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स्मरण : समय से मुठभेड़

अदम गोंडवी की यह गजल आज के समय में पूरी तरह मौजू है। यही नहीं, अपनी रचनाओं के माध्यम से वे हमारे समय की उन चुनौतियों से दो-चार होते हैं, जो आने वाले समय में मानवता के भविष्य को तय करेंगी..

Author नई दिल्ली | December 21, 2015 19:03 pm
अदम गोंडवी

हिंदू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िए।
अपनी कुर्सी के लिए जज्बात को मत छेड़िए
हममें कोई हूण कोई शक कोई मंगोल है
दफ्न है जो बात अब उस बात को मत छेड़िए

अदम गोंडवी की यह गजल आज के समय में पूरी तरह मौजू है। यही नहीं, अपनी रचनाओं के माध्यम से वे हमारे समय की उन चुनौतियों से दो-चार होते हैं, जो आने वाले समय में मानवता के भविष्य को तय करेंगी। दुष्यंत कुमार के बाद अदम गोंडवी पहले ऐसे शायर हैं, जिन्होंने जनता से सीधा संवाद स्थापित किया। वे कबीर की परंपरा के कवि हैं, फक्कड़ और अलमस्त। शयरी उनके लिए खेती-किसानी जैसा ही सहज कर्म रहा। अदम गोंडवी उन जनकवियों और शायरों में अग्रणी हैं, जिन्होंने कभी प्रतिष्ठान की परवाह नहीं की और साहित्य के बड़े केंद्रों से दूर रहकर जनता के दुख-दर्द को स्वर देते रहे। अन्याय और शोषण पर आधारित व्यवस्था पर प्रहार करते रहे। राजनीति के अपराधीकरण को लेकर उन्होंने शेर कहा, उसके सब कायल हो गए।

पक्के समाजवादी हैं तस्कर हों या डकैत
इतना असर है खादी के उजले लिबास में।

हिंदी गजल में यह एक नया ही स्वर था। सीधी-सीधी खरी बात, शोषक सत्ताधारियों पर सीधा प्रहार।

महज प्रायमरी तक शिक्षा प्राप्त और जीवन भर खेती-किसानी में लगे अदम गोंडवी ने जो भी लिखा तो वही जनता की जबान पर चढ़ गया। प्रसिद्ध आलोचक मैनेजर पांडेय ने उनके बारे में लिखा है कि कविता की दुनिया में अदम एक अचरज की तरह हैं। अचरज की तरह इसलिए कि हिंदी कविता में ऐसा बेलौस स्वर तब सुनाई पड़ा था, जब कविता मजदूरों-किसानों के दुख-दर्द और उनके संघर्षों से अलग-थलग पड़ती जा रही थी। नागार्जुन-त्रिलोचन-केदार जैसे जनकवियों ने जो अलख जगाई थी, उस परंपरा को आगे बढ़ाने का काम अदम गोंडवी और गोरख पांडेय जैसे कवियों ने ही किया।

अदम के लिए कविता एक ऐसे अनिवार्य कर्म की तरह थी जो मनुष्य होने की अर्थवत्ता का अहसास करा सके। खास बात यह है कि जनता के शोषण के तंत्र को उन्होंने मार्क्सवाद की किताबों के माध्यम से नहीं समझा था, बल्कि अपने आसपास महसूस किया था। छोटी जातियों पर सामंती अत्याचारों को उन्होंने स्वयं देखा था। जो आज भी रोज ही गांवों-कस्बों में वंचित लोग झेल रहे हैं। तभी उनकी एक प्रसिद्ध नज्म ने साहित्य की दुनिया में हलचल पैदा कर दी। आज भी निम्न जातियों के लोगों को रोज ही अपमान का सामना करना पड़ रहा है। स्त्रियों को सामूहिक बलात्कार का शिकार बनाया जा रहा है, भूख और बेबसी उनकी नियति बन चुकी है। ऐसे में अदम गोंडवी ने लिखा-
भूख के अहसास को शेरोसुखन तक ले चलो
या अदब को मुफलिसों की अंजुमन तक ले चलो।

अदम ने वक्त की चुनौती को साफ-साफ पहचाना और कहा-
गजल को ले चलो अब गांव के दिलकश नजारों में
मुसलसल फन का दम घुटता है इन अदबी इदारों में।
अदीबों, ठोस धरती की सतह पर लौट भी आओ
मुल्लमे के सिवा क्या है फलक के चांद-तारों में।

अदम गोंडवी को जो नजर मिली थी और उनका जो वर्ग-बोध था, वह किताबी नहीं, वास्तविक जीवन की स्थितियों से उत्पन्न था। उन्होंने अभाव, वंचना, भूख की पीड़ा और गरीबों पर धनिकों द्वारा किए जाने वाले जुल्म को अपनी आंखों से देखा और महसूस किया था। उनका सच कबीर की तरह आंखिन देखी था, कागद की लेखी नहीं। आज की राजनीतिक व्यवस्था के छल-छद्म को समझना उनके लिए कठिन नहीं था। सत्ता के लिए होने वाली साजिशों और वंचित वर्ग के संघर्षों को भटकाने वाली ताकतों की दुरभिसंधियों का उन्होंने खुलकर पर्दाफाश किया।
ये अमीरों से हमारी फैसलाकुन जंग थी
फिर कहां से बीच में मस्जिद व मंदर आ गए

आज की राजनीतिक परिस्थितियों में ये पंक्तियां पूरी तरह सच का बयान है। यह सच अदम गोंडवी के समग्र लेखन में बिखरा हुआ है, जो जनता को आगाह करता है और शोषक सत्ताधारियों को खुली चुनौती देता है। अदम की राजनीतिक चेतना अत्यंत ही प्रखर है। सत्ता में बैठे लोगों का चरित्र वे खोलकर सामने रखते हैं। उन्होंने लिखा-

जो डलहौजी न कर पाया वो ये हुक्काम कर देंगे
कमीशन दो तो हिंदुस्तान को नीलाम कर देंगे।
ये वंदेमातरम् का गीत गाते हैं सुबह उठकर
मगर बाजार में चीजों का दुगना दाम कर देंगे।

आ ज अपनी राजनीति चमकाने में लगे हैं और जनता को झांसापट्टी देना चाहते हैं, उनके चरित्र को अदम ने अपनी रचनाओं में उजागर किया है।

मुफलिसों की भीड़ को गोली चलाकर भून दो
दो कुचल बूटों से औसत आदमी की प्यास को।
मजहबी दंगों को भड़का कर मसीहाई करो
हर कदम पर तोड़ दो इंसान के विश्वास को।

अदम गोंडवी सही मायनों में इंकलाब के कवि हैं। पाश की तरह ही इनके लिए कोई ‘बीच का रास्ता’ नहीं है। तभी तो उन्होंने कहा-

जनता के पास एक ही चारा है बगावत
ये बात कह रहा हूं मैं होशो हवास में।

उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में 22 अक्तूबर 1947 को जनमें अदम गोंडवी का असली नाम रामनाथ सिंह था। उन्होंने अपना नाम अदम गोंडवी कर लिया और इसी नाम से वे मशहूर हुए। 18 दिसंबर, 2011 को उनकी मृत्यु हुई थी। इनकी कुल तीन ही कृतियां हैं-गर्म रोटी की महक, समय से मुठभेड़ और धरती की सतह पर। सम्मान भी मिला- दुष्यंत कुमार सम्मान और मुकुट बिहारी सरोज सम्मान। पर जनता के दिलों में उन्होंने अपनी जो जगह बनाई और जो सम्मान पाया, वह किसी भी साहित्यिक सम्मान से बड़ा है।

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