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विमर्शः साहित्य में वृद्ध विमर्श

हिंदी साहित्य में दलित-विमर्श, स्त्री-विमर्श, आदिवासी-विमर्श, किन्नर-विमर्श (थर्ड जेंडर विमर्श) के बाद अब वृद्ध-विमर्श की भी धमक सुनाई देने लगी है। वैसे आजकल जिस तरह नई पीढ़ी, युवा पीढ़ी की चर्चा जोरों पर है, उसे देखते हुए वृद्ध-विमर्श का होना भी उचित ही लगता है।

आज का भी भारतीय मानस और चित्त जितना आधुनिक युग में जीता है, उतना ही वह अपनी पूजा-उपासना की विधियों, विविध रीति-रिवाजों आदि के जरिए बहुत कुछ पुरातन काल से भी जीवंतता प्राप्त करता है और यह सब उसका दोष नहीं, खूबी है।

हिंदी साहित्य में दलित-विमर्श, स्त्री-विमर्श, आदिवासी-विमर्श, किन्नर-विमर्श (थर्ड जेंडर विमर्श) के बाद अब वृद्ध-विमर्श की भी धमक सुनाई देने लगी है। वैसे आजकल जिस तरह नई पीढ़ी, युवा पीढ़ी की चर्चा जोरों पर है, उसे देखते हुए वृद्ध-विमर्श का होना भी उचित ही लगता है। वृद्धों या बूढ़ों को लेकर आमतौर पर ऐसे लोगों की तस्वीर उभरती है जो सफेद बाल, झड़े हुए दांत, शिथिल-ऊर्जा हीन शरीर लेकर जीवन-यापन करते हैं। हिंदीवालों के बीच तो केशवदास का यह कहा खूब प्रचलित है- ‘केशव केशन अस करी जस अरिहु न कराय/ चंद्रवदन मृगलोचनी बाबा कहि-कहि जाय।’ इसका मतलब यही हुआ न कि चंद्रवदन मृगलोचनी वनिताओं को आकृष्ट करने की सामर्थ्य से चूक जाने का नाम बुढ़ापा है। वैसी और भी कवियों और रसिकों की बड़ी जमात रही है, जिन्होंने वृद्धावस्था को दंतहीन, वलक्ष शीर्ष, जर्जर काया, शिथिल इंद्रियों की दशा के रूप में देखते हुए इसे कोसने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। पर वृद्धावस्था को मात्र इस रूप में देखना एक मूल्यवान रिक्थ का सरासर अनादर करना है।

वृद्धावस्था की बात करने पर अक्सर प्रसिद्ध फ्रांसीसी लेखक अनातोले फ्रांस का यह कथन याद आता है- ‘काश! बुढ़ापे के बाद जवानी आती!’ अनातोले का यह कथन बड़ा ही सांकेतिक है। जवानी वह शारीरिक अवस्था है, जो जोश, ऊर्जा, शौर्य से ओत-प्रोत होती है, जिसका उपयोग करते हुए हर व्यक्ति अपने-अपने ढंग से जीवन-यात्रा तय करता है और इस क्रम में वह बुढ़ापा तक पहुंचता है। बुढ़ापे में जवानी वाली ऊर्जा शक्ति तो नहीं रह जाती, रह जाता है विविध अनुभवों का भंडार। इन अनुभवों के आलोक में व्यक्ति को जवानी के अनुभव रहित जोश में किए गए अपने कई गलत निर्णयों और कार्यों का अहसास होता है, तो वह अनुताप की आंच में तपते हुए यह सोचता है कि अगर उसे बुढ़ापे में जवानी जैसी ताकत, स्फूर्ति मिल जाए तो वह पहले से बेहतर, श्रेयस्कर कार्य कर सकता है- यही आशय है अनातेले फ्रांस के इस कथन का।

दरअसल, बुढ़ापा जिसे आमतौर पर निष्क्रियता, शिथिलता की शारीरिक दशा समझ कर बहुत काम की चीज नहीं समझा जाता, बचपन से लेकर जवानी तक के जीवनानुभवों का कोश होता है- ऐसा प्रकाश पुंज होता है, जिसके आलोक में युवा पीढ़ी अपने वर्तमान को संवारते हुए भविष्य का शृंगार कर सकती है। यही कारण रहा है कि प्राच्य और पाश्चात्य दोनों परंपराओं में वृद्ध या वृद्धावस्था के प्रति सम्मानजनक भाव रहा है। इतिहास और साहित्य, दोनों ही इस तथ्य के साक्षी हैं कि बूढ़े-बुजुर्गों के अनुभवों-परामर्शों से लाभ उठाने वाली युवा पीढ़ी ही नव-निर्माण कर पाती है, जबकि इसके विपरीत मार्ग पर चलने वाली युवा शक्ति विध्वंस की वीरानगी छोड़ जाती है। इसके प्रमाणस्वरूप हम ‘महाभारत’ और ‘रामायण’ की कथाओं को देख सकते हैं।

याद करें, ‘महाभारत’ में एक तरफ भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, विदुर जैसे तपे-तपाए, अनुभव-सिद्ध ज्ञानी, तत्त्वेताओं की जमात है, तो दूसरी तरफ जवानी की शक्ति और जोश से बरसाती पानी से उफनती नदियों की तरह दुर्योधन, दु:शासन, कर्ण आदि जैसे युवकों की जमात वृद्धों, बुजुर्गों की मंडली ने युवा कौरव मंडली को बहुत समझाया कि पांडवों से युद्ध करने में अहित ही अहित है, के अहंकार में दुर्योधन और उसके सहायकों ने इन बुजुर्गों के परामर्श को ठेंगा दिखाते हुए अंतत: युद्ध का मार्ग अपनाया। परिणाम हुआ महाविनाश- न वृद्ध बचे, न जवान- बचे सिर्फ पांच भाई पांडव और बेशुमार विधवाओं का चहुंओर विलाप। यही नहीं, इच्छा मृत्यु का वरदान पाए हुए भीष्म पितामह का महत्त्व तब अधिक उत्कृष्ट रूप में उभरता है, जब वे शर-शय्या पर पड़े हुए अपने अनुभवों के आधार पर युधिष्ठिर को नीति, शांति, अहिंसा, राजधर्म आदि के संबंध में उपयोगी उपदेश देते हैं, जिन्हें युधिष्ठिर पाथेय स्वरूप अंगीकार करते हुए अपने राजधर्म का निर्वाह करते हैं।

महाभारत के विपरीत ‘रामायण’ में हम देखते हैं कि राम ने वृद्ध पिता की आज्ञा का सम्मान करते हुए वनवास स्वीकार किया। ऐसा करके राम ने अपने परिवार को कलह और विघटन से बचाया, तो दूसरी तरफ अत्याचारियों का दमन कर सार्वजनिक हित के कार्य संपन्न किए। इसी रामकथा का एक पात्र श्रवण कुमार अपने वृद्ध माता-पिता की अनन्य सेवा करके आदर्श पुत्र का प्रतिमान रच गया। हमारे यहां की पौराणिक तथा लोक-कथाओं में ऋषि-मुनियों, साधु-संतों से संबद्ध जो कथाएं मिलती हैं उनसे ज्ञात होता है कि उन सबने कठिन तपस्या, साधना करते हुए वृद्धावस्था को प्राप्त किया था, जहां पहुंच कर वे लोक, समाज और राज्य के नियमन तथा संचालन हेतु नीतियों का प्रतिपादन करने में सक्षम हो पाते थे। तबके राजा या शासक उन ऋषि सेवित तपोवनों में जाकर उनसे राजधर्म, लोकधर्म के निमित्त नीति निर्देशक तत्त्वों का ज्ञान प्राप्त कर अपने राजकीय दायित्वों का निष्पादन करते थे। ‘पंचतंत्र’ की कहानियों से पता चलता है कि कैसे वृद्ध, अनुभवी विष्णु शर्मा ने अपने अनुभवों के आधार पर पशु-पक्षियों की कहानियों का वाचन कर राजा के मूढ़ राजकुमारों को बुद्धिमान और व्यवहार कुशल बना दिया।

इतिहास यह भी बताता है कि वृद्ध चाणक्य के साथ मिल कर युवा चंद्रगुप्त ने स्वेच्छाचारी नंद के कुशासन का अंत कर दिया। सिद्धार्थ ने जीवन की चरितार्थता की खोज में अपनी जवानी खपा दी, तब जाकर वे ‘बुद्ध’ बन सके। बूढ़े सुकरात को विष का प्याला पीना पड़ा, सत्य-कथन के लिए। बीसवीं सदी ने भी देखा कि कैसे लाठी टेक कर चलने वाले बूढ़े महात्मा गांधी के नेतृत्व में संगठित होकर देश ने पराधीनता के जुए को उतार फेंका। यह कहने में अत्युक्ति नहीं कि अब तक का मानव-विकास बुढ़ापे से प्राप्त पाथेय-पोषण का ही परिणाम है- इस सत्य को नकारने वाली युवा शक्ति आत्मघाती दिशा में ही प्रयाण कर सकती है।

दरअसल, देखा जाए तो वृद्ध और युवा, जिसे पुराना और नया भी कह सकते हैं, के बीच जो संबंध रहा है वह परस्पर संवाद का रहा है। वृद्धावस्था को परंपरा और युवावस्था को प्रगति मानें तो परंपरा से सकारात्मक पाथेय ग्रहण करके ही प्रगति सही दिशा प्राप्त करती है। युवा या नए के जोश में पुराने को पूरी तरह नकारना तात्कालिक दृष्टि से राजनीतिक-सामाजिक आंदोलनों में कुछ हद तक अपेक्षित हो सकता है, पर साहित्य के क्षेत्र में वह वांछनीय नहीं होता। साहित्य में वृद्ध और युवा या फिर पुराने-नए का जो परिदृश्य होता है वह आमने-सामने अवस्थित दो विरोधी शिविरों के बजाय पूर्वापर संबंधों के सह-अस्तित्व का होता है। नया रचने के उपक्रम में युवा या नए रचनाकार पुराने अनुभवों का पुन: सृजन करते हैं, बदलते युग-संदर्भ में उन्हें नवीकृत करते हैं। बूढ़ों या पुराने के अनुभवों से बहुत कुछ श्रेष्ठ, सकारात्मक मूल्यों को आत्मसात करके प्रकट होने वाली रचनाशीलता ही भविष्य की दीपशिखा प्रज्जवलित करने में सक्षम होती है। तभी तो अंग्रेजी की आधुनिक नई समीक्षा के पुरोधा टीएस इलियट भी होमर से लेकर वर्तमान तक चली आ रही परंपराओं में स्नात होने की बात करते हैं।

जहां तक भारत की बात है, यहां पुरातनता या वृद्धावस्था का अनादर नहीं किया गया। तभी तो आज का भी भारतीय मानस और चित्त जितना आधुनिक युग में जीता है, उतना ही वह अपनी पूजा-उपासना की विधियों, विविध रीति-रिवाजों आदि के जरिए बहुत कुछ पुरातन काल से भी जीवंतता प्राप्त करता है और यह सब उसका दोष नहीं, खूबी है। पुरानी मसल है- ‘पुराना चावल ही पथ्य के काम आता है।’ गांवों में बुखार ग्रस्त व्यक्ति को बुखार उतरने पर सुपाच्य आहार के रूप में पुराने चावल का ही भात दिया जाता था और इस चावल को बड़े जतन से संभाल कर रखा जाता था। आज की व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं, असीम इंद्रिय-सुख की चाहत से बीमार होती जा रही मानव-आत्माओं को वाल्मीकि-व्यास से लेकर अब तक के मानवतावादी साहित्य तथा वृद्ध समझे जाने वाले लोगों से नाता जोड़ कर ही नीरोग किया जा सकता है। साथ ही आज के वृद्धों का दायित्व बनता है कि वे अपने अनुभवों के उजाले से युवा-पीढ़ी का प्रगति-पथ आलोकित करें।

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