ताज़ा खबर
 

अवसर : शेक्सपियर की प्रासंगिकता

टाल्सटॉय ने विलियम शेक्सपियर के रचना संसार में नैतिक व्यवस्था के अभाव की बात की, तो टीएस एलियट ने वस्तुनिष्ठ सह-संबंधकों (‘आॅब्जेक्टिव कोरिलेटिव’) की विफलता की।

William Shakespeare,William Shakespeare Poems, William Shakespeare Plays, William Shakespeare Biography, William Shakespeare News, William Shakespeare latest news23 अप्रैल, 2016 को विलियम शेक्सपियर की मृत्यु के चार सौ साल पूरे हो गए।

विलियम शेक्सपियर की मृत्यु को 23 अप्रैल, 2016 को चार सौ साल पूरे हो गए। आलोचना के तमाम उतार-चढ़ावों के बीच शेक्सपियर के साहित्यिक ‘उत्तर जीवन’ ने विश्व साहित्य के विद्वानों को उनसे प्रेम और कभी-कभी नापसंद करने को भी मजबूर किया है। पर गंभीर आलोचना कर्म उनके प्रति उदासीन नहीं रह सका है। क्लियोपेट्रा के बारे में लिखे उनके शब्द- ‘समय उसे कुम्हला नहीं सकता और रिवाज उसे बासी नहीं बना सकते’ शेक्सपियर के बारे में भी पूरी तरह लागू होते हैं।

पिछले चार सौ सालों में शेक्सपियर की उपस्थिति को दो शब्दों में मापा जा सकता है: ‘बार्डोलेटरी’ (कवि यशगान) या ‘बार्डिसाइड’ (कवि-हत्या)। उन्हें अपने समकालीनों से प्रताड़ना झेलनी पड़ी। जॉन ग्रीन ने उन्हें ‘दूसरों के पंखों से सुशोभित नवोदित ‘कौआ’, ‘जैक ऑफ ऑल ट्रेड्स’ और ‘परदा गिराने-उठाने वाला’ (‘शेक सीन’) कहा। उसी युग में उनके विद्वान मित्र और नाटककार बेन जॉनसन ने श्रद्धांजलि देते हुए उन्हें ‘युग की आत्मा और रंगमंच का आश्चर्य’ कहा। साथ ही अपनी प्रशंसा को संतुलित करते हुए कल्पना के असंयम और कला अभाव के लिए उनकी आलोचना से भी नहीं चूके। समकालीन साथियों हेमिंज और कोंडेल ने उनकी नाट्य-प्रतिभा को पहचाना और उनकी मृत्यु के बाद थियेटरों में जाकर पात्रों के संवादों को लिख कर 1623 में उनका संस्करण तैयार किया।

सत्रहवीं सदी के उत्तरार्ध में अंगरेजी आलोचना के प्रवर्तक जॉन ड्रायडन ने शेक्सपियर और बेन जॉनसन की तुलना करते हुए शेक्सपियर को घना ‘जंगल’ तो जॉनसन को कटा-छंटा-तराशा बगीचा कहा और जोड़ा कि वे जॉनसन का सम्मान करते हैं, पर प्रेम शेक्सपियर से। यह वह समय था जब नवक्लासिकी नियमों से साहित्य और लेखक की परख होती थी, जिनका शेक्सपियर ने पालन नहीं किया था। ड्रायडन खुद संप्रदाय के अगुआ थे, पर शेक्सपियर की प्रतिभा के कायल।

नवक्लासिकी सिद्धांतों के अनुसार नाटक को या तो शुद्ध ट्रेजेडी या कॉमेडी होना चाहिए, मिश्रण नहीं। पर शेक्सपियर के नाटकों में दुख और सुख का मिश्रण है। जॉनसन ने उनकी आलोचना के बजाय इस नियमभंग के लिए तारीफ की, क्योंकि जीवन भी सुख और दुख का मिश्रण होता है। शेक्सपियर की निस्बत जीवन के यथार्थ और सामान्य मानव प्रकृति से थी, न कि आलोचना के कृत्रिम नियमों से। जॉन कीट्स ने जीवन की कठिन दशाओं से जीने की चाह और राह बनाने का माद्दा देने के लिए उनकी कविता को सराहा, तो थॉमस कार्लाइल ने उन्हें ‘अंगरेजी प्रजा का बेताज सम्राट’ कहा। उनका मानना था कि भारत का साम्राज्य किसी न किसी दिन चला जाएगा, पर शेक्सपियर की धरोहर अक्षुण्ण रहेगी।

उनके यशगान के विपरीत आलोचना भी हुई। टाल्सटॉय ने उनके रचना संसार में नैतिक व्यवस्था के अभाव की बात की, तो टीएस एलियट ने वस्तुनिष्ठ सह-संबंधकों (‘आॅब्जेक्टिव कोरिलेटिव’) की विफलता की। जीबी शॉ ने अंगरेजी में शेक्सपियर के यशगान (बार्डोलेटरी) की प्रवृत्ति को नकारा, पर उनकी कविता की श्रेष्ठता को बेजोड़ बताया। उत्तर-आधुनिक आलोचक हेरल्ड ब्लूम ने बीसवीं सदी यूरोप के श्रेष्ठतम मस्तिष्कों में एक माने गए सिग्मंड फ्रायड को ‘गद्यकृत शेक्सपियर’ कह कर शेक्सपियर के विचार-विश्व को श्रद्धांजलि दी।

शेक्सपियर नियमों के गुलाम नहीं थे। व्याकरण के नियमों की उन्हें बहुत चिंता न थी। हैमलेट की स्वोक्ति का शुरुआती वाक्य ‘टू बी ऑर नॉट टू बी…’ गलत अंगरेजी का उदहारण है, क्योंकि व्याकरण के हिसाब से यह सकर्मक क्रिया है, पर शेक्सपियर ने उसे छोड़ दिया है। यह उम्दा पंचलाइन है, पर खराब अंगरेजी। इतिहास की भी उन्होंने परवाह नहीं की। कालभ्रम और इतिहास-अशुद्धता उनके नाटकों में भरपूर मिलती है। सृजनशीलता के अलावा शेक्सपियर की अपील का कारण यह है कि उनका साहित्य मनुष्य, उसकी प्रकृति, ब्रह्मांड, ब्रह्मांड में मनुष्य की स्थिति और नियति को समझने में मदद करता है।

अगर ‘पूरी दुनिया रंगमंच है’, तो जीवन भंगुर है और हम मनुष्य ऐसे भंगुर तत्त्वों से बने हैं जैसे कि स्वप्न। जीवन दुष्कर है और जीना दूभर। तो जिया कैसे जाए? हमारे नियंत्रण में कुछ भी नहीं, न तो संबंध और न ही व्यवहार या प्रतिभा। ऐसे में ‘किंग लीयर’ में व्यक्त उनका मंत्र है ‘परिपक्वता ही सब कुछ है।’ (‘राइपनेस इज ऑल’) जीवन में जो कुछ जैसा है उसे वैसा ही स्वीकार करने की योग्यता। यह मंत्र ‘हैमलेट’ में ‘तैयारी ही सब कुछ है।’ (‘रेडीनेस इज आल’) के रूप में प्रकट होता है। होनी टाली नहीं जा सकती। इसलिए आदमी के हाथ में एक ही ढाल है- तैयारी। जो कुछ हो रहा है या होने वाला है उसके लिए तैयार रहना और कर्म करना।

शेक्सपियर का रचना-जगत दिखाता है कि ‘परिपक्वता’ और ‘तैयारी’ के मंत्रों के साथ जीवन का एक और सत्य है- मौन। शाश्वत मौन। अपने अंतिम क्षणों में हैमलेट इस ब्रह्म-सत्य को वाणी देता है-‘बाकी सब मौन है’ (रेस्ट इस साइलेंस)। मौन या मौत ही अंतिम सत्य है। जीवन की झंझटों के बीच ‘अपरिपक्वता’ दुख से मुक्ति के बजाय डुबाने का सबब बनती है और व्यक्ति की अंतर्निहित संभावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं हो पाती। ट्रेजेडी भौतिक मौत नहीं है, बल्कि यह मानवीय संभावनाओं की अप्राप्ति या उनका नकार है। मौत तो अपने नित नए निमित्त ढूंढ़ कर चाहे राजा हो या रंक, गुणी हो या निगुर्णी, नायकों और खलनायकों… सभी को मौन कर देती है। हैमलेट या लीयर इसे समझते हैं, पर देर से। जॉन कीट्स ने इसे ‘नेगेटिव कैपेबिलिटी’ (नकारात्मक योग्यता) का नाम दिया था। यह नकारात्मक न होकर सकारात्मक अवधारणा है, जिसका अर्थ है न जिए जाने लायक जगत में जीने की योग्यता पैदा करना।

ज्ञान या उपदेश देना ही सब कुछ नहीं है। ज्ञान का अनुप्रयोग और व्यवहार समझ और जीवन दोनों को निखारता है। लीयर और कॉर्डिलिया की परिपक्वता और तैयारी की दृष्टि से जीवन जिया जा सकता है। अकर्मण्यता, उदासीनता, दुख में संतुलन रखना या विलाप करना, सही या गलत का चुनाव मानवीय विशेषाधिकार है। पर उसके परिणाम के लिए उसे तैयार रहना है। शेक्सपियर के पात्र अपने कर्मों के परिणाम हैं और उन्हीं से मनुष्य अपने भाग्य का लेखक बनता है। ग्रीक नाटकों में मनुष्य का भाग्य उसका चरित्र था, पर शेक्सपियर में चरित्र या कर्म ही भाग्य है। यह कर्म-केंद्रीयता अंगरेजी नाट्य-साहित्य में उनका योगदान है।

शेक्सपियर के उत्साही प्रशंसक उन्हें दार्शनिक बनाने की फिराक में रहते हैं। सच में वे चिंतक थे, दार्शनिक नहीं। उन्होंने शब्दों और पात्रों के माध्यम से मनुष्य, दुनिया और दुनियादारी के बारे में सोचा। वे निराशावादी लगते हैं, क्योंकि वे यथार्थवादी थे। कोई भी यथार्थवादी आशावादी नहीं हो सकता। हां, जीवन के रोमांस और उत्सव से भी उन्होंने नजर नहीं चुराई, पर वे जीवन के झंझावातों से चुराए पल हैं- जीवन का नित्य धर्म नहीं। यह यथार्थपरक समझ जीवन का मूल और मूल्य दोनों है।

अब सवाल है कि क्या शेक्सपियर अगले चार सौ साल तक रहेंगे? एक वर्ग का मानना है कि उनकी भाषा पुरानी पड़ चुकी है और बदले यथार्थों और नवसाहित्यों ने उनकी प्रासंगिकता के सामने सवाल खड़े कर दिए हैं। दूसरे वर्ग का विश्वास है कि वे विश्व साहित्य में जिंदा रहेंगे, पर लिखित रूप में नहीं, बल्कि दृश्य, डिजिटल, वर्चुअल, किंडल या इमोजी शेक्सपियर के रूप में। साहित्य के विभागों के बजाय प्रबंधन, विधि, संप्रेषण और फिल्म अध्ययन में उन्हें ज्यादा पढ़ा-परखा जाएगा। उनके कथानक, विषय-वस्तु और कविता हर युग के पसंदीदा माध्यमों, जैसे कि आज की फिल्म, को लुभाएंगे। भविष्य की रचनाशीलता प्रेरणा के लिए इस विश्व-मानव को नजरंदाज कर पाएगी, ऐसा मुश्किल लगता है।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 पुस्तकायन : जाति का घुन
2 दूसरी नज़र : कश्मीर अपना, कश्मीरी पराए
3 बाख़बर : बीच बहस में समाजवादी दौरा
ये पढ़ा क्या?
X