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यज्ञ से मिलेगी वायरस से मुक्ति

किसी भी प्रकार के वायरस को मिटाने, दूर भगाने तथा वायरस का प्रभाव कम करने में यज्ञ बहुत ही लाभकारी होता है। जो भी वायरस है वह एक से दूसरे में फैलते हैं। जल, वायु तथा स्पर्श से यह वायरस फैलते चले जाते हैं।

वैदिक यज्ञ और हवन।

डॉ. वरुण धीर
चीन से फैले कोरोना वायरस ने पूरे विश्व को हिला कर रख दिया है। यह एक वायरस नहीं है जिसने हजारों लोगों की जान ली हो बल्कि ऐसे अनेक वायरस समय-समय पर देखने को मिलते हैं। आज की आधुनिक जीवन पद्धति में शरीर एवं मन को सुखी बनाने के लिए वैज्ञानिक या फिर कई वर्ग कुछ ना कुछ नए अनुसंधान करके प्रकृति से छेड़छाड़ करते रहते हैं, दूसरी ओर तामसिक भोजन जिसमें मांसाहार सबसे अधिक रोगाणुओं को फैलाने का काम करता है। मनुष्य का जीवन उसका आहार विहार जितना सात्विक तथा प्राकृतिक होगा उतना ही वह सुखी व स्वस्थ होगा। हम भारतीयों की वैदिक परंपरा मनुष्य को प्रकृति एवं जीव जंतुओं का प्रेमी तथा रक्षक बनाती है। वैदिक परंपरा में यज्ञ का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है जो कि विज्ञान की कसौटी पर भी खरा उतरता है।

किसी भी प्रकार के वायरस को मिटाने, दूर भगाने तथा वायरस का प्रभाव कम करने में यज्ञ बहुत ही लाभकारी होता है। जो भी वायरस है वह एक से दूसरे में फैलते हैं। जल, वायु तथा स्पर्श से यह वायरस फैलते चले जाते हैं। इन्हें रोकने के लिए पहले तो यह करना चाहिए कि यह उत्पन्न ही ना हो। जीवन सरल एवं सत्व से भरपूर हो, जल, वायु, भूमि शुद्ध बनी रहे और यदि वायरस उत्पन्न हो भी जाते हैं तब औषधि का प्रयोग करके इन्हें दूर करना चाहिए। जब से विश्व में यज्ञ की परंपरा समाप्त हुई है तभी से अनेक प्रकार के शारीरिक और मानसिक रोग बढ़ गए हैं। वेद में यज्ञ का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान माना गया है। यज्ञ द्वारा सभी प्रकार के रोगों को दूर करने का भी विधान है। यज्ञ चिकित्सा पद्धति के रूप में भी प्रयोग किया जाता रहा है।

इससे क्या- क्या लाभ हो सकते हैं इस विषय पर अनेक अनुसंधान समय-समय पर होते रहते हैं। अमेरिका के वॉशिंगटन डीसी शहर में स्थित फाईव फील्ड पाथ नामक संस्था ने अग्निहोत्री यूनिवर्सिटी स्थापित करके अमेरिका तथा जर्मनी में अनेक अनुसंधान किए हैं। प्रकृति का नियम है कि जब कोई पदार्थ अग्नि में डाला जाता है तो उसका नाश नहीं होता बल्कि उस पदार्थ का गुण कई गुना बढ़कर वायुमंडल में फैल जाता है। जैसे लाल मिर्च को सूंंघा जाए तो कुछ फर्क नहीं पड़ता। लेकिन जब उसे आग में जला दिया जाए तो वह दूर-दूर तक पहुंचकर सभी को छींक खांसी से परेशान कर देती है।

एक छोटी सी लाल मिर्च का प्रभाव जलाने पर बहुत दूर तक फैलता है इसी प्रकार जब औषधियों को मिलाकर सामग्री बनाई जाती है तब उसका प्रयोग यज्ञ में किया जाता है तब दूर-दूर तक उसकी सुगंध तथा शक्ति पहुंचती है, जो अनेक प्रकार के विषैले जीवाणुओं को मारने या फिर भगाने का काम करती है। जिस स्थान पर लगातार हवन होता है वहां का वातावरण शुद्ध एवं पवित्र रहता है। जब कोई साधारण रोग होता है तब डॉक्टर उसे दवाई देता है लेकिन जब रोग बढ़ जाता है तब रोगी को इंजेक्शन दिया जाता है कि वह जल्दी ठीक हो जाए। यज्ञ दवाई और इंजेक्शन दोनों का ही काम करता है। श्वास तथा शरीर के रोम कूपों के माध्यम से रोग के कीटाणु जल्दी नष्ट हो जाते हैं।

इसलिए वेद में कहा गया है कि इदं हवि यार्तुधानान् नदीफेननिवाऽऽवहत ॥ हे मनुष्य यज्ञ में दी गई रोग नाशक आहुति तेरे रोग और रोग को उत्पन्न करने वाले कीटाणुओं को जैसे नदी में फेनों को अपने वेग से दूर बहाकर ले जाती है वैसे ही वह दूर ले जाए। इससे पता लगता है कि यह कि रोग नाशक गंध शरीर में प्रविष्ट हो कर रोग के कीटाणुओं के विरुद्ध अपना कार्य कर उन्हें नष्ट कर देती है।

ऋग्वेद के एक मंत्र में और अधिक स्पष्ट बताया है कि त्वामग्ने प्रदिव: आहुर्त दहतै: सुम्नाय: सुषुमिधा समीधिरे’स वावृधान: ओषधिमिस्क्षतोऽभि प्रयांसि पार्थिवा वितिष्ठसे ॥ हे अग्नि तुझे ज्ञानी जन सबके सुख की कामना करते हुए उत्तम समिधा और घृतादि आदि पदार्थों से वेदी में प्रकाशित करते हैं, और उन पदार्थों के सेवन से उत्पन्न हुए रोगों के कीटाणुओं का मुकाबला कर उन्हें नष्ट कर देते हैं। वेद के इस वचन से स्पष्ट हो जाता है कि यह रोग के कीटाणुओं का नाश कर देता है। जैसे संसार में किसी पदार्थ का नाश नहीं होता बल्कि दूसरे रूप में परिवर्तित हो जाता है। ठीक उसी तरह पदार्थ का दूसरे रूप में बदल जाना या फिर हमारी आंखों से ओझल हो जाने का ही नाम लोप या नाश है।

महर्षि पाणिनि ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ अष्टाध्यायी में कहा है। अदर्शनं लोप: अर्थात किसी पदार्थ का ना दिखने का ही नाम लोप या नाश है। इस सिद्धांत के अनुसार यज्ञ में डाली हुए घृत औषधि आदि पौष्टिक तथा रोग नाशक पदार्थ भी नष्ट नहीं होते बल्कि अपनी शक्ति से उन्हें छिन्न-भिन्न कर बहुत सूक्ष्म बना देते है। वह पदार्थ वायु द्वारा आकाश में फैल जाते हैं। वायु और वर्षा के कारण सभी प्राणियों की नासिका व रोम कूपों द्वारा पहुंचकर रोग व निर्बलताओं को नष्ट करते हैं।

यज्ञ के अनेक प्रकारों की चर्चा की गई है। 1 अग्निहोत्र 2 दर्श पूर्णिमा 3 चातुर्मास 4 पशु 5 सोम। विशिष्ट प्रयोजनों के लिए अनेक प्रकार के दूसरे यज्ञों का विधान है। जैसे भैषज्य, राजसूय, वाजपेय अग्निष्टोक, सन्रमेध, सोमयाग, पुरश्चरण आदि। अलग-अलग समय एवं आयोजनों पर अलग-अलग यज्ञों का विधान है। लेकिन करोना वायरस या फिर इस प्रकार के वायरस से बचने व दूर करने के लिए प्रतिदिन अग्निहोत्र किया जाना चाहिए। जिसकी सामग्री भी विशेष प्रकार की होनी चाहिए। जिसमें कपूर, गूगल, मुनक्का, सफेद चंदन, लाल चंदन, अगर, तगर, चिरौंजी, नारियल, जायफल, लॉन्ग, किशमिश, बड़ी इलायची, सहदेवी, जटामासी,शतावर, ब्राह्मि इत्यादि तथा देशी गाय का घी भी होना चाहिए। आम की लकड़ी की समिधा उत्तम है। कम से कम आधा किलो घी का हवन प्रतिदिन करें और घर में कपूर तथा सरसों के तेल का दिया पूरे दिन जलाकर रखें। जो लोग यज्ञ की विधि को नहीं जानते उन्हें पुरोहित को बुलाकर साधारण यज्ञ की विधि सीखनी चाहिए जिससे कि प्रतिदिन अपने आप यज्ञ किया जा सके। यज्ञ बिना मंत्रों के पूर्ण नहीं होता है।

विशेष मंत्रों के साथ ही आहुति देनी चाहिए यदि मंत्र नहीं आते हैं तो उन्हें सीखने का प्रयास करें और बिना मंत्रों के भी वायरस को भगाने के लिए हवन करें क्योंकि मुख्य काम वायरस तथा ऐसी विषैली गैसों को भगाने का है जो मानव जीवन के लिए खतरा बन जाते हैं। मनुष्य ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है इसकी रक्षा मुख्य है।
यदि आज समूचे विश्व में मांसाहार समाप्त हो जाए और प्रत्येक घर में यज्ञ होने लगे तो अस्पतालों की संख्या समाप्त हो जाएगी। जीवन सुख शांति तथा आनंदमय हो यही यज्ञ का उद्देश्य होता है।

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