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लौट रहा हूं मैं

अलंकरण लेने की खबर उतनी बड़ी नहीं बन सकी, जितनी उसके लौटाने की बन रही है। लेने का मूल्य नहीं, लेकिन लौटाने का मूल्य है!

Author October 18, 2015 12:02 PM
सुधीश पचौरी

अलंकरण लेने की खबर उतनी बड़ी नहीं बन सकी, जितनी उसके लौटाने की बन रही है। लेने का मूल्य नहीं, लेकिन लौटाने का मूल्य है! एक के बाद एक पच्चीस-तीस लेखकों के अलंकरण लौटाने की खबर क्रमश: बनती रही है। लौटाने में कंपटीशन हो रहा है। कुछ लौटा चुके हैं, कुछ लौटाने वाले हैं।

कुछ लौटाने की सोच रहे हैं। क्रमिक भाव से आने वाली लौटाने की घटनाएं अब ‘विरोध का धारावाहिक’ बन चली हैं। लगभग हर व्यख्याकार और लेखक ने विरोध को प्रतीकात्मक कहा है। यहां कई तरह के विरोध एक साथ मिक्स होकर आते दिखते हैं। यह दादरी कांड का विरोध है। यह कलबुर्गी की हत्या का विरोध है। ऐसी घटनाओं पर पीएम के न बोलने पर रोष का प्रतीक है।

प्रतीकवाद का दुर्भाग्य कि टीवी युग में प्रतीक संभव नहीं। प्रतीक भी ड्रामा बन कर आते हंै और इसीलिए लेखक की ‘सविनय अवज्ञा’ भी सत्ता के प्रवक्ताओं की आलोचना बन जाती है। अब तक के सकल प्रसारण बताते हंै कि ताकतवर सत्ता तक मामूली लेखकों के इस प्रतिरोध से डरती है, इसीलिए प्रत्याक्रमण बढ़े हैं!

लेकिन इस विरोध में अपना बांकपन है! टीवी में लेखकों की तसवीरें देर तक रहती हंै। लेखक अकादेमी को ताना-सा मारते हंै कि तूने ‘जो कुछ मुझे दिया है वो लौटा रहा हूं मैं’! दूषण किसी का है, विरोध किसी का है। इस तरह विरोध में विरोधाभासी आनंद तो है ही, वह क्षुब्धकारी भी है।

वह उस अलंकार की तरह है, जो कहता है ‘कारण कहूं कारज कहूं अचरज कहत बनै न!’ अलंकरण के विरोध में भी अलंकार खड़ा है। यही सबसे बड़ा ‘विरोधाभास’ अलंकार है।
यह कहानी इसलिए बड़ी बन रही है कि बहुत दिन बाद साहित्य विरोध की भूमिका में लौटा है, इसलिए अलंकरण का लौटाना ही, विरोध ही मूल्य बन गया है।

पंद्रह दिन से चल रही ‘सविनय लौटाने’ की कहानी अब तक जारी है। जिन लेखकों को कोई नहीं जानता था, अब दुनिया जानती है। जिन्होंने लौटाया है, वे बार-बार दिखाए जा रहे हंै, जिन्होंने नहीं लौटाया है वे अकादेमी की कथित स्वायत्तता की वकालत कर रहे हंै और कह रहे हंै कि अकादेमी का क्या कसूर, दादरीकांड अकादेमी का किया नहीं, लेकिन लौटाने की लहर इस कदर मूल्यवान बन गई है कि न लौटाने वाला कायर लगता है। लौटाने के हल्ले में आलोचना नहीं जमती। कुछ ऐसे भी हैं, जो वैसे तो लौटाने वालों के साथ हैं, लेकिन खुद लौटाने से मना कर रहे हैं!

रामचंद्र गुहा इंडिया टुडे में आकर करण थापर से कहते हैं कि मैं लौटाने वालों की इज्जत करता हूं और संस्कृति मंत्री के बयान से चकित हूं कि वे साहित्य से इस कदर घृणा करते हैं! और पीएम ने भी जो बोला ‘वह बहुत देर में और बहुत कम कम’ बोला!
एनडीटीवी पर बरखा सलमान रश्दी की नई रिलीज होने वाली किताब के बहाने लेखकों के प्रतिरोध पर उनसे बात कर रही हंै और रश्दी बढ़ती अनुदारता और असहनशीलता पर तीखी टिप्पणी किए जा रहे हैं और फिर जोड़ते हंै कि पीएम सबसे मुखर आदमी हैं, वे क्यों नहीं बोलते?

और प्रधानमंत्री अंतत: बोलते हैं, लेकिन देर से और किश्तों में! बिहार के चुनाव में जो बोलते हंै वह उदारतावादियों को जंचता नहीं।
लेकिन टाइम्स नाउ इतने पर ही निहाल हुआ जाता दिखता है। एंकर बोला: ‘पीएम टेक्स लीड आॅन बीफ पॉलिटिक्स’ (प्रधानमंत्री ने गोमांस की राजनीति पर हस्तक्षेप किया)! एंकर ने कहा: पीएम ने लक्ष्मणरेखा खींच दी है। अब तो घृणा का तूफान उठाने वाले खामोश हों!
पीएम का वक्तव्य भी विवाद का विषय बन जाता है। सबसे मार्के की टिप्पणी नीतीश की होती है, जो अर्णव गोस्वामी से एक घंटे लंबी बातचीत में सिर्फ इतना कहते हंै कि मोदीजी ने ये भी क्या बोला? बोले तो राष्ट्रपति की आड़ लेकर बोले। वे हम सबके पीएम हंै। देश के सबसे बड़े नेता है। बोलना ही था तो दादरी कांड का नाम लेकर बोलते! निंदा करते!
जरा-सी देर में पीएम का वक्तव्य मायने खो बैठता है। हर चैनल पर एक न एक प्रवक्ता कहने लगता है कि वे कांड का नाम लेकर बात करते, तो बेहतर होता।

नतीजा यह कि पीएम को दुबारा बोलना पड़ता है। वे एक अखबार को साक्षात्कार में बोले कि दादरी कांड से वे आहत हंै!
और इतना कहा भी नाकाफी रहता है। एनडीटीवी में मल्लिका साराभाई बोलती हंै कि मोदीजी को कहना था कि मैं ऐसी हरकतें बर्दाश्त नहीं करने वाला! यानी मल्लिकाजी लिख देतीं और उसे बोलते तो वे सही होते!

उदारता को भी कहां तसल्ली होती है? वह भी सशर्त आती है। उधर भाजपा के प्रवक्ता की तरह बात करने वाले सुधांशु मित्तल मोदीजी के बयान की व्याख्या करने की जगह सेक्युलरों पर पिल पड़ते हंै कि सेक्युलर लोग अमरनाथ यात्रियों की हत्या पर चुप क्यों रहे? मोदी के समकक्ष सेक्युलरों को रख कर वे मोदीजी की किरकिरी ही करते दिखे! ये कैसे प्रवक्ता लगा रखे हैं सरजी?
इसी बीच मुंबई में कालिख का विमर्श बनाया गया, जिसके तहत कुलकर्णी का चेहरा काला कर दिया।

लेकिन उसके फौरन बाद कलम जी उठी और कालिख पर भारी पड़ी। कालिख इस कदर लगाई गई कि कुलकर्णी का चेहरा एकदम बेपहचान हो गया! कैमरों की लाइट में पेंट चमकता रहा। कुलकर्णी ने भी पोंछा नहीं। वे बताते रहे कि यह भगवा रंग की जैकिट है और यह तिरंगे का बिल्ला है मेरा अभिमान और इसे भी न छोड़ा। इस बेशर्म समय में वे किसे लज्जित करना चाहते थे?

वे देर तक ‘विक्टिम’ खेलते रहे और कालिख लगाने वाले दहाड़ते रहे। संजय राउत का बयान बार-बार आता रहा कि जो पाकिस्तान हमारे सैनिकों को मारता है, उसके विदेशमंत्री की किताब रिलीज करोगे तो यही होगा। हम रिलीज नहीं करने देंगे! उनके टारगेट नसीरुद्दीन शाह तक बने, जो बाद में अपना पक्ष रखते रहे!
ये कैसे लोग है, जिनको अलंकार के लौटाने पर भी शिकवा है?

सुधीश चौधरी

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