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चिंताः परदेसी शादी में जवाबदेही

भारत समेत पूरी दुनिया में महिलाएं अच्छे जीवन की चाह में विदेशी जमीन पर बसे या काम कर रहे दूल्हे से शादी के बाद होने वाली धोखाधड़ी की घटनाओं से बुरी तरह त्रस्त हैं।

Author July 31, 2016 2:04 AM

हमारा विदेश मंत्रालय दावा करता रहा है कि वह विदेश में बसे भारतीयों से शादी के मामलों में फर्जीवाड़े से भारतीय दुल्हनों को बचाने के लिए कई उपाय करता है, लेकिन सच्चाई यह है कि ऐसी घटनाओं की प्रभावी रोकथाम नहीं हो सकी है। करीब डेढ़-दो दशक से यूरोपीय व अमेरिकी देशों में बसे भारत के अलावा पाकिस्तानी, बांग्लादेशी परिवारों में भी जबरन शादियों का चलन देखा जा रहा है और उनकी देखादेखी अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और पूर्वी यूरोप से ब्रिटेन में आकर बसे परिवारों में भी यह चलन जोर पकडने लगा है।

भारत समेत पूरी दुनिया में महिलाएं अच्छे जीवन की चाह में विदेशी जमीन पर बसे या काम कर रहे दूल्हे से शादी के बाद होने वाली धोखाधड़ी की घटनाओं से बुरी तरह त्रस्त हैं। कई बार कथित रूढ़िवादी सामाजिक रीति-रिवाजों के विरोध में जाने का साहस नहीं कर पाने के कारण वे पूरा जीवन एक अनचाहे विवाह बंधन में बंधने के लिए विवश होती हैं। भारत में आगरा में विदेशी (रूसी) दुल्हन के साथ जो कुछ हुआ, उसमें विदेश मंत्रालय बल्कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को स्वयं दखल देनी पड़ी। पर ऐसा तो भारतीय महिलाओं के साथ भी (विदेशों में) हो रहा है। यह समस्या ब्रिटेन जैसे यूरोपीय और कनाडा जैसे अमेरिकी देशों के अलावा उन अफ्रीकी देशों में भी अब सिर उठाने लगी है, जहां एशियाई मूल के लोग ज्यादा बसे हुए हैं। इधर, ऐसे मामलों की सुध लेते हुए सरकार ने आप्रवासी भारतीय दूल्हों की धोखाधड़ी की शिकार भारतीय दुल्हनों की मदद के लिए एक उच्चस्तरीय संयुक्त समिति गठित की है, जो विदेशी जमीन पर प्रताड़ित हो रही भारतीय महिलाओं को राहत दिलाएगी।

इसके लिए सरकार ने सैंतीलीस साल पुराने विदेशी विवाह अधिनियम 1969 के संदर्भ टटोले हैं, जिसमें आप्रवासी दूल्हों को ब्याही गई महिलाओं को होने वाली मुश्किलों की स्थिति में सरकार की ओर से सहायता का प्रावधान है। इस अधिनियम की धारा 14 के तहत मैरिज सर्टिफिकेट बुक में बाकायदा दंपति के साथ तीन गवाहों के हस्ताक्षर अनिवार्य हैं, जिन्हें मैरिज अफसर द्वारा सत्यापित किए जाने का प्रावधान भी दर्ज है। पहले ज्यादातर शादियां पारिवारिक मित्रों, पंडितों और जान-पहचान के दायरे में काम करने वाले बिचौलियों के जरिए संपन्न कराई जाती थीं, जिनमें ऐसी धोखाधड़ी अक्सर नहीं होती थी। महिलाओं में विदेश में बसे आप्रवासी दूल्हे से शादी रचाने का भी ज्यादा चलन नहीं था। लेकिन इधर जबसे शादी कराना एक कारोबार हो गया है और महिलाओं में विदेशों में बसने की चाह बढ़ी है, शादी के विज्ञापनों के माध्यम से होने वाले संबंधों की संख्या बढ़ी है। अक्सर ऐसे रिश्तों में पर्याप्त छानबीन नहीं हो पाती है।

सारा मामला पैसे, विदेश में ऊंची वेतनवाली नौकरी और एनआरआई दूल्हे की ख्वाहिश से जुड़ा होता है, ऐसे में धोखाधड़ी की भरपूर आशंकाएं रहती हैं। पंजाब, हरियाणा आदि राज्यों में तो ऐसे अनेक मामले सामने आए हैं, जब शादी करके कुछ दूल्हे या तो विदेश भाग जाते हैं या फिर इन दुल्हनों को विदेश ले जाने के बावजूद वहां दूसरी शादी रचा लेते हैं। ऐसी स्थिति में भारतीय दुल्हनें या तो नौकरानी बनकर रहने को मजबूर होती हैं या फिर प्रताड़ना झेलते रहती हैं।

अब ऐसे ज्यादा मामले ब्रिटेन जैसे देश से भी आ रहे हैं, जिसे आम तौर पर एक सहिष्णु मुल्क माना जाता है। 2013 में केंद्र सरकार ने आंकड़े जारी कर बताया था कि अब ब्रिटेन में आप्रवासी भारतीय दूल्हों के साथ ब्याही गई भारतीय दुल्हनों की प्रताड़ना के सबसे ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं। भारतीय दुल्हनों को प्रताड़ित किए जाने के सबसे ज्यादा मामले ब्रिटेन से आ रहे हैं। इसके अलावा सिंगापुर में 66, कतर में 46, ओमान में 69, कनाडा में 16 स्वीडन मामले सामने आए हैं।

हमारा विदेश मंत्रालय दावा करता रहा है कि वह विदेश में बसे भारतीयों से शादी के मामलों में फर्जीवाड़े से भारतीय दुल्हनों को बचाने के लिए कई उपाय करता है, लेकिन सच्चाई यह है कि ऐसी घटनाओं की प्रभावी रोकथाम नहीं हो सकी है। करीब डेढ़-दो दशक से यूरोपीय व अमेरिकी देशों में बसे भारत के अलावा पाकिस्तानी, बांग्लादेशी परिवारों में भी जबरन शादियों का चलन देखा जा रहा है और उनकी देखादेखी अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और पूर्वी यूरोप से ब्रिटेन में आकर बसे परिवारों में भी यह चलन जोर पकडने लगा है। इस समस्या के मद्देनजर ब्रिटेन में फोर्स्ड मैरिज (सिविल प्रोटेक्शन) एक्ट 2007 पारित हुआ था जिसे 2012 में लागू भी किया जा चुका है। यह कानून लागू होने के साथ इंग्लैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड में जबरन शादी को गैरकानूनी करार दिया गया है। कानून लागू करने की घोषणा करते वक्त तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने जबरन शादी को गुलामी की प्रथा जैसा कहा था।

इस कानून की खासियत यह है कि अब ऐसे किसी मामले में सरकार खुद पहल करेगी और दोषी व्यक्ति को पकड़ उसे सजा दे सकती है। इससे पहले अपने बच्चों की जबरन शादी करने वाले माता-पिता को तभी जेल की सजा हो सकती थी जब उन्हें मुकदमे के दौरान बच्चों को गलत तरीके से कैद रखने, हमला करने और उत्पीड़न का दोषी ठहराया जाए। ये मामले भी तभी सामने आते थे, जब ज्यादा हंगामा होने पर कोई स्वयंसेवी संस्था इसकी शिकायत करती थी। सच यह है कि कानून के बावजूद जबरन शादी के मामले की रोकथाम संभव नहीं हो रही है। कर्मा निवार्णा जैसी संस्थाओं के मुताबिक सिर्फ ब्रिटेन में ही हर साल 1500 से 5000 शादियां जबर्दस्ती कराई जा रही हैं। परिवारों के अंदर ये शादियां बेहद दबाव के साथ गुपचुप ढंग से करा दी जाती हैं, जिस कारण ऐसे उपायों की जरूरत पड़ रही है। विदेशों में ऐसे कानूनों और ऐसे उपायों की जरूरत क्यों पड़ रही है, इसके लिए ज्यादा गहरी पड़ताल करने की जरूरत नहीं है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि एशियाई देशों से वहां जाकर बसे लोगों ने भौतिकता के मामले में तो काफी तरक्की कर ली है, लेकिन वे यहां से वहां ढोकर ले जाए गए बुरे रिवाजों और सामाजिक कुरातियों की मानसिकता से पिंड नहीं छुड़ा पा रहे हैं। ब्रिटेन या किसी और विकसित मुल्क में रहते हुए भी वे न तो शादी-ब्याह में जाति, गोत्र देखने की जिद निभाने के मामले में पीछे हैं और न परिवारों में पीढ़ियों से चली रही खराब परंपराओं का पालन करने में।

एक ओर ये परिवार अपने बच्चों पर जबरन शादी थोप रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अगर कोई अपनी मर्जी से शादी करने की गुस्ताखी करता या करती है तो उस पर भयानक जुल्म ढाए जाते हैं। ब्रिटेन में कई युवाओं, खास तौर से लड़कियों की हत्या परिवार वालों ने की है और इन मामलों को वहां के मीडिया ने खूब उछाला है। नया कानून लागू होने पर और कर्मा निवार्णा जैसी दान संस्थाओं की सलाहों पर अमल से ब्रिटेन में तो जबरन शादी के मामलों में कमी आने की उम्मीद है पर क्या दूसरे देशों में ऐसा होना मुमकिन है। अमूमन ऐसी शादियों का नतीजा यह होता है कि या तो जीवन भर के संबंध खत्म कर लिए जाते हैं और अगर परिवार के पुरुष ज्यादा दबंग हुए तो दुल्हन को बेसहारा छोड़ दिया जाता है। वोट की राजनीति के नजरिए से देखें तो ब्रिटेन के राजनेता भी वहां बसे एशियाई तबके की नाराजगी मोल नहीं ले सकते। हालांकि बचावकारी कानूनों का लागू होना और बचाव के सुझावों का प्रकाश में आना दर्शाता है कि समाज सुधार की एक बड़ी पहल कैसी भी राजनीतिक मजबूरी के कारण हाशिये पर नहीं चली जाती है। इसलिए जरूरी है कि भारत खुद भी विदेश में शादी रचा रही महिलाओं की समस्याओं को सुलझाने के लिए कठोर कायदे-कानून बनाए और उन्हें लागू करे।

यों देखा गया है कि सामाजिक मसलों पर नियम-कायदे बनाने में हमारी सरकारें बहुत हिचकचाती हैं। इसका एक उदाहरण है शादी के पंजीकरण का मामला। इस बारे में सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में ही निर्देश दे दिया था कि विवाह के पंजीकरण को अनिवार्य करने के लिए कानून बनाया जाए। पर इस आदेश के बावजूद आरंभ में कुछ ही राज्यों ने ऐसे नियम बनाए और वह भी सिर्फ हिंदुओं के लिए। असल में हमारे देश का राजनीतिक नेतृत्व शादी-ब्याह जैसे संवेदनशील मामलों में हाथ डालने के जोखिम से बचना चाहता है। इसीलिए हमारे सामाजिक जीवन को व्यवस्थित करने का काम भी अदालतों के जरिए हो रहा है, जो एक बड़ी विडंबना ही है क्योंकि हमारा समाज और सरकार इस संबंध में कोई पहल नहीं कर पा रहे हैं। शायद इसका कारण यह है कि ये सारे मामले महिलाओं के अधिकारों से जुड़े होते हैं। समाज अब भी स्त्रियों को लेकर सामंती नजरिए से मुक्त नहीं हो पाया है, इसलिए विवाह में उनकी मर्जी और शादी के बाद उनकी स्थिति के बारे में कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पाती है। इसी कारण शादी के ज्यादातर मामलों में महिलाएं ही पीड़ित होती हैं। उन्हें हमारा समाज और सरकार मिल कर कोई राहत दिला पाएं तो ही महिलाओं की स्थिति में कुछ और सुधार की उम्मीद की जा सकती है। ०

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