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आधी दुनियाः जो हारी हैं, दुखियारी हैं…

पिछले दिनों एक अस्सी साल की कृशकाय बूढ़ी अम्मा से मुलाकात हुई थी। वह लाठी टेकती मिली थी। पता चला कि उसका इकलौता बेटा उसे रखने को तैयार नहीं था। दो लड़कियां हैं, मगर वे भी जिम्मेदारी लेना नहीं चाहतीं।

Author September 2, 2018 6:36 AM
गरीब औरतों की नौकरी जाने में एक यह सोच भी काम करती है कि आदमी की नौकरी का मतलब है परिवार का चलना और औरत की नौकरी का मतलब है उसका अपना खर्चा, अपनी सुख-सुविधा।

क्षमा शर्मा

पिछले दिनों एक अस्सी साल की कृशकाय बूढ़ी अम्मा से मुलाकात हुई थी। वह लाठी टेकती मिली थी। पता चला कि उसका इकलौता बेटा उसे रखने को तैयार नहीं था। दो लड़कियां हैं, मगर वे भी जिम्मेदारी लेना नहीं चाहतीं। उनका कहना है कि अपने परिवार और ससुराल वालों को देखें या तुम्हें रखें। बेटा जबर्दस्ती बेटियों को घर छोड़ आता है, तो लड़कियां और उनके पति कलह कर-कर के दो दिन नहीं रहने देते। उधर बेटे ने पूरे मकान पर कब्जा कर लिया है। और एक छोटी-सी कोठरी जो पहले र्इंधन रखने के काम आती थी और जिसमें मुश्किल से सोने भर की जगह निकलती है, वहां से भी उसे निकालना चाहता है। पड़ोसियों की पूरी सहानुभूति इस महिला के साथ है, मगर वे भी क्या करें।

दूसरे के घर के मामले में कितना बोलें। कल को मां-बेटे एक हो गए तो वे क्या करेंगे। वे तो बिना कारण बुरे बनेंगे। यह महिला लाठी टेकते कई बार इलाके के सांसद और पार्षद से मिलने की कोशिश कर चुकी है। एक बार एक सार्वजनिक मीटिंग में भी इसने मंत्री तक पहुंचने की कोशिश की थी। पुलिस के हाथ जोड़े थे। एक पड़ोसी ने एक वकील के पस भी भेजा था। वकील ने इसकी बात सुनने भर के इससे पांच सौ रुपए रखवा लिए थे। और कहा था कि ऐसा करो कि मुकदमा कर दो। लेकिन मुकदमे के नाम से यह महिला घबरा गई थी, क्योंकि जिस घर में बिना मुकदमे के बेटा नहीं रहने दे रहा, वहां से उसे निकालना चाहता है, वहां अगर उसने मुकदमा कर दिया तो न जाने क्या होगा। इसके अलावा मुकदमे का भरोसा भी क्या कि वह कब तक चलेगा, और फैसला क्या होगा। ऐसे में बेटे ने मारपीट कर अगर हाथ-पांव तोड़ दिए, तो बाकी की जिंदगी कैसे गुजरेगी। आखों से तो पहले ही नहीं दीखता, हाथ-पांव भी गए तो रोटी के लिए भी तरसेगी। अभी तो वह जैसे-तैसे दो वक्त की रोटी बना पाती है। घर में जब बेटा ही नहीं पूछता तो बहू तो क्या पूछे। इस महिला के मामले में कोई रिश्तेदार भी आगे नहीं आया। जिसके पास भी अपनी राम कहानी सुनाने गई वह दाएं-बाएं हो लिया।

यह तो एक गरीब बूढ़ी, विधवा स्त्री की कहानी है, लेकिन जो स्त्रियां युवा और गरीब हैं, कानून को नहीं जानतीं उन्हें भी जांच एजेंसियों से लेकर परिवार और मीडिया तक किसी की मदद नहीं मिलती। कई बार परिजनों और पड़ोसियों का व्यवहार देख कर हैरत होती है। लोग इतने आत्मकेंद्रित हो चले हैं कि अपने अलावा किसी दूसरे से कोई मतलब ही नहीं है जैसे। वैसे भी इन दिनों दूसरों के मामले में अक्सर कोई नहीं बोलता कि कौन दूसरे की मुसीबत अपने सिर मोल ले। और दूसरे के लिए भाग-दौड़ करने का समय भी किसी के पास नहीं है। फिर बूढ़ी, साधनहीन, परेशान औरतों से क्या मिलेगा। यों कहने को हो कहा जाता है कि इन दिनों औरतें चाहें तो उन्हें हर तरह की कानूनी मदद मिल सकती है। सरकारें उनकी मदद कर सकती हैं। हर बहस में किसी भी बात के लिए अक्सर विद्वान लोग पुलिस, कोर्ट, कचहरी जाने की सलाह देते हैं। वे तो सलाह देकर निकल लेते हैं, मगर यह नहीं बताते कि जब एक बार महिलाएं इन लंबी प्रक्रियाओं में उलझ जाएंगी तो वे इनसे निकलेंगी कैसे और क्या उन्हें न्याय मिलेगा।

आम गरीब और साधनहीन औरतों को पहले तो इस तरह की किसी मदद की जानकारी ही नहीं होती। होती भी है, तो वे वहां तक पहुंच नहीं पातीं। और पहुंच भी जाएं तो यह बड़ा मुश्किल है कि कोई बिना किसी स्वार्थ के उनकी मदद कर दे। कहीं बाढ़ आ जाए, भूकंप आए, आग लग जाए, कोई दुर्घटना हो जाए तो अक्सर इन्हीं औरतों के घर उजड़ते हैं, ये ही बेसहारा होती हैं, पाई-पाई जोड़ कर जो कुछ बनाया होता है वह एक पल में नष्ट हो जाता है, मगर चैनल और मीडिया की चमकीली दुनिया अक्सर इन तक नहीं पहुंचती। यही नहीं, इन गरीब औरतों में से जो दिहाड़ी मजदूरी पर काम करती हैं या छोटे-मोटे उद्योगों में लगी हैं, जब भी नौकरी जाने की बात होती है, गाज इन्हीं पर गिरती है। यही कंपनी के खर्चे घटाने की कवायद में सबसे पहला शिकार बनती हैं। ये अठारह-बीस घंटे काम करती हैं, बल्कि वश चले तो इनसे चौबीसों घंटे काम लिया जाए, मगर ये निठल्ली अमीर औरतों और मीडिया में छाई बालीवुड हीरोइंस की तरह किसी की रोल मॉडल नहीं बनतीं।

गरीब औरतों की नौकरी जाने में एक यह सोच भी काम करती है कि आदमी की नौकरी का मतलब है परिवार का चलना और औरत की नौकरी का मतलब है उसका अपना खर्चा, अपनी सुख-सुविधा। जबकि सच्चाई यह है कि इनके परिवारों पर अगर नजर डालें तो दोनों पति-पत्नी के काम करने के बावजूद घर का खर्चा मुश्किल से चल पाता है। ऊपर से हारी-बीमारी, बहुत से बच्चों और अपने माता-पिता की जिम्मेदारी भी होती है। बहुत-सी कंपनियों में अगर ये औरतें मातृत्व अवकाश लेती हैं, तो इनके पैसे भी काट लिए जाते हैं। मगर इनके प्रति होते अन्याय को सहने के हम इतने आदी हो चुके हैं कि इनकी परेशानियों से अक्सर मुंह फेरे रहते हैं।

प्रियंका चोपड़ा अपने से ग्यारह साल छोटे निक जोंस से शादी कर रही हैं या कि बारिश के दिनों में मुंबई में अमिताभ बच्चन के घर में पानी भर गया और अभिषेक बच्चन को सिर पर उठा कर पानी लाना पड़ा, आदि जितनी बड़ी खबरें बनती हैं, गरीब की जगह उतनी नहीं है। लेकिन उसी मुंबई में लाखों गरीब रहते हैं, उनकी स्त्रियां रहती हैं, उनकी बात कोई नहीं करता। किसी आपदा में भी हमें कोई सेलिब्रिटी चाहिए। और किसी अरबपति के दुख के मुकाबले किसी फटेहाल के दुख की कीमत भी क्या। खबर वह अच्छी, जिससे कुछ आया हो। विज्ञापन मिले। गरीब जिसकी जेब में कुछ नहीं, जिस स्त्री के पैरों में बिवाइयां फटी हुई हैं, जो दूसरों का बोझ उठा कर खुद काम चलाती है, जिसका चेहरा दीपिका पाडुकोण या आलिया भट्ट की तरह चमकीला नहीं है उसकी खबर के विज्ञापनदाता की नजर में कितने टके उठते हैं। ये गरीब औरतें तब तक कभी खबर और बहस का हिस्सा नहीं बनती हैं, जब तक कि किसी हादसे का शिकार न हो जाएं।

इनकी मदद के लिए इनकी सुने जाने के लिए आखिर किसी हादसे या दुर्घटना की जरूरत क्यों हो। ये भी तो इस देश की उतनी ही नागरिक हैं, इसके अलावा ये भी तो वैसी ही वोटर हैं जैसी कि कोई सेलिब्रिटी। लेकिन सेलिब्रिटी जब वोट देने जाती हैं, तो कैमरे उनके पीछे भागते हैं और ये औरतें टुकुर-टुकुर ताकती हैं। छोटे कसबे गांवों में जो औरतें रहती हैं, जिनके पास आय के बहुत मामूली साधन हैं, इसके अलावा महानगरों की तरह न वहां मीडिया है, न औरतों की बातें करने वाले संगठन हैं न एन जी ओज हैं न मामूली बातों पर खुलने वाले रोज के मोर्चे हैं , शिक्षा अगर है भी, तो रोजगार नहीं हैं ऐसे में ये औरतें क्या करें।ये भी तरह-तरह से सताई जाती हैं। तमाम तरह के भेदभाव और दुखों को झेलती हैं मगर इनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं।

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