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वक्त की नब्ज- जो करना था, नहीं हुआ

मेरा वास्ता इन गरीब बच्चों से इसलिए है, क्योंकि इनको एक वक्त का सही पोषण देने के मकसद से मैंने कई साल पहले ‘नाश्ता’ नाम की एक संस्था शुरू की थी।
Author October 1, 2017 06:01 am
हमारे देश की मुख्य समस्याओं में से एक है भुखमरी। (Source: Reuters)

मेरा मानना है कि राजनीतिक पत्रकारिता का दायरा हम पत्रकारों ने इतना छोटा कर दिया है कि असली मुद्दों की जगह अक्सर राजनीतिक गतिविधियों में ही उलझे रहते हैं। सो, इस हफ्ते मैं जानबूझ कर पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा के उस लेख के बारे में नहीं लिखना चाहूंगी, जिसके कारण भारतीय जनता पार्टी के अंदर भूकम्प आ गया है। ऐसा है कि जिस दिन इंडियन इक्सप्रेस अखबार में यह लेख छपा था, मैं एक ऐसी अदालत में थी, जहां बच्चों की किस्मत के फैसले होते हैं। मुंबई शहर की इस अदालत का नाम है चाइल्ड वेल्फेयर कमेटी (सीडब्ल्यूसी)। यहां मैं कई बार पहले भी गई हूं लाचार, गरीब, फुटपाथ पर रहने वाले बच्चों की मदद करने।

मेरा वास्ता इन गरीब बच्चों से इसलिए है, क्योंकि इनको एक वक्त का सही पोषण देने के मकसद से मैंने कई साल पहले ‘नाश्ता’ नाम की एक संस्था शुरू की थी। इरादा तो था कि इनको स्कूल भेजने की कोशिश भी साथ-साथ करूंगी। लेकिन इनके अनपढ़, गरीब मां-बाप अक्सर इसके लिए राजी नहीं होते हैं, क्योंकि बच्चों से छोटे-मोटे काम करवा कर परिवार की आमदनी में इजाफा होता है। सो, जब इनमें से कोई मां-बाप अपने बच्चों को किसी प्राइवेट हॉस्टल में भेजने के लिए राजी हो जाते हैं, मैं इनकी मदद हमेशा करती हूं।

समस्या यह है कि सीडब्ल्यूसी की इजाजत के बिना बच्चों को प्राइवेट रिहायशी संस्थाओं में नहीं डाला जा सकता है, सो पिछले हफ्ते मैं सूरज और मेरी के लिए इजाजत मांगने गई थी, उनकी मां संगीता के साथ। संगीता की तरफ से मैंने दरखास्त लिखी थी, जिसको मैंने अदालत में पहुंचते ही एक अधिकारी को देने की कोशिश की। उसने पत्र को देखे बिना मुझे बाहर प्रतीक्षा करने को कहा। जितने संवेदनहीन और संगदिल सीडब्ल्यूसी के अधिकारी होते हैं, शायद ही किसी अन्य सरकारी विभाग में मिलते होंगे। लेकिन बड़े साहब के आदेश का उल्लंघन नहीं कर सकती थी। बाहर बहुत प्रतीक्षा की, लेकिन दरखास्त नहीं जमा कर सकी। ऐसा अक्सर होता है। लेकिन सोचा था मैंने कि मोदी के राज में इन चीजों में परिवर्तन जरूर आएगा।

मोदी की राजनीतिक सूझबूझ तेज है, सो मुझे उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री बनते ही उनको दिख जाएगा कि कांग्रेस छाप शासन की सबसे बड़ी नाकामियां उन क्षेत्रों में रही हैं, जहां इस देश के गरीब नागरिकों को सीधा फायदा मिलता हो, यानी सरकारी शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, गरीब बच्चों और महिलाओं के लिए बनाई गर्इं समाज कल्याण योजनाओं में।आज जब भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री भारत के तकरीबन सारे बड़े राज्यों में सत्ता संभाले हुए हैं, तो हमको इन राज्यों में परिवर्तन अभी तक दिखना चाहिए था। स्कूलों, अस्पतालों और उन सेवाओं में, जो विशेष तौर पर गरीबों को राहत देने के लिए बनाई गई हैं। भारतीय जनता पार्टी के एक भी राज्य में अगर इस किस्म का परिवर्तन आ गया होता तो यकीन के साथ कहा जा सकता है कि 2019 में जनता नरेंद्र मोदी को दोबारा पूर्ण बहुमत देती। लेकिन परिवर्तन लाने के बदले मोदी सरकार ने उन सारी योजनाओं को अपना लिया है, जिनमें पैसा खाने के जरिए इतने हैं कि गरीबों तक राहत पहुंचते-पहुंचते कई अधिकारियों को राहत पहुंच जाती है।

मसलन, मनरेगा ही ठीक तरह से काम कर रहा होता तो ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी आज तक कम हो गई होती। इस विशाल और महंगी योजना को सोनिया-मनमोहन सरकार ने शुरू किया था 2006 में। यह योजना रोजगार पैदा करने में इतनी नाकाम रही कि आज कांग्रेस उपाध्यक्ष और युवराज खुद मानते हैं कि कांग्रेस पार्टी 2014 में चुनाव इसलिए हारी थी कि क्योंकि भारत के नौजवानों के लिए रोजगार के अवसर नहीं पैदा कर सकी थी। मनरेगा का विरोध प्रधानमंत्री मोदी ने शुरू में डट कर किया, लेकिन आज उसको ऐसा अपना लिया है जैसे कि योजना उनकी अपनी हो।
एक तरफ प्रधानमंत्री ‘न्यू इंडिया’ का सपना देख रहे हैं। लेकिन इस न्यू इंडिया में क्यों इस तरह की पुरानी, बेकार

योजनाओं को शामिल कर रहे हैं? क्यों नहीं अपने मुख्यमंत्रियों से नई योजनाएं बनाने को कहते हैं? महाराष्ट्र सरकार अगर मुंबई जैसे महानगर में गरीबी वास्तव में कम करना चाहती है, तो कम से कम इतना तो करके दिखाती कि फुटपाथ पर रहने वाले बच्चों के लिए बड़े पैमाने पर सही पोषण उपलब्ध कराने के लिए संस्थाएं बनवाती। फुटपाथ पर रहने वालों के लिए रैन बसेरे क्यों नहीं बने अभी तक? इन लोगों का इतना बुरा हाल है कि बरसात के मौसम में भी खुले आसमान के नीचे गुजारने को मजबूर हैं। जब बहुत ज्यादा बारिश होती है तो ये अपने बच्चों के साथ आलीशान इमारतों के छज्जों के नीचे या फिर सरकारी शौचालयों में आसरा लेते हैं। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने इन गरीबों के लिए सिर्फ उतना ही किया होता, जो गाय माता के लिए किया है, तो इनका जीवन काफी हद तक सुधर गया होता।

दुख की बात यह है कि इन लोगों ने पहली बार 2014 में अपना वोट कांग्रेस को न देकर मोदी को दिया, क्योंकि रेडियो पर जब ‘अच्छे दिन’ के आने के बारे में सुना तो उनको लगा कि मोदी के आने से वास्तव में उनके भी अच्छे दिन आ जाएंगे। आज मायूस होकर कहते हैं कि उनके जीवन में इतना भी परिवर्तन नहीं आया है कि अपने बच्चों को वे सुरक्षित रख सकें। हर दूसरे दिन पुलिस वाले गिरफ्तार करके इनको ले जाते हैं। कभी आवारगी के जुर्म में, तो कभी चोरी के जुर्म में। जिस ‘चिल्ड्रन होम’ में इन बच्चों को भेजा जाता है, वहां के हालात तो मुंबई के फुटपाथों से भी बदतर हैं।

 

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