ताज़ा खबर
 

पुस्तकायनः पंख पसारे पंक्षी

‘पेड़ जब लंबी छलांग लेकर आकाश को ढंक लेने की कोशिश करते हैं तो आकाश का अंबर नाम सार्थक हो जाता है।

Author July 31, 2016 1:48 AM

‘पेड़ जब लंबी छलांग लेकर आकाश को ढंक लेने की कोशिश करते हैं तो आकाश का अंबर नाम सार्थक हो जाता है। कौन कहता है कि आकाश दिगंबर है? सूरज, चांद, सितारे, आकाशगंगा और फिर ये लंबे-लंबे हरे वृक्ष, कितनी-कितनी पोशाकें हैं आकाश की। जब पेड़ों के झुरमुट से आकाश झांकता है तो लगता है पेड़ ही आकाश हो गए हैं, आकाश हरा हो गया है और जब चांद पेड़ों की डालों का घूंघट उठा कर झांकता है तो ऐसा लगता है कि पेड़ किसी सुंदर स्त्री का बाना पहन अपना चंद्रमुख दिखा रहे हैं।’ ये रमेश दवे के नए उपन्यास ‘हरा आकाश’ की कुछ पंक्तियां हैं। जिन लोगों को हिंदी साहित्य और उसकी समकालीनता से शिकायत हो उनके लिए ‘हरा आकाश’ एक बेहतरीन जवाब है।
‘ग्लोबल वार्मिंग’ यानी धरती के निरंतर बढ़ रहे तापमान और अपने पर्यावरण के प्रति पूरी तरह बेपरवाह समाज को यह उपन्यास कोई ‘प्रवचन-उपदेश’ नहीं देता, बल्कि प्रकृति का पूरा का पूरा एक संसार ही रच देता है, जिसमें पाठक हाथ में किताब लेकर पढ़ने वाले पाठक के बजाय उस प्रकृति का एक जीवंत हिस्सा बन जाता है। यह सुखद ही है कि इधर हिंदी लेखक प्रकृति और पर्यावरण को लेकर इतना सजग और संवेदनशील हो गया है कि प्रकृति अब केवल कविता या गद्यगीत भर का विषय नहीं रह गई है और न शास्त्रों के निर्देशानुसार महाकाव्यों-उपन्यासों में लक्षण-पूर्ति भर के लिए। अब हिंदी लेखक के लिए पूरे उपन्यास की कथा-भूमि प्रकृति और केवल प्रकृति भी हो सकती है- ‘हरा आकाश’ इसका साक्षात प्रमाण है।

उपन्यास में तीन बहनों- मानवी, गौरवी और शांभवी की कथा है। तीनों की अपनी-अपनी रुचि है- प्रकृति, पेंटिंग और जल संरक्षण और इसके लिए वे आजन्म अविवाहित रह कर अपने-अपने मिशन के लिए समर्पित हैं। तीनों के मित्र भी हैं, वे साथ-साथ हैं और इनके मिशन में पूरी तरह इनके सहायक भी। पिता सेना से रिटायर्ड कर्नल हैं, जो इन तीनों को पूरी स्वतंत्रता देते हैं, फिर भी एक पिता होने के कारण इनका विवाह उनकी चिंता और इच्छा है। पर तीनों बहनें ‘विवाह संस्था’ के बजाय लिव इन रिलेशन में रहना चाहती हैं। पिता और बेटियों के बीच वैचारिक बहसें होती हैं। शर्तें तय होती हैं, पर उपन्यासकार इस हद तक तटस्थ है कि वह उपन्यास को इस बहस और उस पर बहनों के निर्णय को पाठकों के ऊपर छोड़ देता है- ‘अब तीनों बहनें नर्सरी में गर्इं, साथ दोस्त भी हैं। वहां हरी धरती और हरे आकाश के नीचे उन्होंने हाथ जोड़ कर कहा, हम निर्णय और अनिर्णय के बीच खड़े हैं। पाठक ही बताएं।’

स्पष्ट है कि यह पशोपेश या अनिर्णय की स्थिति तीनों बहनों की नहीं, उपन्यासकार की है। सच यह है कि लेखक इस बहस में स्वयं पड़ना ही नहीं चाहता। यह बहस उपन्यास का केंद्रीय प्रश्न है भी नहीं। रमेश दवे के मन में प्रकृति को लेकर कथात्मक कृति के सृजन की थी, सो वे उसी पर केंद्रित रहे हैं। हालांकि उन्होंने सृष्टि में प्रकृति और पुरुष के साहचर्य की बात की है और इन दोनों का साथ होना-रहना आवश्यक है- उसके लिए किसी बंधन की अनिवार्यता नहीं- स्वत: स्वाभाविक सह-अस्तित्व और एक-दूसरे के लिए होना- पर किसी कानूनी विवशता से नहीं- एकदम स्वाभाविक, एकदम नैसर्गिक, पूरी तरह प्राकृतिक। प्रकृति और पुरुष के इस साहचर्य में उपन्यासकार प्रकृति के साथ है, इसलिए प्रकृति रूपी स्त्री यहां नायक’ है, केंद्र में है और पूर्णरूप से स्वतंत्रचेता।

उपन्यास में अगर शिदीष, योगेश और अक्षय तीनों बहनों मानवी, गौरवी और शांभवी का अनुसारण करते दिखाई देते हैं तो यह एक प्रकार से प्रकृति के पीछे, उसके अनुरूप, उसके अनुकूल पुरुष (मनुष्य) के चलने की प्रतीकात्मकता भी है। लेखक सृष्टि की इस प्रक्रिया में सीधे-सीधे खुद आ जाता है- ‘अब तो लेखक को भी कुछ कहना ही पड़ेगा। प्रकृति ने मनुष्य ही बनाया है, न साधु, संत, महापुरुष बना कर भेजा है और न दार्शनिक विचारक। सब कुछ मनुष्य अपने मन और प्रयत्न से, अपनी रुचि और इच्छाओं से चुनता और बनता है। स्त्री-पुरुष इसलिए हैं कि वे सृष्टि की निरंतरता के लिए हैं। जब पेड़-पौधे पैदा कर देते हैं, तो मनुष्य को क्या तकलीफ है मनुष्य पैदा करने में।’ ये शब्द उपन्यास में किसी पात्र के मुंह से नहीं कहलाए गए हैं, बल्कि खुद लेखक कोष्ठक में कहता है। यह स्थिति इसीलिए आई है कि न मानवी किसी निर्णय पर पहुंचती है, न शिरीष- यह अनिर्णय भी यों ही नहीं है, क्योंकि जिस समय हम मूल्यों, संस्थाओं के अंत होने की घोषणाओं के संक्रमण काल में हैं उसमें यह अनिर्णय की स्थिति भी बहुत स्वाभाविक है।

रमेश दवे ने इस उपन्यास को लिखने से पूर्व कितना शोध किया और वनस्पतिशास्त्र की कितनी जानकारियां एकत्र की हैं, उपन्यास पढ़ कर एकदम स्पष्ट हो जाता है। सच तो यह है कि कहीं-कहीं यह उपन्यास से अधिक वनस्पति-शास्त्र की पाठ्य-पुस्तक लगने लगता है। एक-एक पौधे की सूक्ष्म जानकारी- कैसी मिट्टी चाहिए, कितना पानी चाहिए, कौन-सा मौसम उपयुक्त है- यह सब कुछ इस उपन्यास में बड़ी तफ्सील से है। यह ठीक है कि इन सूचनाओं के कारण कथा में कहीं-कहीं गतिरोध आया है, मगर फिर भी लेखक ने कहीं भी कथा-तंतु को टूटने नहीं दिया है। दरअसल, लेखक के लिए महत्त्वपूर्ण कथा और कथा-रस नहीं है, कथा तो विशुद्ध रूप से अपने चारों तरफ बिखरे पड़े प्राकृतिक सौंदर्य को शब्दों में समेट लेने और उपन्यास के फार्म में एक ‘लैंडस्केप’ रच देने के उपक्रम में है, जिसमें लेखक सफल भी हुआ है।
एक समाज के रूप में प्रकृति के प्रति हमारी लापरवाही कुछ कम हो, इस कोशिश में बहुत से पर्यावरणविद और समाजसेवी संस्थाएं लगी हुई हैं, पर ‘उपदेश’ का ‘कांतासम्मित’ हो जाना ही साहित्य है, कला है- ‘हरा आकाश’ ऐसी ही एक ‘कांतासम्मित’ कृति के रूप में हमारे समक्ष है।
कृष्णा शर्मा

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App