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रिपोर्टः आचार्य का स्मरण

कश्मीर में एक हजार साल पहले पैदा हुए बहुमुखी प्रतिभा के विद्वान आचार्य अभिनवगुप्त ने भारतीय संस्कृति को गहरे तक प्रभावित किया है।

Author Updated: January 22, 2017 12:36 AM

अभिनवगुप्त की विशेषता केवल इसमें नहीं है कि उन्होंने दर्शन के पूर्ववर्ती आचार्यों के मतों को आत्मसात किया, बल्कि उनका महत्व इसमें भी है कि उन मतों का सृजनात्मक पुनर्संयोजन किया। उनके लेखन ग्रंथों में दर्शन, सौंदर्य, तंत्र, योग, भक्ति, रहस्य-भावना सभी परस्पर जुड़े हुए हैं। अभिनवगुप्त के चौवालीस ग्रंथों का उल्लेख मिता है। उनकी अनेक रचनाएं नष्ट हो गर्इं या नष्ट कर दी गर्इं। उनके तंत्र एवं दर्शन से संबद्ध ग्रंथ हैं- मालिनीविजयवार्तिक, परात्रिंशिका विवरण, तंत्रालोक, तंत्रसार, बोधपंचदशिका, परमाथर्सार आदि। वे एकमात्र ऐसे चिंतक हैं, जिन्होंने जिन्होंने वाक् और रस, दोनों संकल्पनाओं के बारे में समान योग्यता के साथ प्रकाश डाला है।

कश्मीर में एक हजार साल पहले पैदा हुए बहुमुखी प्रतिभा के विद्वान आचार्य अभिनवगुप्त ने भारतीय संस्कृति को गहरे तक प्रभावित किया है। आचार्य का प्रत्यभिज्ञा दर्शन वास्तव में शिव की परमसत्ता की अनिर्वचनीयता का प्रतिपादन करता है। लोक मान्यता है कि अपने जीवन का लक्ष्य पूरा कर आचार्य कश्मीर में वीरवा-स्थित भैरव गुफा में प्रविष्ट हुए जहां वे अपने आराध्य शिव के साथ एकाकार हो गए। आज दुनियाभर में पचास विश्वविद्यालयों में आचार्य अभिनवगुप्त पर शोध कार्य हो रहा है। बंग्लुरू में बीते छह- सात जनवरी को उनका सहस्राब्दी समारोह संपन्न हुआ। राष्ट्रीय विद्वत संगम में भारत के उनतीस राज्यों से प्रतिभागी शामिल हुए। इस आयोजन की सहयोगी संस्थाओं में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्याय, श्रीश्री रविशंकर विश्वविद्यालय, भुवनेश्वर, इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र दिल्ली, जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र एवं भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद दिल्ली आदि शामिल थी।
सहस्राब्दी समारोह की शुरुआत 13 फरवरी 2016 को दिल्ली के विज्ञान भवन में हुई थी। साल भर देश भर में और खास करके जम्मू और कश्मीर में बड़े पैमाने पर कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। बंग्लुरू के समापन समारोह से लेकर हर समारोह में यह सवाल भी उठता रहा कि इतने सालों में आचार्य अभिनव गुप्त के बारे अपेक्षित प्रचार प्रसार नहीं हो पाया।
आचार्यस ने संस्कृत साहित्य के बड़े अंश का सृजन जम्मू कश्मीर में किया। संस्कृत साहित्य की धारा को नई दृष्टि से देखने और अपने अभिनव प्रयोगों से साहित्य को समृद्ध करने का कार्य उन्होंने किया। पूर्ववर्ती आचार्यों के रस सिद्धांत के कुल आठ रस थे, जिनमें शांत रस को उन्होंने नवें रस के रूप में जोड़ा। उनका यह योगदान न केवल भारतीय भाषाओं के साहित्य में एक नवीन आयाम सिद्ध हुआ, बल्कि आगे चल कर पूरा का पूरा भक्ति साहित्य इसी शांत रस की भाव-भूमि पर खड़ा हुआ। इस अर्थ में उनकी यह खोज शास्त्रीय और लोक-साहित्य की दो अलग धाराओं के संगम के लिए जमीन उपलब्ध कराती है। भारतीय आोचना शास्त्र को आचार्य अभिनवगुप्त ने नए अर्थ दिए। लीक से हट कर असहमति को भी अत्यंत सकारात्मक और विनम्र रूप से प्रस्तुत करना आचार्य अभिनवगुप्त की विशेषता है। उनका प्रभाव उनके परवर्ती साहित्य में स्पष्ट दिखाई देता है। यहां तक कि आधुनिक और उत्तर आधुनिक साहित्य में भी उनकी छाप कहीं प्रत्यक्ष तो कहीं अंतर्धारा के रूप में देखी जा सकती है।
अभिनवगुप्त की विशेषता केवल इसमें नहीं है कि उन्होंने दर्शन के पूर्ववर्ती आचार्यों के मतों को आत्मसात किया, बल्कि उनका महत्व इसमें भी है कि उन मतों का सृजनात्मक पुनर्संयोजन किया। उनके लेखन ग्रंथों में दर्शन, सौंदर्य, तंत्र, योग, भक्ति, रहस्य-भावना सभी परस्पर जुड़े हुए हैं। अभिनवगुप्त के चौवालीस ग्रंथों का उल्लेख मिता है। उनकी अनेक रचनाएं नष्ट हो गर्इं या नष्ट कर दी गर्इं। उनके तंत्र एवं दर्शन से संबद्ध ग्रंथ हैं- मालिनीविजयवार्तिक, परात्रिंशिका विवरण, तंत्रालोक, तंत्रसार, बोधपंचदशिका, परमाथर्सार आदि। वे एकमात्र ऐसे चिंतक हैं, जिन्होंने जिन्होंने वाक् और रस, दोनों संकल्पनाओं के बारे में समान योग्यता के साथ प्रकाश डाला है।

आज के एकांगी सूचना प्रवाह को आचार्य अभिनवगुप्त की दृष्टि मिल जाए तो संपूर्ण और सकारात्मक सूचना प्रवाह अस्तित्व में आ सकता है। इसी लक्ष्य को ध्यान में रखकर आचार्य अभिनवगुप्त सहस्राब्दी वर्ष की संपूर्ति समारोह में आचार्य अभिनवगुप्त के चिंतन को समझने की कोशिश की गई। जम्मू और कश्मीर का इतिहास सूत्र वेदों से प्राप्त होता है। कालांतर में बहुत से विदेशी यात्रियों और लेखको ने इस क्षेत्र को अपने लेखों में अखंड भारत का हिस्सा माना है। यह क्षेत्र कई महान साहित्यकारों और आचार्यों का गृह क्षेत्र रहा है।
ठीक इसी तरह कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ भी एक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है, जो बारहवीं शताब्दी तक के कश्मीर के शासक, राजनीति और सैनिक इतिहास का विवरण प्रस्तुत करता है। राजतरंगिणी का एक उद्देश्य यह भी था कि जम्मू और कश्मीर के शासकों को उनके प्राचीन गौरव का स्मरण कराकर कश्मीर की प्रजा के जीवन की गुणवत्ता और सुरक्षा को सुनिश्चित करे।
आचार्य अभिनवगुप्त का काल में भारत पर बाहरी आक्रमण प्रारंभ हो गए थे। अपने दिग्विजय अभियान के तहत कश्मीर के तत्कालीन सम्राट ललितादित्य हिंदुकुश पार के क्षेत्र पर अधिकार जमा चुके थे। तंत्रोक के भुवनमंड में आचार्य अभिनवगुप्त न केवल हिमालयीय क्षेत्र, बल्कि संपूर्ण भारत के भूगोल का वर्णन करते हैं। यही भू-राजनीतिक महत्त्व कालांतर में भी संघर्ष का कारण बना, जो रूस और चीन तथा अमेरिका और ब्रिटेन की विस्तारवादी नीतियों के टकराव में भी दिखायी देता है। शीतयुद्ध के दौरान जिन भू-भागों ने सर्वाधिक मूल्य चुकाया है, उनमें से एक जम्मू कश्मीर भी है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही भारत को अंग्रेजो की ओर से जो त्रुटिपूर्ण विरासत मिली उसमें प्रमुख था भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम और सत्ता हस्तांतरण की योजना। भारत विभाजन का धार्मिक आधार अपने आप में ऐतिहासिक रूप से त्रुटिपूर्ण और अंग्रेजों की वैमनस्यतापूर्ण नीतियों का गलत नतीजा था, जिसने समस्याओं की एक अवांछित शृंखला शुरू की। आचार्य अभिनव गुप्त सहस्राब्दी समारोह के दौरान अभिनव गुप्त के योगदान के साथ जम्मू-कश्मीर पर भी चर्चाएं हुर्इं। ०

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