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वक़्त की नब्ज़ः एक विवाद खत्म!

अयोध्या में राम मंदिर का विरोध करना बेवकूफी थी और इसकी वजह से सबसे ज्यादा नुकसान हुआ मुसलमानों का। विवाद सुलझाया जा सकता था, लेकिन इस्लाम के पहरेदारों ने होने नहीं दिया। बाबरी मस्जिद के गिराए जाने में उनका उतना ही योगदान रहा है, जितना कट्टरपंथी हिंदुओं का।

मोदी का दूसरा कार्यकाल शुरू होते ही ऐसे कई कदम उठाए गए थे, जो मुसलिम-विरोधी माने जा सकते हैं।

अगले हफ्ते अयोध्या में जब शिलान्यास होगा ‘भव्य’ राम मंदिर का, तो शायद एक ऐसे विवाद का अंत हो जाएगा, जो विवाद होना ही नहीं चाहिए था। विवाद बना तो उस झूठी धर्मनिरपेक्षता के कारण, जो ‘सेक्युलर’ कांग्रेस पार्टी का मजहब बनी रही है 1947 के बाद से। इसका बुनियादी उसूल था हिंदुओं और मुसलमानों की आस्था के साथ खिलवाड़ करके दोनों के वोट बटोरना। मजे की बात यह है कि इस झूठे सेक्युलरिज्म का पर्दाफाश कांग्रेस ने खुद किया था, जब राजीव गांधी ने कट्टरपंथी मुसलमानों को खुश रखने के लिए एक ऐसा कानून पारित करवाया लोकसभा में जो शरीअत पर आधारित था।

उसके बाद जब ‘एक विधान, एक संविधान’ की गूंज सुनाई दी देश भर में और हिंदुओं का विरोध चरम सीमा पर पहुंचने लगा, तो उनको खुश रखने के लिए अयोध्या में उस विवादित मंदिर-मस्जिद के ताले खुलवा दिए राजीव गांधी ने, जो मुसलमानों के लिए बाबरी मस्जिद थी और हिंदुओं के लिए रामजन्मभूमि। याद कीजिए कि 1989 के चुनावों में राजीव गांधी ने अपना चुनाव अभियान शुरू किया था अयोध्या में राम मंदिर के शिलान्यास में शामिल होकर और रामराज्य का वादा बुलंद करके।

वादा भी झूठा था और राजीव गांधी का सेक्युलरिज्म भी झूठा था। इस किस्म के सेक्युलरिज्म ने ही उस कट्टरपंथी हिंदुत्व को जन्म दिया है, जो नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद देश भर में आग की तरह फैला और जिसका आधार है मुसलमानों से नफरत। इस किस्म के हिंदुत्व ने भारतीय मुसलमानों में डर पैदा किया है कि मोदी सरकर की सोची-समझी रणनीति है उनको दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने की। प्रधानमंत्री कहते तो हैं बहुत बार कि वे ‘सबका विश्वास’ लेकर चलना चाहते हैं, लेकिन उनके साथी और समर्थक अलग भाषा बोलते हैं सोशल मीडिया पर। उनके गृहमंत्री के भाषण अक्सर स्पष्ट करते हैं कि उनकी नजर में मुसलमान दूसरे दर्जे के नागरिक बन चुके हैं भारत में।

याद कीजिए, उन्होंने दिल्ली चुनावों में प्रचार करते हुए किस तरह के भाषण दिए थे। यह महामारी न आती तो शायद आज भी मुसलमान सड़कों पर उतर कर विरोध कर रहे होते नागरिकता कानून में संशोधन को लेकर। मेरी नजर में उनकी चिंता जायज है। लेकिन ऐसा कहने के बाद यह भी कहना जरूरी समझती हंू कि इस कौम के नेताओं ने अयोध्या को लेकर जो लड़ाई लड़ी है पिछले तीन दशकों से, वह गलत थी। अयोध्या में राम मंदिर का विरोध करना बेवकूफी थी और इसकी वजह से सबसे ज्यादा नुकसान हुआ मुसलमानों का। विवाद सुलझाया जा सकता था, लेकिन इस्लाम के पहरेदारों ने होने नहीं दिया। बाबरी मस्जिद के गिराए जाने में उनका उतना ही योगदान रहा है, जितना कट्टरपंथी हिंदुओं का।

आज भी उनके कई नेता ऐसी बातें कर रहे हैं, जिसमें उसी झूठे सेक्युलरिजम की बू आती है। ऐसी बातें करते हैं ये लोग जैसे आस्था का अधिकार सिर्फ मुसलमानों को है। कभी स्वीकार नहीं करते हैं कि हिंदुओं की अगर आस्था है कि राम भगवान का जन्म वहीं हुआ था, जहां बाबर ने अपनी मस्जिद बनाई थी, तो उस आस्था का उनको सम्मान करना चाहिए। अयोध्या राम भक्तों के लिए काबा है। काबे पर अगर किसी विदेशी हमलावर ने मंदिर या गिरिजाघर बनाया होता, तो क्या उसको गिराया न जाता?

संकेत मिल रहे हैं प्रधानमंत्री कार्यालय से कि अगले सप्ताह राम मंदिर के शिलान्यास समारोह में प्रधानमंत्री उपस्थित होंगे और इसका विरोध कर रहे हैं असदुद्दीन ओवैसी जैसे मुसलिम नेता धर्मनिरपेक्षता का हवाला देकर। भूल जाते हैं शायद कि उनका ‘सेक्युलरिज्म’ उतना ही झूठा है जो कांग्रेस पार्टी का रहा है। भूल जाते हैं कि इस्लाम के नाम पर बंटवारा हुआ था इस देश का, लेकिन इस बात को बिल्कुल नहीं भूले हैं करोड़ों हिंदू। इसका लाभ मिला है नरेंद्र मोदी को, इसलिए आज तक उन्होंने एक शब्द नहीं बोला है उस नफरत के खिलाफ, जो उनके समर्थक फैलाते हैं इतना कि मुसलमान होना ही आजकल देशद्रोह माना जा रहा है। सोशल मीडिया पर मोदी के समर्थक मुसलमानों को पाकिस्तानी कहते हैं बेझिझक।

मोदी का दूसरा कार्यकाल शुरू होते ही ऐसे कई कदम उठाए गए थे, जो मुसलिम-विरोधी माने जा सकते हैं। अगस्त के पहले सप्ताह में पिछले साल अनुच्छेद 370 हटाया गया था और इस देश के इकलौते मुसलिम बहुल राज्य के टुकड़े कर दिए गए थे। इसके बाद आया नागरिकता कानून में ऐसा संशोधन, जिसने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत के दरवाजे मुसलिम शरणार्थियों के अलावा हर धर्म के शरणार्थियों के लिए खुले रखे जाएंगे। जब देश के शहरों में मुसलमान विरोध प्रदर्शन करने लगे, तो उन पर देशद्रोह का आरोप लगाया गया, बावजूद इसके कि उनके हाथों में तिरंगे थे और संविधान भी।

ऐसे माहौल में हो रहा है अगले सप्ताह अयोध्या में राम मंदिर का शिलान्यास। हिंदुओं और मुसलमानों के बीच जो आज तनाव और नफरत है, उसे मैंने पिछली बार देखा था लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा के समय। सोमनाथ से निकली थी रथयात्रा अयोध्या के लिए और जहां-जहां से गुजरी वहां दंगे हुए, जिनमें मरने वाले मुसलमान कहीं ज्यादा थे। मोदी अगर वास्तव में सबका विश्वास लेकर राज करना चाहते हैं, तो नफरत की आग बुझाने के लिए उनको खुद सामने आना होगा। अपने उन साथियों को रोकना होगा जो नफरत फैलाने का काम कर रहे हैं। साथ में यह भी कहना जरूरी है कि मुसलमानों के नेताओं को राम मंदिर को लेकर अपना विरोध बंद करना चाहिए। नहीं ऐसा करते हैं अगर तो हिंदुत्व के कट्टरपंथी सिपाही शिलान्यास के फौरन बाद शुरू करेंगे मांग कृष्ण जन्मभूमि और विश्वनाथ मंदिर को लेकर। नफरत की आग ऐसे फैलती गई तो अपनी इस भारत माता को ले डूबेगी।

 

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