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वक्त की नब्ज: हिंसा का सिलसिला

पिछले हफ्ते की हिंसक घटनाओं ने साबित कर दिया है कि कानून को अपने हाथों में लेने से लोग अब डरते नहीं हैं। विधायक जब ऐसा करने लगते हैं, तो आम लोगों को किस मुंह से कोई रोक सकेगा?

Author June 30, 2019 5:51 AM
झारखंड के एक गांव में तबरेज अंसारी को खंभे से बांध कर पीटा अज्ञात भीड़ ने और पीटने वालों ने उससे बार-बार ‘जय श्रीराम’ और ‘जय हनुमान’ कहलवाया।

पहली नजर में लगा मुझे, जब टीवी पर वह फुटेज देखा, कि कोई गुंडा होगा जो बल्ले से एक निहत्थे अदमी को बेरहमी से मार रहा है। फिर जब टीवी पत्रकारों ने इस युवक से पूछा कि यह कर क्या रहे हैं, उसका जवाब था, ‘पहले आवेदन, निवेदन, फिर दे दनादन।’ बाद में मालूम पड़ा कि वह कोई गुंडा नहीं, भारतीय जनता पार्टी का विधायक है, आकाश विजयवर्गीय, जिसके पिता भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं। फिर पता चला कि जिस व्यक्ति पर हमला हो रहा था वह इंदौर नगर पालिका का एक अधिकारी था, जिसको जिम्मेदारी दी गई थी जर्जर इमारतों को गिराने की, बरसात का मौसम शुरू होने से पहले। यानी वह सिर्फ अपनी जिम्मेदारी निभा रहा था। आकाश विजयवर्गीय को गिरफ्तार कर लिया गया है, लेकिन इस लेख के लिखे जाने तक उसको भारतीय जनता पार्टी से बर्खास्त नहीं किया गया है।

पिछले हफ्ते कानून को अपने हाथ में लेने की और भी घटनाएं सामने आर्इं। झारखंड के एक गांव में तबरेज अंसारी को खंभे से बांध कर पीटा अज्ञात भीड़ ने और पीटने वालों ने उससे बार-बार ‘जय श्रीराम’ और ‘जय हनुमान’ कहलवाया। घंटों बाद जब पुलिस आई उसको छुड़ाने, तो अस्पताल ले जाने के बदले उसको हिरासत में रखा। चार दिन बाद उसकी मौत हो गई। मुंबई में फैजल उस्मान खान अपनी रुकी हुई टैक्सी ठीक कर रहा था कि स्कूटर पर सवार कुछ अनजान लोग आए और उसको मारना शुरू कर दिया। पिटाई करते समय ‘जय श्रीराम’ कहलवाया। कोलकता में हाफिज मोहमद शाहरुख हल्दर नाम के मदरसा अध्यापक को चलती ट्रेन से फेंक दिया गया, जब उसने ‘जय श्रीराम’ कहने से इनकार किया। उत्तर प्रदेश के कासगंज में भारतीय जनता पार्टी के विधायक ने एक पुलिसवाले को तबादला करवाने की धमकी दी, जब उसने विधायक के दोस्तों को हिरासत से रिहा नहीं किया। पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री ने संसद के दोनों सदनों में शानदार भाषण दिए। नए भारत का चित्र खींचा अपने शब्दों से। सुरक्षित, समृद्ध, सशक्त भारत होगा यह नया भारत। राज्यसभा वाले भाषण में प्रधानमंत्री ने तबरेज अंसारी की मौत पर दुख व्यक्त किया और यह भी कहा कि ऐसी हिंसा चाहे झारखंड में हो, चाहे पश्चिम बंगाल में, किसी हाल में सही नहीं ठहराई जा सकती। मैंने उनके दोनों भाषण ध्यान से सुने, इस उम्मीद से कि प्रधानमंत्री यह भी कहेंगे कि लोकतंत्र का आधार है कानून-व्यवस्था का सुरक्षित होना। यह जरूर कहा प्रधानमंत्री ने कि किसी को अधिकार नहीं है कानून को अपने हाथों में लेने का, लेकिन क्या यह काफी है जब उनके पहले कार्यकाल में उनके समर्थकों ने गोरक्षा के नाम पर कई बार कानून को अपने हाथों में लिया? मेरी राय में काफी इसलिए नहीं है, क्योंकि जब लिंचिंग जैसी घटनाएं एक बार शुरू हो जाती हैं, तो उनको रोकना बहुत मुश्किल हो जाता है।

ऐसा नहीं कि ऐसी घटनाएं सिर्फ नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद शुरू हुई हैं। पहले भी कानून को हाथ में लिया है हिंसक भीड़ों ने, दंगाइयों ने, गुंडों ने, माफिया डॉन किस्म के लोगों ने। सो, अब क्यों लगने लगा है कि ऐसी हिंसा को रोकना बहुत जरूरी हो गया है? इसलिए कि भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने इस हिंसा का उतना विरोध नहीं किया कभी। निजी तौर पर मुझे कई भाजपा नेताओं ने कहा है कि गोरक्षकों की हिंसा ने मोदी के पहले दौर में उनकी छवि को नुकसान पहुंचाया है। मगर कुछ ज्यादा ही दबी जुबान में हुई हैं ऐसी बातें। सो, गोरक्षकों की हिंसा रुकी नहीं कभी। अब ऐसा समय आ गया है कि गोरक्षा का बहाना भी नहीं रहा है। जिन मुसलमानों से ‘जय श्रीराम’ कहलवा कर पीटा गया पिछले हफ्ते उनमें से एक के पास न गाय थी न इनमें से कोई गोश्त बेचने या इधर से उधर ले जाने की कोशिश कर रहा था। कानून को हाथ में भारतीय जनता पार्टी के विधायकों ने भी अब लेना शुरू कर दिया है सिर्फ अपना रोब दिखाने के लिए। जब सरकारी अधिकारियों और पुलिसवालों पर हमले शुरू हो जाते हैं तो कानून व्यवस्था की रक्षा कैसे होगी?

मोदी ने दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद कई अच्छी बातें की हैं। सबका साथ, सबका विकास के साथ उन्होंने सबका विश्वास जीतने की बात कही थी जबअपने नए निर्वाचित सांसदों को पहली बार संसद में संबोधित किया। इस भाषण के बाद उन्होंने संविधान के सामने माथा टेका जैसे किसी धार्मिक ग्रंथ के सामने माथा टेका जाता है। बहुत अच्छा लगा उनको ऐसा करते देख कर। मगर याद करना जरूरी हो गया है कि संविधान के सारे खंभे खड़े हैं कानून-व्यवस्था की बुनियाद पर। जब कानून-व्यवस्था सुरक्षित नहीं रहती है तो संविधान का सुरक्षित रहना असंभव है। पिछले हफ्ते की हिंसक घटनाओं ने साबित कर दिया है कि कानून को अपने हाथों में लेने से लोग अब डरते नहीं हैं। विधायक जब ऐसा करने लगते हैं, तो आम लोगों को किस मुंह से कोई रोक सकेगा? सो, अगर प्रधानमंत्री अपने ‘नए भारत’ का सपना साकार करना चाहते हैं, तो उनका पहला कदम होना चाहिए अपनी पार्टी से उन विधायकों को बर्खास्त करना, जिन्होंने पिछले हफ्ते सरकारी अधिकारियों और पुलिसवालों पर हमले किए। ऐसा करने के बाद उनको स्पष्ट शब्दों में कहना होगा कि ऐसी हिंसा के लिए उनके नए भारत में कोई जगह नहीं है। भीड़ द्वारा की गई हिंसा बेकाबू हो गई है और कानून को कुचल डालने की आदत भी।

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