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लगातार बजती खतरे की घंटी

विश्व स्वास्थ्य संगठन की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक भारत में तेजी से बढ़ते प्रदूषित शहरों की संख्या चिंता का बड़ा कारण है। वायु प्रदूषण के मामले में भारत के चौदह शहरों की स्थिति बेहद खराब है।

Author May 6, 2018 01:04 am
दिन ब दिन बढ़ता प्रदूषण

आशीष वशिष्ठ

विश्व स्वास्थ्य संगठन की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक भारत में तेजी से बढ़ते प्रदूषित शहरों की संख्या चिंता का बड़ा कारण है। वायु प्रदूषण के मामले में भारत के चौदह शहरों की स्थिति बेहद खराब है। इस सूची में उत्तर प्रदेश का कानपुर पहले स्थान पर है। उसके बाद फरीदाबाद, वाराणसी, गया, पटना, दिल्ली, लखनऊ, आगरा, मुजफ्फरपुर, श्रीनगर, गुरुग्राम, जयपुर, पटियाला और जोधपुर शामिल हैं। पंद्रहवें स्थान पर कुवैत का अली सुबह अल-सलेम शहर है। वर्ष 2010 की विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में प्रदूषित शहरों में भारत की राजधानी सबसे उच्च स्थान पर थी, लेकिन उसी के साथ दूसरे और तीसरे स्थान पर पाकिस्तान के पेशावर और रावलपिंडी शहर भी थे। लेकिन ताजा आंकड़ों के अनुसार पाकिस्तान ने अपनी स्थिति में सुधार किया है। ‘स्टेट आॅफ ग्लोबल एयर रिपोर्ट’ के मुताबिक पूरी दुनिया में तीन में से एक व्यक्ति घर के भीतर और बाहर असुरक्षित हवा में सांस ले रहा है।

जनवरी में जारी एक रिपोर्ट में ग्रीनपीस संस्था ने कहा था कि भारत के 4.70 करोड़ बच्चे ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं, जहां हवा में पीएम-10 का स्तर मानक से अधिक है। इसमें अधिकतर बच्चे उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, महाराष्ट्र और दिल्ली के हैं। इनमें 1.70 करोड़ वे बच्चे हैं जो कि मानक से दोगुने पीएम-10 स्तर वाले क्षेत्र में निवास करते हैं। वहीं उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, महाराष्ट्र और दिल्ली राज्यों में लगभग 1.29 करोड़ पांच साल से कम उम्र के बच्चे प्रदूषित हवा की चपेट में हैं। हवा जहरीली और प्रदूषित होने का मतलब है वायु में पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) के स्तर में वृद्धि होना। हवा में पीएम-2.5 की मात्रा साठ और पीएम-10 की मात्रा सौ तक सुरक्षित माना जाता है। लेकिन इससे ज्यादा हो तो वह बेहद नुकसानदायक है।
ग्रीनपीस इंडिया ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट ‘एयरपोक्लिपस’ में दो सौ अस्सी शहरों का विश्लेषण किया था।

इनमें देश की करीब तिरपन फीसद जनसंख्या रहती है। बाकी सैंतालीस फीसद आबादी ऐसे क्षेत्र में रहती है, जहां की वायु गुणवत्ता के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि इन तिरसठ करोड़ में से पचपन करोड़ लोग ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जहां पीएम-10 का स्तर राष्ट्रीय मानक से कहीं अधिक है। वास्तव में भारत में कुल जनसंख्या के सिर्फ सोलह प्रतिशत लोगों को वायु गुणवत्ता का वास्तविक आंकड़ा उपलब्ध है। यह दिखाता है कि हम वायु प्रदूषण जैसे राष्ट्रीय स्वास्थ्य संकट से निपटने को लेकर कितने असंवेदनशील हैं। रिपोर्ट के मुताबिक भारत के कई शहर विश्व स्वास्थ्य संगठन के वायु गुणवत्ता मानक (बीस माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर औसत) को पूरा नहीं करते। इतना ही नहीं, अस्सी प्रतिशत भारतीय शहर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा जारी राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानक (साठ माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर औसत) को भी पूरा नहीं करते।

मेडिकल जर्नल ‘द लांसेट’ के अनुसार, हर साल वायु प्रदूषण के कारण दस लाख से ज्यादा भारतीय मारे जाते हैं। दुनिया भर में समय से पहले होने वाली मौतों के क्रम में यह चौथा सबसे बड़ा खतरा बन कर सामने आया है। अड़तालीस प्रमुख वैज्ञानिकों ने यह अध्ययन जारी किया और पाया कि पीएम 2.5 के स्तर या सूक्ष्म कण पदार्थ (फाइन पार्टिक्युलेट मैटर) के संदर्भ में पटना और दिल्ली दुनिया के सबसे प्रदूषित शहर हैं। ये कण दिल को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं। एक आकलन के मुताबिक वायु प्रदूषण के चलते हर दिन दुनिया भर में अठारह हजार लोग मारे जाते हैं। इस तरह यह स्वास्थ्य पर मंडराने वाला दुनिया का सबसे बड़ा पर्यावरणीय खतरा बन गया है। विश्व बैंक का आकलन है कि इससे विश्व अर्थव्यवस्था को दो सौ पच्चीस अरब डॉलर का नुकसान पहुंचता है।

डब्ल्यूएचओ के ताजा आंकड़े बताते हैं कि 2010-2014 के बीच दिल्ली के प्रदूषण स्तर में मामूली सुधार हुआ है, लेकिन 2015 से स्थिति फिर बिगड़ने लगी है। वायु प्रदूषण को लेकर डब्ल्यूएचओ ने सौ देशों के चार हजार शहरों का अध्ययन किया है। आंकड़ों के मुताबिक राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पीएम-2.5 का वार्षिक औसत 143 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा मानक से तीन गुना अधिक है, जबकि पीएम-10 का औसत 292 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है, जो राष्ट्रीय मानक से साढ़े चार गुना ज्यादा है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने कुछ दिन पहले दावा किया था कि 2016 की तुलना में 2017 में वायु प्रदूषण के स्तर में सुधार हुआ है। हालांकि उसने अब तक इससे संबंधित आंकड़ा जारी नहीं किया है।
भारतीय शहरों की हवा वाहनों के धुएं से जहरीली होती जा रही है। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में र्इंधन का धुआं, हवा को जहरीली बना रहा है। ऐसे में भारत की जिम्मेदारी बड़ी और ज्यादा चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि हमें विकसित और विकासशील दोनों ही प्रकार के देशों में किए जा रहे उपायों को अपनाना पड़ेगा। प्रारंभिक तौर पर हमें गांवों की हवा को शुद्ध रखने के लिए र्इंधन के रूप में लकड़ी, कोयले का कम से कम इस्तेमाल हो और सड़कों पर वाहनों को कैसे सीमित और नियंत्रित किया जाए। जीवन के लिए वायु प्रदूषण इक्कीसवीं सदी का सबसे बड़ा संकट सिद्ध हो रहा है।

भारत में 2016 में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। अक्तूबर में ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान, दिसंबर 2015 में ट्रकों पर पर्यावरण प्रतिपूर्ति शुल्क (ईसीसी) और वायु प्रदूषण पर नियंत्रण को लेकर एनसीआर के शहरों के बीच बेहतर समन्वय जैसे उपाय इनमें शामिल हैं। सरकार की ओर से उठाए गए कदमों से स्थिति कितनी सुधरी, इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है, क्योंकि डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में 2016 तक के आंकड़ों को ही शामिल किया गया है। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में उज्जवला योजना का जिक्र करते हुए कहा गया है कि हालांकि वायु प्रदूषण के ताजा आंकड़े खतरनाक हैं, लेकिन इसके बावजूद दुनिया के कुछ देशों में सकारात्मक प्रगति देखी जा रही है।

‘नेचर’ जर्नल में प्रकाशित एक रिपोर्ट में वैज्ञानिकों के चेतावनी दी है कि वायु प्रदूषण को रोकने के लिए अविलंब और कारगर उपाय नहीं किए गए तो वर्ष 2050 तक हर बरस तकरीबन छियासठ लाख लोग अकाल मृत्यु के शिकार हो सकते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक मौजूदा समय में प्रदूषित हवा की वजह से हर बरस तकरीबन तैंतीस लाख लोग मर जाते हैं। सर्वेक्षण में यह भी खुलासा किया गया है कि वर्ष 2010 में केवल पॉवर जनरेटर से होने वाले वायु प्रदूषण से सिर्फ भारत में तकरीबन नब्बे हजार लोगों की जानें चली गई थीं। आबादी के लिहाज से सबसे ज्यादा नुकसान भारत का ही होने वाला है, लिहाजा भारत को अपनी जिम्मेदारी बखूबी समझते हुए तत्काल कुछ सार्थक और ठोस उपाय करने होंगे।

भारत सरकार की एक स्वीकारोक्ति में कहा गया है कि वायु प्रदूषण से पैदा हुई बीमारियों के कारण पिछले एक दशक में देश में पैंतीस हजार लोगों की मौतें हो चुकी हैं। हालांकि हमारा पर्यावरण मंत्रालय अभी तक यही कहता आया है कि वायु प्रदूषण से उत्पन्न होने वाले स्वास्थ्य संबंधी खतरों का कोई पक्का सबूत उपलब्ध नहीं है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन पिछले कुछ समय से भारत में वायु प्रदूषण को लेकर चिंता व्यक्त करता आ रहा है। उसका मानना है कि वायु प्रदूषण के कारण वक्त से पहले अट्ठासी फीसद मौतें उन देशों में होती हैं, जिनकी आय का स्तर निम्न या मध्य है। लिहाजा, आतंकित होने की बजाय प्रदूषण के विरुद्ध लड़ाई तेज करने की जरूरत है।

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