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वक्त की नब्ज- दम दिखाने का वक्त

नए साल के पहले दिन राष्ट्रपति ट्रंप ने ट्वीट किया कि पाकिस्तान को पिछले पंद्रह वर्षों में अमेरिका ने तैंतीस सौ करोड़ रुपए से ज्यादा आर्थिक सहायता दी है और बदले में पाकिस्तान से अमेरिका को सिर्फ झूठ और फरेब मिला है।
Author January 7, 2018 04:47 am
अमेरिका और पाकिस्तान का झंडा।

जिस दिन भारत के प्रधानमंत्री उस तरह पाकिस्तान के साथ बात कर सकेंगे, जिस तरह अमेरिका के राष्ट्रपति बात करते हैं, उस दिन इस उप-महाद्वीप में हम असली अमन-शांति की उम्मीद कर सकेंगे। नए साल के पहले दिन राष्ट्रपति ट्रंप ने ट्वीट किया कि पाकिस्तान को पिछले पंद्रह वर्षों में अमेरिका ने तैंतीस सौ करोड़ रुपए से ज्यादा आर्थिक सहायता दी है और बदले में पाकिस्तान से अमेरिका को सिर्फ झूठ और फरेब मिला है। हमारे प्रधानमंत्री भी कह सकते हैं कि उन्होंने बहुत बार पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया और हमेशा जवाब में मिला है झूठ और फरेब। ऐसा होता आया है, जबसे इस्लाम के नाम पर भारत को तोड़ा गया था 1947 में, लेकिन अपनी आंखों से मैंने जो देखा है, उसका वर्णन करना चाहूंगी। जबसे मैंने पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा है, अगर किसी एक व्यक्ति को देखा है पाकिस्तान के साथ दिल से दोस्ती करने का प्रयास करते हुए, तो वे हैं अटल बिहारी वाजपेयी। अटलजी जब विदेशमंत्री थे, तो दिल्ली पहली बार बंटवारे के बाद आए थे हफीज जलंधरी और उनके स्वागत में गालिब अकादमी में एक सभा की गई, जिसमें अटलजी खास मेहमान थे। मंच पर जब पहुंचे तो उन्होंने ऐसा भाषण दिया, जिसको सुन कर पाकिस्तान के इस मशूर शायर की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने कहा, ‘हम भाई हैं लेकिन सियासत ने हमारे बीच दीवार खड़ी कर दी है- मैं यह नहीं कहता कि दीवार गिराई जा सकती है, लेकिन एक-दो र्इंटें खिसका दी जाएं, तांक-झांक तो हो।’

फिर जब प्रधानमंत्री बने अटलजी, मैं वाघा के उस पार थी जब अटलजी उस सुनहरी रंग की बस में सवार होकर वाघा बॉर्डर को पार करके आए थे दोस्ती का हाथ बढ़ाने। वाघा के उस पार नवाज शरीफ पहुंचे थे उनका स्वागत करने और भारतीय पत्रकारों का एक पूरा काफिला पहुंच गया था लाहौर एक दिन पहले, जिसमें मैं भी शामिल थी। क्या बताऊं लहौर में उस दिन कितनी खुशी और उम्मीद का माहौल था। याद है मुझे कि मेरे एक पाकिस्तानी दोस्त ने आशा व्यक्त की कि जैसे वे पहले दिल्ली आया करते थे हर साल ड्राइव करके, वैसे भविष्य में भी आया करेंगे। लेकिन हमें मालूम नहीं था उस जश्न में, जिसमें जावेद अख्तर भी थे, कि झूठ और फरेब का सिलसिला शुरू हो गया था और परवेज मुशर्रफ करगिल युद्ध की तैयारी में लगे हुए थे। इस युद्ध के दो साल बाद अटलजी ने फिर दोस्ती का हाथ बढ़ाया, मुशर्रफ को आगरा बुला कर बातचीत दोबारा शुरू करने के मकसद से। लेकिन यह कोशिश भी बेकार गई, क्योंकि मुशर्रफ आए थे सिर्फ यह कहने कि वे कश्मीर पर ही बात करने आए हैं और कश्मीर के सिवा किसी दूसरे मुद्दे पर बात करने को तैयार नहीं हैं। जब भारत ने उनकी यह बात नहीं मानी तो वे रूठ कर चले गए। कुछ महीने बाद जब 9/11 वाला हमला हुआ और अमेरिका ने पाकिस्तान को जिहादी आतंकवाद के खिलाफ लड़ने पर मजबूर किया, तब भी मुशर्रफ ने अपने पहले भाषण में स्पष्ट किया कि वे पीछे हट रहे हैं वैसे जैसे रसूल पीछे हटे थे यहूदियों के साथ जंग जीतने के लिए।

सो, टंÑप ठीक कहते हैं कि अमेरिका के साथ पाकिस्तान ने झूठ और फरेब का रिश्ता निभाया है। यह सच न होता तो उसामा बिन लादेन को ऐबटाबाद की उस छावनी में पनाह नहीं मिली होती 2011 तक। अमेरिका ने जब उसको ढूंढ़ कर मौत के घाट उतारने की रणनीति बनाई, तो पाकिस्तान को खबर तक न मिलने दी, क्योंकि तब तक दुनिया जान गई थी कि जिहादी आतंकवाद के मामले में पाकिस्तान पूरी तरह झूठ और फरेब का सहारा लेता है। सच पूछिए तो मुझे उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री मोदी इस बात को जानते हुए एक ऐसी रणनीति बनाएंगे पाकिस्तान के लिए, जिसको देखते उसे अमन-शांति के रास्ते पर आना ही पड़ेगा। यानी भारत को दिखाना होगा कि पाकिस्तान उसका न युद्ध में मुकाबला कर सकता है और न कूटनीति में, लेकिन मोदी ने अभी तक ऐसी कोई स्पष्ट नीति बना कर नहीं दिखाई है। सो, कभी नवाज शरीफ के साथ दोस्ती करने की कोशिश में लग गए हैं, तो कभी सर्जिकल स्ट्राइक करके भारत की शक्ति दिखाई है। गुजरात के चुनावों में तो उन्होंने यह भी साबित करने की कोशिश की कि पाकिस्तान इतना शक्तिशाली देश है कि भारतीय चुनावों में दखल देने की काबिलियत रखता है। आरोप लगाया हमारे प्रधानमंत्री ने कि पाकिस्तान में उनको हराने की साजिश रची गई थी।

ऐसा करने की काबिलियत अगर है पाकिस्तान के पास तो शर्म हमको आनी चाहिए। और दिखाना चाहिए कि इस तरह का हस्तक्षेप अगर पाकिस्तान करेगा भारत के अंदरूनी मामलों में, तो हम भी ऐसा करके दिखा सकते हैं। बल्कि ऐसा करके दिखाना चाहिए हमें वैसे भी। सो, हम क्यों नहीं पूरा जोश लगा कर बलूचिस्तान के अलगवादियों की मदद कर रहे हैं? क्यों न हम दुनिया के दरबारों में ऊंची आवाज में कह रहे हैं कि बलूचिस्तान में जुल्म हो रहा है आम लोगों के साथ? सो, 2018 के इस पहले लेख में मैं उम्मीद जताना चाहती हूं कि इस साल मोदी सरकार की तरफ से एक स्पष्ट पाकिस्तानी नीति बने, जिसका आधार हो कि भारत में जिहादी आतंकवाद को फैलाना बंद न हुआ तो हमारी तरफ से भी दोस्ती के बदले झूठ और फरेब ही मिलने वाला है। पाकिस्तान को मैं अरसे से जानती हूं अच्छी तरह, इसलिए यकीन के साथ कह सकती हूं कि पाकिस्तान को अमन-शांति के रास्ते पर लाना है अगर तो उसको भारत की शक्ति दिखानी पड़ेगी। दिखाना होगा कि भारत पाकिस्तान से ज्यादा ताकतवर देश है हर तरह से।

 

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  1. Shrikant Sharma
    Jan 8, 2018 at 6:31 am
    meri education ki pahli kahani mein ek bahadur shikari ek non veg khunkhar sher ko pakad kar use sirf veg khana de de kar palta hai sher us se bahut hil mil jaata hai dost ban jaata hai.ek baar us sher ko janjeer se t kar subah shiikaree akhbar padhta rahta hai uske haath mein chot lagee rahti hai usmein khoon rokne ke liye marham patti kee gayee thee shiikaree akhbar padhne mein talleen rahta hai sher roj ki tarah uska haath chatne lagta hai dheere dheere sherkee jeebh ghav tak pahunchte hai aur use khoon ka swad milta hai sher jakhm ko chat kar khoon peene lagta hai shikaree ko jaise hi pata lagta hai voh sher ko disturb naa karte huye apne naukar ko bulata hai aur us sher ko ee marne kaa hukm deta hai naukar paaltoo sher ko golee maar deta hai.sher ki genetics jaag gayee The aadmi kaa khoon peekar aur agar use golee nahin maarte to vohshikaree ko khaa jaata.pak cheen-NK -Talibaaniyuon se milkar ab aadamkhor ho gaya hai NK se mil kar USA ko khane ki saajish hai trump shootsit
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    1. R Chugh
      Jan 7, 2018 at 11:59 am
      Excellent Article Tavleen ji. Pak understands language of power only. Modi should act more tough on pak policy and make them fearful. Then only they will stop.
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