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वक्त की नजर: आरक्षण का झुनझुना

माना कि आरक्षण को हटाना कठिन है, क्योंकि इसके होने से बना है एक विश्वसनीय वोट बैंक, जो कोई भी राजनेता खोना नहीं चाहेगा। लेकिन शायद कोई आएगा, जिसको देश की चिंता अपने राजनीतिक लाभ से ज्यादा होगी। यह सपना तो हम देख ही सकते हैं।

Author January 13, 2019 3:54 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (पीटीआई फाइल फोटो)

मोदी जब प्रधानमंत्री बन जाएंगे तो वे आरक्षण को जरूर समाप्त कर देंगे। इसका हमको पूरा विश्वास है।’ यह बात मुझे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुछ ब्राह्मण छात्रों ने कही पिछले चुनाव अभियान के दौरान, जब खबर मिली बनारस वासियों को कि मोदी इस चुनाव क्षेत्र से लड़ने वाले हैं। जिन छात्रों से मेरी बात हो रही थी, वे वहां संस्कृत पढ़ रहे थे और उनकी सबसे बड़ी समस्या थी कि दाखिला बीएचयू में बड़ी मुश्किल से मिलता था सवर्ण छात्रों को, क्योंकि सत्तर फीसद जगहें आरक्षित थीं अन्य वर्गों के लिए। इन छात्रों की बातें मुझे पिछले हफ्ते बहुत याद आर्इं, जब संसद में संविधान संशोधन पर चर्चा सुन रही थी। चर्चा दोनों सदनों की ध्यान से सुनी मैंने इस उम्मीद से कि कोई एक तो होगा, जो कहेगा कि आरक्षण का दायरा बढ़ाने के बदले उसको पूरी तरह समाप्त करने का समय आ गया है। खूब चर्चा हुई संशोधन पर, लेकिन यह बात किसी ने नहीं कही।

संविधान में आरक्षण का प्रावधान रखा गया था 1947 में उन लोगों के लिए, जिनके साथ सदियों से अन्याय होता आ रहा है अपने देश में। प्रावधान में समय सीमा रखी गई थी, जिसको भुला दिया गया है, क्योंकि हमारे राजनेता जानते हैं कि मामला वोट बैंक का है। न होता तो बहुत पहले स्वीकार कर लिए होते कि अगर सत्तर वर्ष बाद भी दलितों और आदिवासियों को आरक्षण की आवश्यकता है सरकारी शिक्षा संस्थाओं और सरकारी नौकरियों में, तो इसका मतलब है कि आरक्षण नाकाम रहा है। रहा है नाकाम काफी हद तक। सो, इसके दायरे को बढ़ाने से कुछ हासिल नहीं होने वाला है। भारत के नौजवानों को आरक्षण से कहीं ज्यादा जरूरत है हजारों नए कॉलेज और विश्वविद्यालयों की है। याद है मुझे कि कपिल सिबल जब मानव संसाधन विकास मंत्री थे, तो उन्होंने मुझे कहा था कि पंद्रह सौ नए विश्वविद्यालय बनाने की आवश्यकता है, क्योंकि उच्च शिक्षण संस्थाओं का अभाव इतना गंभीर है। इनका निर्माण हुआ नहीं है। वह इस आंकड़े से साबित होता है कि कुल विश्वविद्यालय भारत में आठ सौ उन्नीस हैं।

सरकार के पास क्षमता नहीं है इनको बनाने की और चूंकि शिक्षा प्रणाली में एक तरह का लाइसेंस राज है शिक्षा प्रणाली में, निजी कॉलेज बन नहीं सकते हैं, इसलिए कि लाइसेंस सिर्फ उनको मिलता है, जिनकी पहुंच लंबी हो। थोड़ी-सी तहकीकात करेंगे आप तो जान जाएंगे कि तकरीबन हर बड़े राजनेता की पत्नी या बेटी कोई कॉलेज चला रही है, क्योंकि इस बहाने मिलती है हमारे महानगरों में कीमती जमीन या तो मुफ्त में या कौड़ियों के दाम। इतनी महंगी हैं ये जमीनें कि किसी आम आदमी के लिए इसको अपने बल पर खरीदना नामुमकिन है। मोदी ने शिक्षा को प्राथमिकता दी होती तो अपनी सरकार बनते ही एक नई शिक्षा नीति तैयार करने में लग जाते शिक्षा के लिए एक अलग मंत्रालय बना कर। शिक्षामंत्री होते थे भारत सरकार में, लेकिन राजीव गांधी ने शिक्षा मंत्रालय को मानव संसाधन मंत्रालय में शामिल कर दिया और किसी प्रधानमंत्री ने इसको बदलने का प्रयास नहीं किया है आज तक। स्मृति ईरानी के हाथों में जब यह अति-महत्त्वपूर्ण मंत्रालय आया, तो मैं उनसे मिलने गई। उस वक्त स्मृतिजी को मालूम नहीं क्यों चिंता थी कि दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति बेकाबू हो रहे हैं। यह बात जब उन्होंने कही मुझे, तो मैंने सुझाव दिया कि इसकी चिंता करने के बदले उनको सोचना चाहिए कि किस तरह सरकारी शिक्षण संस्थानों की स्वतंत्रता और स्वायत्ता बढ़ाने का काम किया जा सकता है। मैंने उनको याद दिलाया कि आज दुनिया की बेहतरीन उच्च शिक्षण संस्थाएं सब अमेरिका में हैं, जहां सरकारों और सरकारी अधिकारियों का हस्तक्षेप न होने के बराबर है। हॉर्वर्ड और येल जैसे आइवी लीग विश्वविद्यालय बने हैं, निजी निवेशकों के पैसों से। ये विश्वविद्यालय खुद तय करते हैं अपने पढ़ाई के तरीके और दाखिले के नियम।

भारत में हिसाब उलटा है। सरकारी अधिकारी तय करते हैं कि अध्यापकों का वेतन कितना होगा, फीस कितनी होगी, पढ़ाई क्या होगी, और आरक्षण किसके लिए होगा। इतना हस्तक्षेप करने के बावजूद हाल यह है कि कई छात्र अशिक्षित ही रह जाते हैं पढ़ाई खत्म होने के बाद। और कई बेजुबान भी। मुझे ऐसे कई युवा मिले हैं, जिन्हें इंग्लिश मीडियम में पढ़ने के बाद अंग्रेजी में बात करनी तक नहीं आती है, पढ़ाई करना तो दूर की बात। नतीजा यह कि उनको सरकारी नौकरियों पर निर्भर रहना पड़ता है, क्योंकि निजी क्षेत्र में काम करने के लायक ही नहीं बनते हैं। सरकारी नौकरियों की स्थिति यह है कि पिछले वर्ष जब रेल महकमे ने नब्बे हजार नौकरियां खोलीं, तो तीन करोड़ के करीब लोग सामने आए। उत्तर प्रदेश में जब बासठ चपरासियों की नौकरियां खुलीं तो तिरानबे हजार लोग आए, जिनमें पचास हजार ग्रेजुएट थे और 3,740 के पास पीएचडी की डिग्री थे। अब जो सवर्ण नौजवान भी इस दौड़ में शामिल हो गए हैं, कहां से आने वाली हैं सरकारी नौकरियां? काश कि संविधान में संशोधन किया होता आरक्षण को समाप्त करने का। काश कि नरेंद्र मोदी ने अपने पूर्ण बहुमत के बल पर ऐसा किया होता अपने कार्यकाल के पहले सौ दिनों में ही। अब जब सौ दिन से कम रह गए हैं उनके कार्यकाल के, इतने बड़े सुधार की कोई उमीद नहीं रख सकते हैं। सो, उम्मीद यही कर सकते हैं कि अगले आम चुनावों के बाद जो भी प्रधानमंत्री बनेगा, उसमें इस सुधार लाने की हिम्मत होगी। माना कि आरक्षण को हटाना कठिन है, क्योंकि इसके होने से बना है एक विश्वसनीय वोट बैंक, जो कोई भी राजनेता खोना नहीं चाहेगा। लेकिन शायद कोई आएगा, जिसको देश की चिंता अपने राजनीतिक लाभ से ज्यादा होगी। यह सपना तो हम देख ही सकते हैं।

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