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स्त्री-यातना का सच

भारतीय समाज के पुरुष-प्रधान होने की वजह से महिलाओं को अत्याचार का सामना करना पड़ता है। आमतौर पर महिलाओं को जिन समस्याओं से दो-चार होना पड़ा है उनमें प्रमुख हैं दहेज-हत्या, यौन उत्पीड़न, लूटपाट, राह चलते छेड़-छाड़ आदि।

Author July 29, 2018 4:37 AM
भारतीय समाज में एक तरफ तो महिलाओं को देवी की तरह पूजने का आदर्श सिद्धांत है, पर दूसरी तरफ वास्तविकता यह है कि समाज की महत्त्वपूर्ण इकाई होने के बावजूद आज भी वे कई स्तरों पर बेसहारा और बेबस महसूस करती हैं।

गरिमा सिंह

भारतीय समाज में एक तरफ तो महिलाओं को देवी की तरह पूजने का आदर्श सिद्धांत है, पर दूसरी तरफ वास्तविकता यह है कि समाज की महत्त्वपूर्ण इकाई होने के बावजूद आज भी वे कई स्तरों पर बेसहारा और बेबस महसूस करती हैं। महिलाएं हर तरह की हिंसा का शिकार हुई हैं। भारतीय समाज में आज भी माना जाता है कि महिला का पति उसके लिए भगवान समान है। उन्हें हर चीज के लिए अपने पति पर निर्भर रहना चाहिए। पुराने समय में विधवा महिलाओं के दुबारा विवाह पर पाबंदी थी और उन्हें सती प्रथा को मानने का दबाव डाला जाता था। महिलाओं को पीटना पुरुष अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते थे। महिलाओं के प्रति हिंसा में तेजी तब आई जब नाबालिग लड़कियों को मंदिर में दासी बना कर रखा जाने लगा। इसने धार्मिक जीवन की आड़ में वेश्यावृति को जन्म दिया।

मध्यकाल में इस्लाम और हिंदू धर्म के टकराव ने महिलाओं के विरुद्ध हिंसा को बढ़ावा दिया। नाबालिग लड़कियों का बहुत कम उम्र में विवाह कर दिया जाता था और उन्हें हर समय पर्दे में रहने की सख्त हिदायत दी जाती थी। इस कारण महिलाओं के लिए अपने पति तथा परिवार के अलावा बाहरी दुनिया से किसी भी तरह का संपर्क स्थापित करना नामुमकिन था। इसके साथ ही समाज में बहुविवाह प्रथा ने जन्म लिया, जिससे महिलाओं को अपने पति का प्यार दूसरी महिलाओं से बांटना पड़ता था। नववधू की हत्या, कन्या भ्रूण हत्या और दहेज प्रथा महिलाओं पर होती बड़ी हिंसा का उदाहरण हैं। इसके अलावा महिलाओं को भरपेट भोजन न मिलना, सही स्वास्थ्य सुविधा की कमी, शिक्षा के पर्याप्त अवसर उपलब्ध न होना, नाबालिग लड़कियों का यौन उत्पीड़न, दुल्हन को जिंदा जला देना, पत्नी से मारपीट, परिवार में वृद्ध महिलाओं की अनदेखी आदि समस्याएं भी उन्हें सहनी पड़ती थीं।

शिक्षा और सामाजिक बदलाव के बाद भी महिलाएं लगातार हिंसा का शिकार हो रही हैं। उनमें हिंसा का डर इस कदर घर कर गया है कि वे अपने पसंदीदा क्षेत्रों में खुल कर भागीदारी भी नहीं कर पा रही हैं। इससे उनके दिलो-दिमाग पर गहरा असर पड़ा है। एक तरफ दुनिया में लगातार तकनीकी प्रगति हो रही है, खुशहाली का स्तर बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ महिलाओं से अप्राकृतिक यौन संबंध, हिंसा और दुर्व्यवहार में भी वृद्धि हो रही है। आजकल महिलाओं से बलात्कार और उनकी बर्बरता पूर्वक हत्या कर देना आम घटना हो गई है। महिलाओं के विरुद्ध बढ़ती हिंसा से सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विकास पर भी बुरा असर पड़ रहा है।

भारतीय समाज के पुरुष-प्रधान होने की वजह से महिलाओं को अत्याचार का सामना करना पड़ता है। आमतौर पर महिलाओं को जिन समस्याओं से दो-चार होना पड़ा है उनमें प्रमुख हैं दहेज-हत्या, यौन उत्पीड़न, लूटपाट, राह चलते छेड़-छाड़ आदि। भारतीय दंड संहिता में ऐसी प्रवृत्तियों को गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा गया है, फिर भी महिला हिंसा में लगातर वृद्धि हो रही है। एक ताजा शोध के अनुसार महिलाएं सबसे पहले हिंसा का शिकार अपनी प्रारंभिक अवस्था में अपने घर में होती हैं। खासकर ग्रामीण इलाकों में महिलाओं को उनके परिजनों, रिश्तेदारों, पड़ोसियों द्वारा प्रताड़ित किया जाता है।

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार महिलाएं अपने ससुराल में बिल्कुल सुरक्षित नहीं हैं। भारत में महिला हिंसा से जुड़े मामलों में कमी लाने के मकसद से 2015 में किशोर न्याय (बाल देखभाल एवं संरक्षण) कानून बना। इस कानून के तहत गंभीर अपराधों में संलिप्त सोलह साल के किशोरों के लिए भी सख्त सजा का प्रावधान है। पर इस कानून से भी समाज में कोई भय पैदा होता नहीं दिखता। आज के समय में जब हम शिक्षा, तकनीक से लेकर ज्ञान-विज्ञान सहित हर क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं, इतनी प्रगतिशीलता के बावजूद घरेलू हिंसा को जायज मानना अपने आप में बेहद शर्मनाक और चिंता का विषय है।

इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है, लड़कियों को बचपन से दी जाने वाली शिक्षा और संस्कार, जिसमें उनका अपना घर जहां वे जन्म लेती हैं, उन्हें पराया बताया जाता है और ससुराल में हर हाल में सामंजस्य बनाने की सीख दी जाती है। उन्हें बचपन से ही यह एहसास दिलाया जाता है कि रिश्तों का सारा दारोमदार उनके ही ऊपर है। समाज और लोकलाज का भय दिखा कर उन्हें शुरू से चुप रहना सिखाया जाता है। हालांकि जरूरत है कि महिलाएं दूसरों पर निर्भर न रह कर अपनी जिम्मेदारी खुद उठाएं और अपने अधिकारों, सुविधाओं के प्रति जागरूक हों। पर हकीकत यह भी है कि भारत में स्त्री सुरक्षा संबंधी कानूनों के बारे में अधिकतर महिलाओं को कोई जानकारी ही नहीं है।

पितृसत्तात्मक परिवार के अत्याचारों और जुल्मों को नियंत्रित करने के लिए घरेलू हिंसा संबंधी कानून 2005 में आया। उसमें घरेलू हिंसा के अंतर्गत क्या-क्या चीजें आती हैं इसका स्पष्ट उल्लेख किया गया है। अगर कोई व्यक्ति अपने घर में, जिसके साथ महिला उसी के घर में रहती है, उसे पीटता है, धमकी देता या उत्पीड़न करता है, तो वह महिला घरेलू हिंसा की शिकार मानी जाएगी। कानून में महिला हिंसा को इस तरह व्याख्यायित किया गया है-

लैंगिक हिंसा : बलात मैथुन, अश्लील साहित्य, तस्वीर आदि दिखाने के लिए विवश करना, दुर्व्यवहार करना, अपमानित करना, नीचा दिखाने की लैंगिक प्रवृत्ति का कोई अन्य कार्य या जो महिला की प्रतिष्ठा का उल्लंघन करता हो या कोई अन्य अस्वीकार्य लैंगिक प्रकृति का हो।

मौखिक और भावनात्मक हिंसा : अपमान, गालियां देना, स्त्री के चरित्र और आचरण आदि पर दोषारोपण। पुरुष संतान न होने के लिए अपमानित करना, दहेज आदि न लाने पर अपमानित करना, विद्यालय, महाविद्यालय या किसी अन्य शैक्षिक संस्था में जाने से रोकना, नौकरी करने से रोकना, नौकरी छोड़ने के लिए विवश करना। उसकी मर्जी के खिलाफ विवाह के लिए विवश करना, अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह करने से रोकना। आत्महत्या करने की धमकी देना। कोई अन्य मौखिक या भावनात्मक दुर्व्यवहार। आर्थिक हिंसा : महिला या उसके बच्चे के जीवन निर्वाह के लिए धन उपलब्ध न कराना। उसके बच्चों के लिए खाना, कपड़े, दवाइयां आदि उपलब्ध न कराना। उसे अपना रोजगार चलाने से रोकना। रोजगार करने में बाधा डालना। रोजगार करने की आज्ञा न देना। वेतन, पारिश्रमिक आदि ले लेना। उसको अपना ही वेतन उपभोग करने की अनुमति न देना। जिस घर में वह रह रही है उससे बाहर निकलने को विवश करना। घर के किसी भाग में जाने या उपयोग से रोकना। साधरण घरेलू उपयोग के कपड़ों, वस्तुओं के इस्तेमाल की अनुमति न देना।

अगर इनमें से किसी भी प्रकार का दुर्व्यवहार महिला के साथ हो रहा है तो उसके खिलाफ आवाज उठाना हर स्त्री का अधिकार है। घर और परिवार की जिम्मेदारियां जितनी स्त्री की हैं, उतनी ही पुरुष की भी हैं। दोनों को लैंगिक भेद से इतर मनुष्य के रूप में देखने की जरूरत है। आवश्यक है कि समाज इस गंभीर समस्या का निदान अपनी पहल से करे और स्वयं स्त्री अपने अधिकारों के प्रति सचेत होकर अपने विरुद्ध किसी भी प्रकार की हिंसा और यातना का प्रतिकार करे। अगर ऐसा न हुआ तो आधी आबादी कभी स्वतंत्र नहीं हो पाएगी और सामाजिक विकास का दावा सदा खोखला रहने को अभिशप्त होगा।

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