वे इस साल जनवरी-फरवरी महीने में ग्राम्य विकास विभाग की टीम ने किया।

आयोग की इस सर्वे टीम ने सूबे के गढ़वाल मंडल के सात जिलों उत्तरकाशी, चमोली, टिहरी, पौड़ी गढ़वाल, रुद्रप्रयाग, देहरादून और हरिद्वार तथा कुमाऊं मंडल के छह जिलों अल्मोडा, चंपावत, नैनीताल, पिथौरागढ़, बागेश्वर और उधमसिंह नगर का सघन दौरा किया। सूबे के सभी तेरह जिलों की जनता से सीधा संवाद कायम किया गया और जनसंवाद के जरिए पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन के विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श किया। आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक सूबे में ग्राम पंचायत स्तर पर लोगों का मुख्य व्यवसाय खेती तैंतालीस फीसद और मजदूरी तैंतीस फीसद है। आयोग की टीम ने सर्वे में पाया कि पिछले एक दशक में 6338 ग्राम पंचायतों से तीन लाख तिरासी हजार 726 लोग अस्थाई तौर पर रोजगार की तलाश में पहाड़ी क्षेत्रों से सूबे के ही मैदानी क्षेत्रों या उत्तर प्रदेश के बरेली, मुरादाबाद, लखनऊ, दिल्ली मुंबई और अन्य शहरों में पलायन कर चुके हैं। ये लोग छुट्टियों में बीच-बीच में पहाड़ आते-जाते रहते हैं। लेकिन रोजगार के लिए अस्थायी तौर पर घर से बाहर रहते हैं।

पलायन आयोग की रिपोर्ट का दूसरा भाग सबसे चौंकाने वाला है, जिसमें बताया गया है कि पिछले दस सालों में तीन हजार नौ सो छियालीस ग्राम पंचायतों से एक लाख अठारह हजार नौ सौ इक्यासी लोग स्थाई तौर पर पलायन कर चुके हैं। पचास फीसद लोगों ने आजीविका और रोजगार की समस्या को लेकर, पंद्रह फीसद लोगों ने शिक्षा की सुविधा न होने के चलते और आठ फीसद लोगों ने चिकित्सा सुविधा के अभाव की वजह से पलायन किया है। पलायन करने वालों की तादाद उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों खासकर चीन और नेपाल की सीमा से सटे गांवों से ज्यादा है, जो देश की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा की दृष्टि से भी बेहद संवेदनशील और चिंता का विषय है।

आयोग की रिपोर्ट बताती है कि गांवों से पलायन करने वालों में पैंतीस साल से अधिक उम्र के युवकों की बयालीस फीसद, पच्चीस साल से अधिक आयु वर्ग की उनतीस फीसद और पच्चीस साल से कम आयु वर्ग की अट्ठाईस फीसद है, जो अत्यंत चिंता का विषय है। इस तरह भारी तादाद में युवा रोजगार की तलाश में पहाड़ छोड़ कर मैदानी क्षेत्रों में जा रहे हैं। आयोग की रिपोर्ट बताती है कि सत्तर फीसद लोग पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन करके उत्तराखंड के मैदानी जिलों में रोजगार हासिल करने गए हैं। उनतीस फीसद लोगों ने उत्तराखंड छोड़ कर अन्य राज्यों में रोजगार की तलाश में निकल गए हैं। एक फीसद लोग देश से बाहर रोजगार की तलाश में गए। इससे साबित होता है कि उत्तराखंड के लोग विदेशों में नौकरी करने की बजाय अपने देश में ही नौकरी करना पसंद करते हैं।

राज्य में साढ़े आठ सौ ऐसे गांव हैं, जहां पर पिछले एक दशक में अन्य शहरों, गावों और कस्बों से पलायन कर लोग इन गांवों में आकर बसे। राज्य में पांच सौ पैंसठ ऐसे गांव हैं, जिनकी आबादी 2011 के बाद पचास फीसद घटी है। इनमें से छह गांव अंतरराष्ट्रीय सीमा के नजदीक हैं। उत्तराखंड के लिए सबसे चिंताजनक बात यह है कि 2011 के बाद बीते सात सालों में पलायन के चलते सात सौ चौंतीस गांव बिल्कुल वीरान हो चुके हैं। पिछले दस सालों में उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों- उत्तरकाशी में एक सौ ग्यारह ग्राम पंचायतों से दो हजार सात सौ सत्ताईस लोग, चमोली की तीन सौ इकहत्तर ग्राम पंचायतों से चौदह हजार दो सौ नवासी, केदारघाटी रुद्रप्रयाग की दो सौ तीस ग्राम पंचायतों से सात हजार आठ सौ पैंतीस, टिहरी गढ़वाल की पांच सौ पचासी ग्राम पंचायतों से अठारह हजार आठ सौ तीस लोग, देहरादून की तिरपन ग्राम पंचायतों से दो हजार आठ सौ दो लोग, पिथौरागढ़ की आठ सौ चौंतीस ग्राम पंचायतों से नौ हजार आठ सौ तिरासी लोग, बागेश्वर की एक सौ पंचानबे ग्राम पंचायतों से पांच हजार नौ सौ बारह लोग, अल्मोडा की छह सौ पैंसठ ग्राम पंचायतों से सोलह हजार दो सौ सात, चंपावत की दो सौ आठ ग्राम पंचायतों से सात हजार आठ सौ छियासी, नैनीताल की दो सौ तेरह ग्राम पंचायतों से चार हजार आठ सौ तेईस लोग पूरी तरह पलायन कर चुके हैं। उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में पौड़ी गढ़वाल के पलायन को लेकर सबसे भयावह तस्वीर सामने आई है। इस जिले की आठ सौ इक्कीस ग्राम पंचायतों से सबसे ज्यादा पचीस हजार पांच सौ चौरासी लोग पूरी तरह पलायन कर चुके हैं। इन ग्यारह पर्वतीय जिलों की जिन ग्राम पंचायतों से लोगों ने पलायन किया है, वे अपनी जमीन जायदाद बेच कर घरों में ताले डाल कर अन्य शहरों में बस गए हैं। इन पर्वतीय जिलों के गांव वीरान पड़े हैं।

पौड़ी गढ़वाल जिले के कोट विकास खंड के सबसे ज्यादा अट्ठाईस गांव वीरान पड़े हैं, इसके बाद सीमांत जिले उत्तरकाशी के विकास खंड नौगांव के छब्बीस गांव और मोरी गांव के अठारह गांव, टिहरी गढ़वाल के चंबा विकास खंड के चौदह गांव, जौनपुर विकास खंड के बारह गांव, तालुदर विकास खंड के बारह गांव, पौड़ी गढ़वाल के दुगड्डा विकास खंड के बारह गांव, इसी जिले के कालजीखाल विकासखंड के बारह गांव पूरी तरह से निर्जन हो चुके हैं। 2011 की जनगणना के बाद इन गांवों के निर्जन होने की वजह सड़कों से जुड़े न होना, बिजली-पानी और सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्र उपलब्ध न होना है।

उत्तराखंड की चार सौ बयासी ग्राम पंचायतों के राजस्व गांव अभी तक सड़कों से नहीं जुड़ पाए हैं। जबकि तीन सौ अट्ठावन गांवों में बिजली की सुविधा भी उपलब्ध नहीं हैं। तीन सौ निन्यानबे गांवों में एक किलोमीटर की दूरी तक पीने का पानी मुहैया नहीं है। छह सौ साठ ग्राम पंचायतों में प्राथमिक चिकित्सा सुविधा भी आजादी के सत्तर सालों बाद भी नहीं पहुंच पाई है। उत्तराखंड राज्य गठन के बाद जितनी भी सरकारें बनी हैं उन्होंने विकास की मुख्य धुरी पर्वतीय जिलों के गांवों को बनाने के बजाय सूबे के तीन मैदानी जिलों देहरादून, हरिद्वार और उधमसिंह नगर को बनाया है और सारा विकास इन्हीं तीन जिलों में सिमट कर रह गया है। सूबे के पर्वतीय जिलों के गांव आज भी विकास को तरस रहे हैं। इसी वजह से पहाड़ के गांवों से पलायन हुआ है। सूबे के पांच पर्वतीय जिलों रुद्रप्रयाग, टिहरी, पौड़ी गढ़वाल, पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा से पलायन सबसे अधिक हुआ है। इन जिलों के कुछ गांव तो पूरी तरह खाली हो चुके हैं। चीन और नेपाल की सीमा से लगे चौदह गांव राज्य गठन के सत्रह सालों में पलायन के चलते खाली हो गए हैं। राज्य के गांवों में 36.2 फीसद की दर से पलायन हुआ है। जो राष्ट्रीय औसत से अधिक है। राष्ट्रीय औसत 30.6 फीसद है।

उत्तराखंड के तीन मैदानी जिलों में आर्थिक तरक्की के अवसर पहाड़ी जिलों के मुकाबले ज्यादा तेजी से पनपे हैं, जिससे पर्वतीय और मैदानी जिलों के बीच असमानताएं बढ़ी हैं। मैदानी जिलों की तुलना में पहाड़ी जिलों का लिंगानुपात अधिक है। पहाड़ी जिलों के गांवों की जनसंख्या में भारी गिरावट आई है। उत्तराखंड राज्य का गठन 9 नवंबर, 2000 को देश के सत्ताईसवें राज्य के रूप में हुआ था। इस राज्य का कुल क्षेत्रफल तिरपन हजार चार सौ तिरासी वर्ग किलोमीटर है, जिसमें अड़तीस हजार वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र है। 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की आबादी एक करोड चियासी हजार दो सौ बानबे है, जिनमें इक्यावन लाख सैंतीस हजार सात सौ तिहत्तर पुरुष, उनचास लाख अड़तालीस हजार पांच सौ उन्नीस महिलाएं हैं। लिंगानुपात नौ सौ तिरसठ महिलाओं के मुकाबले एक हजार पुरुष हैं और जनसंख्या का घनत्व एक सौ नवासी प्रति वर्ग किलोमीटर है। राज्य में प्रति व्यक्ति वार्षिक आय एक लाख तीन हजार तीन सौ उनचास रुपए है। राज्य में प्रशासनिक इकाई के रूप में दो मंडल गढवाल और कुमाऊं, तेरह जिले, एक सौ तीन तहसीलें, नौ उपतहसीलें, सात हजार नौ सौ पचास ग्राम पंचायतें, सोलह हजार चार सौ बासठ गांव हैं। उत्तराखंड में साक्षरता की दर 78.08 फीसद है, जबकि देश की साक्षरता दर 74.04 है। इस तरह उत्तराखंड की साक्षरता दर राष्ट्र की साक्षरता दर से अधिक है। 2001 से 2011 के बीच एक दशक में अल्मोड़ा और पौड़ी जिलों की आबादी में कमी आई है।

उत्तराखंड में आज भी खेती लोगों का मुख्य व्यवसाय है। 43.59 फीसद लोग खेती से जुड़े हुए हैं, जबकि 32.22 फीसद लोग अपना गुजर-बसर मजदूरी से करते हैं। सरकारी नौकरी में कुल 10.82 फीसद लोग ही हैं। अगर सरकार राज्य गठन के अठारह साल बाद अब भी नहीं जागी, तो अन्य पांच सौ पैंसठ गांव भी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में वीरान हो जाएंगे। 1994 में उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुलायम सिंह यादव की सपा सरकार ने तब के कैबिनेट मंत्री रमाशंकर कौशिक की अध्यक्षता में उत्तराखंड राज्य निर्माण के लिए एक समिति बनाई थी, जिसने उत्तराखंड को केवल पर्वतीय राज्य बनाने और उत्तराखंड की राजधानी गैरसैंण बनाने की प्रबल सिफारिश की थी। जिस रिपोर्ट में हरिद्वार जिले को उत्तराखंड में शामिल नहीं किया गया था। रमाशंकर कौशिक समिति की रिपोर्ट उत्तर प्रदेश विधानसभा में तबकी मुलायम सिंह यादव सरकार ने पारित करवा कर केंद्र सरकार को भेजी थी। बाद में कल्याण सिंह सरकार ने भी रमाशंकर कौशिक समिति की सिफारिश वाली उत्तराखंड राज्य निर्माण से मिलता-जुलता प्रस्ताव उत्तर प्रदेश विधानसभा में पारित करा कर केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को भेजा था, जिसमें हरिद्वार जिला उत्तराखंड में शामिल नहीं था, पर उत्तराखंड के भाजपा नेताओं के दबाव में लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की सिफारिश पर वाजपेयी सरकार ने हरिद्वार जनपद को उत्तराखंड में शामिल करके लोकसभा और राज्यसभा में प्रस्ताव पारित करवाया और देहरादून को उत्तराखंड की अस्थाई राजधानी घोषित किया।

साथ ही स्थाई राजधानी के मामले को लटका दिया। तब से यह मामला लटका चला आ रहा है। भले उत्तराखंड की जनता के सामने मुलायम सिंह आज भी खलनायक के रूप में माने जाते हों, पर उनके मुख्यमंत्रित्वकाल में बनी रमाशंकर समिति के उत्तराखंड राज्य निर्माण के प्रस्ताव को आज भी उत्तराखंड आंदोलनकारी सही मानते हैं। राजनीतिक विश्लेषक अवनीत कुमार घिल्डियाल का कहना है कि पलायन आयोग की रिपोर्ट के बाद राज्य सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती पर्वतीय क्षेत्रों के गांवों से हो रहे पलायन को रोकना और खाली हो चुके गांवों को फिर से आबाद करना है। इसके लिए राज्य सरकार को इन गांवों में मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराना और युवाओं को गांवों में ही रोजगार देना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। राज्य सरकार को पर्वतीय क्षेत्र के दूर-दराज गांवों को केंद्र में रख कर विकास की कार्ययोजना बनानी होगी और उसे धरातल पर उतारना होगा।
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का कहना है कि पलायन के पीछे खासकर रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुख्य बिंदु उभर कर सामने आए हैं। राज्य सरकार ने रोजगार सृजन की दिशा में कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए हैं। नौ पर्वतीय जिलों के पैंतीस विकास खंडों को चिह्नित किया गया है, जिनके लिए लघु, मध्यम और दीर्घकालीन कार्ययोजना तैयार की जा रही है। साथ ही अन्य जिलों के गांवों के लिए भी एक योजना तैयार की जा रही है।

ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग के उपाध्यक्ष डॉ. एसएस नेगी का कहना है कि सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक सूबे के पांच सौ पैंसठ गांवों में 2011 के बाद आबादी पचास फीसद कम हुई है। पलायन आयोग की रिपोर्ट के बाद राज्य के विकास का मुख्य बिंदु पर्वतीय जिलों के पिछड़े गांव होंगे। इन्हीं को ध्यान में रखते हुए कार्ययोजनाएं बनाई जाएंगी। उत्तराखंड राज्य आंदोलन के प्रमुख नेता और उत्तराखंड क्रांति दल के अध्यक्ष दिवाकर भट्ट का कहना है कि पलायन आयोग की रिपोर्ट सरकारी आंकड़ों की बाजीगरी है। इसमें कई तथ्यों को छिपाया गया है, जबकि पर्वतीय क्षेत्रों के गांवों की तस्वीर बहुत ज्यादा भयावह है। जिन लोगों ने राज्य निर्माण के अपने प्राणों की आहुति दी थी, उनके सपनों से उत्तराखंड राज्य कोसों दूर है। सत्तर और अस्सी के दशक में पहाड़ की आबादी का एक बड़ा हिस्सा दिल्ली, मुंबई, लखनऊ जैसे महानगरों में रोजगार की तलाश में पहाड़ छोड़ कर चला गया था। 1994 में उत्तराखंड राज्य निर्माण का आंदोलन तेजी के साथ चला, जिसमें महिलाओं की भागीदारी सबसे ज्यादा रही। महिला शक्ति को यह उम्मीद थी कि राज्य बनने के बाद उनके बेटे-बेटियों को गांवों में ही रोजगार मिलेगा और सड़क, बिजली-पानी, शिक्षा की सुविधाएं मिलेंगी। पर राज्य सरकारों की गलत नीतियों के चलते विकास इन गांवों से कोसों दूर रहा। जिस कारण पहाड़ी जनता ठगा सा महसूस कर रही है। राज्य बनने के बाद तीन हजार स्कूलों में ताले पड़ चुके हैं। भट्ट का कहना है कि उत्तराखंड क्रांति दल पूर्ण राज्य बनाने की जगह इस पहाड़ी क्षेत्र को केंद्र शासित क्षेत्र बनाने का पक्षधर था, पर यह राज्य राजनीतिक स्वार्थों की भेंट चढ़ गया है। अगर देहरादून के बजाय गैरसैंण को राजधानी बनाया जाता, तो इस पर्वतीय राज्य के दूर-दराज गांवों का विकास होता। देहरादून राजधानी बनने से यह राज्य शराब, खनन और भू-माफियाओं का राज्य बन कर रह गया है। राज्य में जो भी सरकारें बनीं, वे सब इन माफियाओं की उंगलियों पर नाचती रहीं।

उत्तराखंड महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष और राज्य निर्माण आंदोलनकारी सुशीला बलूनी का कहना है कि चौबीस साल पहले हमने राज्य निर्माण के लिए जिस सोच को आगे रख कर लड़ाई लड़ी थी वह सोच मौजूदा उत्तराखंड राज्य से कोसों दूर है। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार को लेकर पहाड़ों की जनता सड़कों पर उतर आई थी। राज्य बनने के अठारह साल बाद भी यह समस्या दूर नहीं हो पाई है। इसके लिए पहाड़ी नेता ही जिम्मेदार हैं, जिनके हाथों में राज्य की बागडोर है। चौबीस साल पहले हमने राज्य निर्माण की लड़ाई लड़ी थी, अब उत्तराखंड की जनता को राज्य को बरबाद होने से बचाने की लड़ाई के लिए तैयार रहना होगा।

उत्तराखंड की दशा

1. चार सौ बयासी ग्राम पंचायतों के राजस्व गांव अभी तक सड़कों से नहीं जुड़ पाए हैं।
2. तीन सौ अट्ठावन गांवों में बिजली की सुविधा भी उपलब्ध नहीं हैं।
3. तीन सौ निन्यानबे गांवों में एक किलोमीटर की दूरी तक पीने का पानी मुहैया नहीं है।
4. छह सौ साठ ग्राम पंचायतों में प्राथमिक चिकित्सा सुविधा भी आजादी के सत्तर सालों बाद भी नहीं पहुंच पाई है।
5. पौड़ी जिले के कालजीखाल विकासखंड के बारह गांव पूरी तरह से निर्जन हो चुके हैं।
6. 2011 की जनगणना के बाद इन गांवों के निर्जन होने की वजह सड़कों से जुड़े न होना, बिजली-पानी और सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्र उपलब्ध न होना है।
7. सूबे के पांच पर्वतीय जिलों रुद्रप्रयाग, टिहरी, पौड़ी गढ़वाल, पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा से पलायन सबसे अधिक हुआ है।
8. राज्य के गांवों में 36.2 फीसद की दर से पलायन हुआ है। राष्ट्रीय औसत 30.6 फीसद है। यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत से भी अधिक है।
9. पिछले एक दशक में 6338 ग्राम पंचायतों से तीन लाख तिरासी हजार 726 लोग अस्थाई तौर पर रोजगार की तलाश में पहाड़ी क्षेत्रों से सूबे के ही मैदानी क्षेत्रों या उत्तर प्रदेश के बरेली, मुरादाबाद, लखनऊ, दिल्ली मुंबई और अन्य शहरों में पलायन कर चुके हैं।
10. उत्तराखंड क्रांति दल के अध्यक्ष दिवाकर भट्ट का कहना है कि पलायन आयोग की रिपोर्ट सरकारी आंकड़ों की बाजीगरी है। इसमें कई तथ्यों को छिपाया गया है, जबकि पर्वतीय क्षेत्रों के गांवों की तस्वीर बहुत ज्यादा भयावह है। जिन लोगों ने राज्य निर्माण के अपने प्राणों की आहुति दी थी, उनके सपनों से उत्तराखंड राज्य कोसों दूर है।


उत्तराखंड में आज भी खेती लोगों का मुख्य व्यवसाय है। 43.59 फीसद लोग खेती से जुड़े हुए हैं, जबकि 32.22 फीसद लोग अपना गुजर-बसर मजदूरी से करते हैं। सरकारी नौकरी में कुल 10.82 फीसद लोग ही हैं।

उत्तराखंड राज्य गठन के बाद जितनी भी सरकारें बनी हैं उन्होंने विकास की मुख्य धुरी पर्वतीय जिलों के गांवों को बनाने के बजाय सूबे के तीन मैदानी जिलों देहरादून, हरिद्वार और उधमसिंह नगर को बनाया है और सारा विकास इन्हीं तीन जिलों में सिमट कर रह गया है। सूबे के पर्वतीय जिलों के गांव आज भी विकास को तरस रहे हैं। इसी वजह से पहाड़ के गांवों से पलायन हुआ है।

 

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