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वक्त की नब्ज- आधार निराधार

गांव दलितों का था और वहां पहुंचने पर मालूम हुआ कि वहां एक भी शिक्षित व्यक्ति नहीं है और एक भी बच्चा स्कूल नहीं जाता है आज भी, क्योंकि स्कूल पांच किलोमीटर दूर है और जाने के लिए सड़क नहीं है।

Author January 14, 2018 04:30 am
डिजिटल इंडिया।

जब भी किसी मुद्दे को लेकर दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में हल्ला मचने लगता है, तो मेरी आदत है किसी दूरदराज गांव में जाकर उसी मुद्दे पर आम, गरीब भारतवासियों से बातें करना। सो, पिछले हफ्ते जब आधार कार्ड को लेकर खूब हल्ला मचने लगा देश भर में निजता पर और पत्रकारों और टीवी एंकरों में भी खेमे बंट गए, मैं एक ऐसे गांव में जा पहुंची जहां कुछ भी नहीं है। सड़क भी नहीं। सो, हाइवे पर गाड़ी छोड़ कर मुझे एक टूटी पुरानी जीप में बैठ कर कच्ची सड़क पर दो किलोमीटर जाना पड़ा। गांव दलितों का था और वहां पहुंचने पर मालूम हुआ कि वहां एक भी शिक्षित व्यक्ति नहीं है और एक भी बच्चा स्कूल नहीं जाता है आज भी, क्योंकि स्कूल पांच किलोमीटर दूर है और जाने के लिए सड़क नहीं है।

रोजगार ढूंढ़ने जाते हैं इस गांव के मर्द कोई पचास किलोमीटर की दूरी पर पत्थरों की एक खान में। सुबह एक बस जाती है और शाम को एक बस वापस आती है। इस खान में उनको दिहाड़ी के तीन सौ रुपए मिलते हैं, जिसमें से साठ रुपए आने-जाने में लग जाते हैं। गांव की सबसे बड़ी समस्या है पानी। इतना गंदा, इतना जहरीला है गांव का पानी कि लोग अक्सर बीमार रहते हैं, लेकिन इलाज करवाने की जिनके पास क्षमता है उनको जाना पड़ता है दूर शहर में, क्योंकि गांव के आसपास स्वास्थ्य केंद्र भी नहीं है। इस गांव में अब एक नई समस्या है और वह है आधार कार्ड। मुझे ऐसे लोग मिले, जिनके पास कार्ड तो है, लेकिन उनकी अंगुलियों की लकीरें मजदूरी के कारण इतनी घिस गई हैं कि बायोमेट्रिक पहचान नहीं हो पाती। एक बुजुर्ग ने मुझे बताया, ‘हमने मोदीजी को वोट दिया था क्योंकि उनका नारा सबका साथ, सबका विकास हमको बहुत अच्छा लगा। अब भी हम मानते हैं कि देश के लिए कुछ करना चाहते हैं मोदी, लेकिन उनको कह दीजिए कि हम आॅनलाइन जाकर जॉब कार्ड आदि नहीं ले सकते हैं, क्योंकि हमको शहर जाकर यह सब करना होता है और कम से कम वहां सौ रुपए देने पड़ते हैं।’

इस गांव में किसी के पास न स्मार्टफोन था, न सेलफोन। न ही कुछ और था, लेकिन सरकारी राहत के तौर पर उनको तकरीबन कुछ नहीं मिला है अभी तक। मनरेगा के तहत कुछ काम हुआ था कोई तीन साल पहले, लेकिन उस मजदूरी के भी पैसे नहीं मिले हैं। जब भी अपने विधायक से इस बात का जिक्र करते हैं गांववाले, वे उनको कलेक्टर के पास जाने को कहते हैं। कलेक्टर का दफ्तर इस गांव से इतना दूर है कि आने-जाने के पांच सौ रुपए लग जाते हैं। कौन जाएगा?आधार कार्ड जब मोदी सरकार ने अनिवार्य किया तो इस मकसद से कि गरीबी रेखा के नीचे जो भारतवासी तड़प-तड़प कर जिंदगी बिताते हैं उनके लिए राहत देने का काम बेहतर हो जाएगा। आधार कार्ड से बैंक में खाता खुलेगा और उसमें सीधा राहत का पैसा जाएगा, सो बीच में भ्रष्ट अधिकारियों को निकाल दिया जाएगा इस तरह। इसका विचार जब दिल्ली के ऊंचे दफ्तरों में आला अधिकारियों ने दिया होगा, तो बहुत अच्छा लगा होगा प्रधानमंत्री को, लेकिन जमीन तक जब पहुंचता है ऐसा विचार, उसकी शक्ल बदल जाती है। सबसे ज्यादा गरीब इस देश में मिलते हैं ऐसे गांवों में, जहां आज भी कुछ नहीं है। यहां तक कि सरकारी राहत भी पहुंचाने कोई नहीं जाता, क्योंकि कौन जाएगा वहां तक, जहां सड़क भी नहीं जाती है?

सो, आधार कार्ड ऐसे लोगों के लिए राहत का साधन नहीं, एक नई मुसीबत बन गया है। शहरी भारतीयों के लिए इस कार्ड की वजह से जो मुसीबतें पैदा हुई हैं वे कुछ भी नहीं गांव के गरीब वासियों की मुसीबतों के सामने। शहरों में हमको चिंता है कि हमारी निजता को चोट पहुंचती है जब आधार कार्ड में दी गई जानकारी कोई भ्रष्ट अधिकारी किसी पत्रकार को बेच देता है। निजी तौर पर मुझे गुस्सा आता है जब मेरा बैंक मुझे बार-बार कहता है कि आधार कार्ड न होगा मेरे पास तो खाता भी बंद हो सकता है। गुस्सा आता है जब अमेजन से किताबें मंगवाती हूं और कूरियरवाला देने से इंकार करता है, जब तक मेरा आधार कार्ड नहीं देख लेता है। लेकिन मेरे पास कम्प्यूटर है, स्मार्टफोन है और आवाज उठाने के जरिया हैं बहुत सारे। सोचिए, उनका क्या हाल होता होगा जो अनपढ़ हैं, अति-गरीब हैं, बेरोजगार हैं और ऐसे गांवों में रहते हैं जहां तक अभी सड़कें भी नहीं पहुंची हैं। सो, प्रधानमंत्रीजी आधार कार्ड को अनिवार्य करने के पीछे आपके इरादे चाहे नेक होंगे, धरातल पर अगर आप अपने सांसदों और विधायकों को भेजेंगे तो शायद पाएंगे कि गरीब भारतीय की कठिनाई भरी जिंदगी में आपने एक कठिनाई और बढ़ा दी है।

आखिर में स्पष्ट करना जरूरी समझती हूं मैं कि मैंने शुरू से इस कार्ड का विरोध किया है। जब नंदन निलेकणी के इस विचार को राहुल गांधी ने ऐसे अपनाया जैसे कि इसके आने से भारत में गरीबी दूर हो जाएगी तब भी मैंने कहा था कि ऐसे देश में जहां बिजली भी नहीं है, जहां आम लोगों के पास डिजिटल समझ नहीं है, इस किस्म के बायोमेट्रिक कार्ड की कोई जरूरत नहीं है। मैंने आधार कार्ड तभी बनवाया जब अनिवार्य हो गया था। सो, अब मेरे बटुए मैं रहता है पैन कार्ड, मतदाता कार्ड और अन्य कई पहचानपत्रों के बीच। मुझे और मेरे जैसे भारतीयों को इस आधार कार्ड से लेकर अगर सबसे बड़ी चिंता है तो यह कि कोई तानाशाह अगर प्रधानमंत्री बन जाए कभी तो इस कार्ड को वापस लेकर हमारी नागरिकता समाप्त कर सकता है। वह रही भविष्य की काल्पनिक चिंता, गरीब भारतीयों की मुश्किलें और भी हैं अभी से।

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