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सुधीश पचौरी का कॉलम बाख़बर : केजरी को गुस्सा क्यों आता है

केजरी ने सीबीआइ छापे का असली मर्म बताया कि जिन केसों की फाइलें ये ढूढ़ने आए थे वे तो पुराने महकमों के दफ्तरों में होंगी। मेरे यहां नहीं। वे दरअसल, डीडीसीए की वह फाइल देखने और लेने आए

Author नई दिल्ली | December 20, 2015 08:29 am
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल। (File Photo)

झुग्गियां गिरेंगी। आठ घंटे बाद नेता जागेंगे। वे बारी-बारी से इलाका विजिट करेंगे। उनके संग उनकी भीड़ें होंगी। कैमरे उनके साथ दौड़ते नजर आएंगे। उनकी नजरें गिरी झुग्गियों की जगह उचाट गिरेंगी। कट। एक उजड़ा आदमी अपनी मरी बच्ची को गोद में उठाए होगा। दया न उमड़े, इसका खयाल कैमरे रखेंगे। वे बयान-दर-बयान एक-दूसरे को काटते बयान दिखाएंगे। बच्ची के लिए कोई नहीं रोएगा। कट करके कैमरे स्टूडियो में लौट आएंगे। वहां झुग्गियों को गिराने की जरूरत और पुनर्वास न कर पाने को लेकर दस चेहरे एक-दूसरे को नीचा दिखाते मिलेंगे।

सीबीआइ छापा मारेगी। जिस गेट से घुसी, कैमरे उसको दिखाएंगे। ब्रेकिंग न्यूज होगी। वे किस कमरे में गए, देर तक क्या-क्या किया, कौन-कौन-सी फाइलें देखीं? कौन-सी लीं, कब कमरे सील बंद किए, सीएम के कमरे में घुसे कि नहीं घुसे? सचिवालय के तीसरे तल में प्रवेश निषिद्ध किया कि नहीं? इस बाबत कैमरे दो दिन चुप रहेंगे। अंदर के फुटेज कहां गए? सीसीटीवी थे कि नहीं? क्या कैमरे बंद कर दिए गए या मना कर दिए गए?

छापे कांड का कोई कवरेज नहीं और बहस खड़ी रही तीन दिन कि क्या-क्या ले गए? अब तक कोई प्रमाण नहीं।
बड़ी खबर तो सीबीआइ का अ-सूचित छापा था, लेकिन केजरी ने डीडीसीए की फाइल को अरुण जेटली के नाम से जोड़ कर एक्सपोजर की इस लड़ाई का रुख ही मोड़ दिया।

एक अंगरेजी चैनल ने केजरी के चीफ सेक्रेटरी राजेंद्र कुमार द्वारा निकाले गए अब तक के टेंडरों के नीचे लिख-लिख कर बताया कि टेंडर तो किया, लेकिन ‘फेवर्ड एंडीवर’! (एंडीवर कंपनी का नाम रहा)

उधर केजरी ने सीबीआइ छापे का असली मर्म बताया कि जिन केसों की फाइलें ये ढूढ़ने आए थे वे तो पुराने महकमों के दफ्तरों में होंगी। मेरे यहां नहीं। वे दरअसल, डीडीसीए की वह फाइल देखने और लेने आए, जिसमें जांच रिपोर्ट पर हम कार्रवाई करने जा रहे थे। राजेंद्र बहाना है। केजरी निशाना है। सीबीआइ डीडीसीए वाली फाइल ढूंढ़ने आई थी, जिसकी जांच रपट आ चुकी है। सीबीआइ ने मेरे कमरे में बैठ कर फाइल देखी है। वे फाइलें ले गए हैं… आखिर में वे बेहद क्रोध से बोले कि मोदीजी मैं किस मिट्टी का बना हूं, आप जानते नहीं हैं। उनका उठा हुआ बायां हाथ चुनौती देता दिखा। केजरीवाल इतने गुस्से में कभी नहीं दिखे!

टाइम्स नाउ की नाविका कुमार बहस बरा रही थीं कि बीच में कट करके वे केजरीवाल के मीडिया संबोधन को लाइव दिखाने लगीं। यह सब इस कदर अचानक था कि उनको यह कहने तक की फुरसत न हुई कि हम केजरीवाल को कवर करने चलते हैं। केजरीवाल के लाइव कवरेज के बाद बहस फिर मुकर्रर हुई। चैनल ने अरुण जेटली पर केजरी के आरोपों का अरुण द्वारा खंडन दिखाया कि सब ‘रबिश’ है और इतनी ‘रबिश’ कि खंडनीय तक नहीं!

भिडंतों के लिए रह गए केजरीवाल के तीन-चार शब्द: साइकोपैथ, मानसिक रोगी, कायर और डीडीसीए की फाइल!
एक सीएम को एक पीएम के लिए ऐसे शब्द नहीं बोलने चाहिए थे। वे शब्द अशोभन और निंदनीय हैं। ऐसा भाव हर चर्चाकार ने प्रकट किया। भाजपा के प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने इन शब्दों के लिए केजरी को कंडेम किया। इसके आगे आरोपों-प्रत्यारोपों की कबड््डी शुरू हुई। पहले चक्र में कांग्रेस ने केजरी को लपेटा। अगली शाम तक दोनों का यूनाइटेड फ्रंट बन चुका था।

एक अंगरेजी चैनल की बहस में एक बड़े वकील आर्यमान सुंदरम ने कहा कि सीबीआइ की गाइडलाइनों के अनुसार सीएम को छापे मारने के लिए पूर्व अवगत कराना जरूरी था, जो नहीं किया गया लगता। ऐसे में केजरी की आपत्तियों को वैधता मिलती है, हालांकि उनको कटु शब्द नहीं कहने चाहिए थे। वकील की इस लाइन पर किसी एंकर ने बहस नहीं बढ़ाई।

जो मजा आरोप-प्रत्यारोप में है वह कानूनी बारीकियों में कहां?

एक अंगरेजी चैनल ने उक्त अशोभन शब्दों को लेकर अखिल भारतीय प्ररिक्रमा ही कर डाली, एक दर्जन ‘नागिरकों’ से आन लाइन प्रतिक्रिया सुनवाई कि ये शब्द एकदम गैर-संसदीय और अशोभन हैं और कंडेमनीय हैं! इसके बाद की बहसों में निरा गुस्सा था।

कराने को तो एनडीटीवी की निधि राजदान ने भी केजरी उवाच और छापे पर बातचीत कराई, लेकिन जो मजा टाइम्स नाउ में रहा वह अन्यत्र संभव नहीं, क्योंकि अर्णव का डबल भी नहीं हो सकता और वे अकेले दस के बराबर होते हैं। यह बात ‘आप’ के आशीष खेतान से उनकी बहस में दिखी। अर्णव ने रोज की तरह अपनी कुर्सी पर बेचैनी दिखाते हुए पहले तीन-चार मिनट सीबीआइ के छापे के प्रसंग में केजरीवाल की भ्रष्टाचार विरोधी दावों पर सवाल उठाते हुए पहला गोला आप पार्टी के आशीष खेतान की ओर दागा कि यह बताइए कि डीडीसीए वाली फाइल का नंबर क्या है?

जवाब में ज्यों ही आशीष ने बोलना शुरू किया, त्यों ही अर्णव ने अपनी शैली में टोका कि आशीषजी मैं नंबर पूछ रहा हूं। नंबर बताइए? आशीष फिर अपनी बात शुरू करते कि अर्णव टोक देते कि नंबर बताइए। इस टोका-टोकी पर आशीष उखड़ गए जब अर्णव ने कहा कि सातवीं बार पूछ रहा हूं फाइल का नंबर, तो आशीष ने आजिज आकर कहा कि मैं भी सातवीं बार जवाब दे रहा हूं और आप हैं कि टोकते जा रहे हैं। उसके बाद आशीष ने जो कहा वह प्रत्यारोप से कम न था कि अर्णवजी आप शुरू से वित्तमंत्री की साइड ले रहे हैं, क्योंकि वे किसी भी मीडिया हाउस की तकदीर बदल सकते हैं। आज जब वे कठघरे में हैं तो आप मुझे बोलने नहीं दे रहे! … आप जेटली के खिलाफ आरोप सुनना ही नहीं चाहते… और टीएसआर सुब्रमण्यम की टिप्पणी पर तो आशीष एकदम बरस पड़े कि श्री सुब्रह्मण्यम तो एक सरकारी कमेटी में हैं, वे तो बोलेंगे ही ऐसा। यह सुन कर सुब्रमण्यम भी रक्षात्मक हो गए और बोलने लगे कि मैं एक अन्य चैनल पर दिल्ली में डीजल गाडियों को बंद करने की बात पर खिलाफ बोल कर आया हूं…

इसके बाद दिल्ली में डीजल और लग्जरी गाड़ियों के सेल पर बैन पर बहसों को कौन सुनना चाहता? हां इस मुद्दे पर सुनीता नारायणजी एक चैनल पर कहती देखी गर्इं कि यह उनके लिए समारोह मनाने का दिन है। पंद्रह साल की लड़ाई के बाद यह देखना नसीब हुआ है कि डीजल गाड़ियों के खिलाफ कुछ आया है। डीजल गाड़ियां चला कर पैसा कमाने वालों के दर्द को किसी चैनल ने महसूस नहीं किया। हां एक चैनल पर एक टैक्सी वाला जरूर बोलता दिखा कि चार साल से इस गाड़ी की किश्तें दे रहा हूं। अब नई लूं तो कहां से लूं? हमारा क्या होगा?

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