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वक्त की नब्जः उनकी पीर सुनेगा कौन!

बच्चियों की तिजारत रोकने में पुलिस इसलिए आज भी नाकाम है, क्योंकि उनको कोठों से बचाने के बाद कोई जगह नहीं मिलती है, जहां उनको सहारा मिले। पुलिसवाले खुद मानते हैं कि सरकारी शरणगृहों में उनका इतना शोषण होता है कि अक्सर वहां से भाग कर वापस कोठों पर चली जाती हैं।

Author October 21, 2018 4:10 AM
मीटू अभियान का समर्थन मेनका गांधी बहुत बार खुल कर कर चुकी हैं, लेकिन उनका असली समर्थन तब दिखेगा जब महिला कल्याण मंत्री होने के नाते वे उन बेटियों का समर्थन करेंगी, जो इस देश की सबसे बेजुबान, बेबस बच्चियां हैं।

चालीस साल से ज्यादा हो गए हैं मुझे पत्रकारिता में। बहुत-सी ऐसी चीजें देखी हैं इस लंबे दौर में मैंने, जिन्होंने दिल दुखाया है, रूह को सताया है, लेकिन एक ही कहानी है, जो एक बुरे सपने की तरह मेरे साथ हमेशा रहती है। यह है उन बच्चियों की कहानी, जिनको मुंबई के चकलों में बेच दिया जाता और जिनसे मैं मिली सिर्फ एक बार, जब मुंबई पुलिस ने इस शर्मनाक तिजारत को रोकने के लिए एक आंदोलन छेड़ा था कोई चौदह वर्ष पहले। इन बच्चियों की कहानी मैं आपको आज सुना रही हूं मीटू आंदोलन चलाने वालों को याद दिलाने के लिए कि औरतों का असली शोषण क्या होता है।

हुआ यह कि मैं एनडीटीवी के लिए इंडियानामा कार्यक्रम किया करती थी और मुंबई के पुलिस आयुक्त अनामी राय ने उसको देखा और मुझे सुझाव दिया कि उनका आंदोलन इस प्रोग्राम के लिए ठीक रहेगा। कोठों से इन बच्चियों को छुड़ाना बहुत मुश्किल है और पुलिस अपनी इस नेक मुहिम का प्रचार करना चाहती थी, सो मैं एनडीटीवी के बेहतरीन कैमरामैन अजमल जामि के साथ पुलिस मुख्यालय पहुंची सुबह-सवेरे, जहां बगीचे में कुछ नाबालिग लड़कियां चुपचाप खड़ी थीं, इयन डाउलिंग नाम के एक आदमी के साथ, जिसके शरणगृह में इनको कोठों से बचाने के बाद पनाह दी गई थी। इन बच्चियों में थी रूबीना नाम की एक चौदह साल की लड़की, जिसका रंग संदली था, आंखें बड़ी-बड़ी और जिसके घने बाल भूरे थे। रूबीना ने मुझे बताया कि वह हमारे साथ चलने वाली है इस छापेमारी पर, क्योंकि पहले वाला कोठा वही है, जहां इसको दो साल कैद करके रखा गया था।

रूबीना ने कहा, ‘मैं निजामुद्दीन औलिया की दरगाह के पास पटरी पर रहती थी अपनी अम्मा और बाबा के साथ। एक दिन जब मैं खेल रही थी, एक गाड़ी आई और मुझे उस गाड़ी में घसीट लिया गया और मैं बेहोश कर दी गई। जब उठी तो मैंने अपने आपको उस कोठे में पाया। मुझे रोज कोई दस बंदों के साथ गलत काम करने पर मजबूर किया गया और अगर मैं मना करती, तो मुझे बहुत मारते थे और काली कोठरी में भूखा रखते थे कई दिन। आज मैं जा रही हूं उस पर्चे को ढूंढ़ने, जिस पर मैंने एक टेलीफोन नंबर लिखा हुआ है उन पड़ोसियां का, जो मेरे मां-बाप के दोस्त हैं।’सो, रूबीना हमारे साथ गई मुंबई की एक बेहाल, गंदी इमारत में, जिसकी पहली मंजिल पर था एक नीला दरवाजा, जिसको पुलिसवालों ने जबर्दस्ती खुलवाया। अंदर गए तो देखा एक कमरा, जिसको पांच-छह खोखों में बांटा गया था। इनमें से एक रूबीना का था, लेकिन जब उसने अपना मेकअप बॉक्स खोला, तो वह पर्ची नहीं मिली। उसकी आंखों में आंसू देख कर इयन डाउलिंग ने मुझे चुपके से कहा, ‘अच्छा ही हुआ, क्योंकि यह जानती नहीं है कि इसको एचआईवी हो गया है। अगर घर चली भी जाती तो वहां इसके इलाज का पैसा नहीं दे पाते उसके परिवार वाले।’

अगले दिन जामि और मैं इयन डाउलिंग के नवी मुंबई स्थित शरणगृह देखने गए, जहां इतनी सारी दर्दनाक कहानियां सुनी मैंने बबिता, लावण्या और शमा नाम की बच्चियों से कि उनको बयान करना मुश्किल है। इन बच्चियों को किसी ने अगवा करके कोठों पर नहीं बेचा था, उनको अपने रिश्तेदारों ने दलालों को बेचा। उनको मुंबई में काम दिलाने का लालच देकर कोठों पर बेच दिया गया। उस समय एक बच्ची का दाम था पचास हजार रुपए। कुछ लड़कियां नौकरानी बनाई गर्इं अमीरों के घरों में। सुनिए, शमा की कहानी उसके शब्दों में, ‘हम तीन बहनें थीं और हमारी मां के मरने के बाद हमको मुंबई में अलग-अलग घरों में भेज दिया गया। मैं दस साल की थी और मेरी बहनें मुझसे छोटी थीं। मैं जहां भेजी गई वहां मुझे दिन रात नंगा रख कर काम करवाते थे। सजा देते थे जबर्दस्ती पेशाब पिला कर। रोज लोहे के सरिए से मारते थे और जब मेरे सिर पर एक बार मालकिन ने बहुत ज्यादा मारा और मैं बेहोश हो गई, तो मुझे सड़क पर फेंक दिया और जब होश आया, तो मैं एक कोठे पर थी।’

इन बच्चियों की कहानियां इसलिए सुना रही हूं, क्योंकि अब जो मीटू अभियान इतना तूल पकड़ चुका है कि एक मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा है, तो उम्मीद करती हूं कि इनकी आवाज वे औरतें उठाएंगी, जिन्होंने मीटू अभियान चलाया है। बच्चियों की तिजारत रोकने में पुलिस इसलिए आज भी नाकाम है, क्योंकि उनको कोठों से बचाने के बाद कोई जगह नहीं मिलती है, जहां उनको सहारा मिले। पुलिसवाले खुद मानते हैं कि सरकारी शरणगृहों में उनका इतना शोषण होता है कि अक्सर वहां से भाग कर वापस कोठों पर चली जाती हैं।

सो, जरूरत है हजारों निजी शरणगृहों की, जिनको इयन डाउलिंग जैसे नेक इंसान चलाते हों। लेकिन इनको चलाने में लगता है बहुत पैसा, सो मुंबई में जो बच्चियों की तिजारत का केंद्र माना जाता है, बहुत थोड़े निजी शरणगृह हैं, जिन्हें अच्छे एनजीओ चलाते हैं। इयन डाउलिंग का भी शायद अब तक बंद हो गया होगा, क्योंकि उस समय भी बंद होने वाला था, क्योंकि साठ बच्चियों का खर्च वे बहुत मुश्किल से उठा रहा था। मीटू अभियान का समर्थन मेनका गांधी बहुत बार खुल कर कर चुकी हैं, लेकिन उनका असली समर्थन तब दिखेगा जब महिला कल्याण मंत्री होने के नाते वे उन बेटियों का समर्थन करेंगी, जो इस देश की सबसे बेजुबान, बेबस बच्चियां हैं। सरकारी शरणगृह न सही, लेकिन सरकारी मदद से क्यों नहीं खुल सकते हैं निजी शरणगृह बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान के तहत? जरूरतमंद हैं इस देश की वे बेटियां, जो वास्तव में बिलकुल बेजुबान हैं।

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