ताज़ा खबर
 

वक्त की नब्ज- नौकरशाही यानी गले में पत्थर

नौकरी मिलते ही जिंदगी बन जाती है। घर, गाड़ी, बिजली, पानी सब मिल जाता है अपने सरकारी अधिकारियों को और जहां प्रधानमंत्री को हर पांच साल जनता के पास जाकर वोट मांगने होते हैं, इनको यह कष्ट भी नहीं उठाना पड़ता।

Author December 3, 2017 1:22 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।

मैं आपसे कहूं अगर कि कुछ ऐसे लोग हैं अपने इस भारत देश में, जो प्रधानमंत्री से भी ज्यादा ताकतवर हैं, तो आप शायद मुझे पागल समझेंगे। लेकिन ऐसा है। हैं ऐसे लोग। ये वे लोग हैं, जिनको देहातों में बड़े साहब कहा जाता है और जिनको हम सरकारी अधिकारी कहते हैं। इनको देख कर ही भारत के आम आदमी का सबसे बड़ा सपना है किसी न किसी तरह सरकारी नौकरी हासिल करना। इसलिए कि आम आदमी जानता है कि मिल जाए अगर तो नौकरी पक्की होती है इतनी कि अगर गलती करते भी पकड़े जाएं तो बर्खास्त नहीं होते हैं अक्सर सरकारी अधिकारी, सिर्फ तबादला किया जाता है। नौकरी मिलते ही जिंदगी बन जाती है। घर, गाड़ी, बिजली, पानी सब मिल जाता है अपने सरकारी अधिकारियों को और जहां प्रधानमंत्री को हर पांच साल जनता के पास जाकर वोट मांगने होते हैं, इनको यह कष्ट भी नहीं उठाना पड़ता।  इन बड़े साहबान के बारे में इस सप्ताह इसलिए लिख रही हूं, क्योंकि कुछ घटनाएं ऐसी हुई हैं हाल में, जिनसे मुझे साफ दिखने लगा है कि मोदी के सपने ये लोग कभी पूरे नहीं होने देंगे। आपने देखा होगा कि गुजरात के वर्तमान चुनाव अभियान में दो हथियार हैं, जो राहुल गांधी अपने हर भाषण में इस्तेमाल कर रहे हैं मोदी के खिलाफ, और वे हैं नोटबंदी और जीएसटी। नोटबंदी के बारे में जब भी राहुल जिक्र करते हैं तो कहते हैं कि दुनिया का यह सबसे बड़ा घोटाला साबित हुआ है, क्योंकि मोदी के उद्योगपति दोस्तों ने अपना सारा काला धन बैंकों में डाल कर सफेद कर दिया है।

जीएसटी को कांग्रेस के उपाध्यक्ष ने गब्बर सिंह टैक्स नाम दिया है। ऐसा कह पा रहे हैं सिर्फ इसलिए कि चाहे मोदी के इरादे कितने ही नेक क्यों न रहे हों, उनके अधिकारियों ने इन दोनों चीजों को अमल में लाते समय इतनी गलतियां कीं हैं, इतनी लापरवाही दिखाई है कि आम आदमी को जरूरत से ज्यादा कष्ट हुआ है। नोटबंदी कामयाब कदम माना जाता, अगर बैंकों में नोट काफी होते। जीएसटी अच्छा टैक्स माना जाता, अगर इतना पेचीदा न होता। गलती अधिकारियों की है, लेकिन बदनाम हुए हैं प्रधानमंत्री।दिल्ली के राजनीतिक गलियरों में कहते हैं कि मोदी ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जिनको सरकारी अधिकारियों पर अपने राजनीतिक साथियों से ज्यादा भरोसा है। सो, जब किसी राज्य में कोई नई योजना शुरू करवाना चाहते हैं या किसी पुरानी योजना के बारे में जानकारी लेना चाहते हैं, तो बातचीत करते हैं उन राज्यों के मुख्य सचिवों से, मुख्यमंत्रियों से नहीं। क्या इस वजह से भारतीय जनता पार्टी के उनके अपने मुख्यमंत्री भी उन अच्छे दिनों को नहीं ला पाए हैं, जिनका वादा किया था मोदी ने 2014 में? प्रशासनिक तौर पर इतना कम परिवर्तन दिखा है पिछले तीन सालों में कि कांग्रेस के नेता जगह-जगह ताने कसते हुए कहते फिरते हैं आजकल कि ‘कहां गए अच्छे दिन, मोदीजी कब लाएंगे आप?’

गलती मोदी की है या उनके अधिकारियों की, आप फैसला करें। झारखंड में भारतीय जनता पार्टी का शासन है, लेकिन जब नन्ही संतोषी वहां के छोटे गांव में भूख से मरी थी सितंबर के आखिरी दिनों में, तो सरकारी अधिकारियों ने बिल्कुल वही किया, जो करते आए हैं हमेशा से। संतोषी की मां कहती रही पत्रकारों से कि उसकी बेटी दम तोड़ते समय भी भात मांगती रही थी। चावल थे नहीं घर में छह महीनों से, क्योंकि आधार कार्ड के बिना राशन दुकान से सस्ते चावल मिले नहीं थे उस परिवार को। शर्म से डूब मरना चाहिए था झारखंड सरकार के अधिकारियों को, लेकिन ऐसा कभी नहीं करते हैं ये लोग, सो संतोषी की मौत का कारण बीमारी साबित करने में लग गए। सरकारी अधिकारियों की मानसिकता में मोदी परिवर्तन लाए होते तो कम से कम इतनी दर्दनाक घटना के बाद थोड़ी दया, थोड़ी शर्म तो दिखाते।मोदी का एक और सपना है, जिसको चूर-चूर करने में लगे हुए हैं सरकारी अधिकारी। मोदी इस देश के पहले प्रधानमंत्री हैं, जिनको साफ दिखता है कि पर्यटन अर्थव्यवस्था का एक मजबूत खंबा बन सकता है। भारत के जिन राज्यों में सबसे ज्यादा गुरबत है वहां अक्सर पाए जाते हैं प्राचीन मंदिर, जिनको विदेशी पर्यटक देखने आते हैं दूर-दूर से। ऊपर से भारत के कई राज्यों में प्रकृति ने इतने सुंदर पहाड़, जंगल और समुद्र तटीय इलाके दिए हैं, जो विदेशी पर्यटकों को आकर्षित कर सकते हैं। सो, ऐसा क्यों है कि बैंकॉक शहर में इस साल दो करोड़ विदेशी पर्यटक आए और पूरे भारत में उससे आधे भी नहीं?

बताती हूं। प्रधानमंत्री के डिजिटल सपनों के बावजूद इंटरनेट पर भारतीय वीजा लेना इतना मुश्किल है कि मेरे कई दोस्त तंग आकर कहीं और चले जाते हैं। यहां वीजा लेना आसान नहीं है, क्योंकि हमारे दूतावासों में बैठे हैं वही घमंडी ‘बड़े साहब’, जो इतना सताते हैं विदेशी पर्यटकों को, इतने चक्कर कटवाते हैं कि पूछो मत। मेरे कई दोस्त हैं, जो तंग आकर चले जाते हैं थाईलैंड और बाली जैसी जगहों पर, जहां वीजा न भी हो तो एयरपोर्ट पर देने की सुविधा है। अब आप ही तय कीजिए कि प्रधानमंत्री से ज्यादा ताकतवर हैं अपने सरकारी अधिकारी कि नहीं? मेरी मानें तो वर्तमान स्थिति यह है कि जैसे कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों की आलीशान योजनाओं को नौकरशाहों ने बर्बाद किया है दशकों से बिल्कुल वैसे ही अब लगे हुए हैं मोदी के सपनों को साकार न होने देने में। इन लोगों को बेशक खाने नहीं दे रहे हैं उस तरह जैसे खाया करते थे, लेकिन भ्रष्टाचार सिर्फ पैसों को खाने से नहीं होता। भ्रष्टाचार जब मानसिक होता है, तो उसको कैसे पकड़ा जाए?

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App