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अवतारवाद की जड़ें

इधर कुछ ऐसी कृतियां आई हैं, जो ‘राम भरोसे’ बैठे हिंदी साहित्य के आत्मसम्मोहन को तोड़ने की कोशिश कर रही हैं। ये लेखक हिम्मत करके, भक्तिवाद और अवतारवाद से संबंधित कुछ जरूरी सवाल पूछ रहे हैं।

अवतारवाद की जड़ें

विनोद शाही

ये ऐसे सवाल हैं, जिन पर सदियों से पर्दा डाल कर रखा गया था। पर अब जबकि कुछ लेखक इस संबंध में गहरे संशय से भर गए हैं, जरूरी हो गया है कि हम भक्तिवादी अवतारवाद के स्रोतों तक गहरे में उतरें। इसके मतलब को जानें, और इसके असल सरोकारों को समझने का प्रयास करें।

अवतारवाद की पौराणिक धारणा, एक अर्से से, भारतीय धर्म संस्कृति की मुख्य पहचान होती चली गई है। हालांकि उसकी जड़ें न वेदों में हैं और न ही उपनिषदों में। यह धारणा उत्तर पुराणकाल में अपने मौजूदा रूप में गठित होती है। यह दसवीं सदी के आसपास का काल है। इसलिए इसके सनातन होने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता।

इसके बावजूद, राम और कृष्ण के अवतार होने की बात, भारत की धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान का पर्याय हो गई है। इतना ही नहीं, यह धारणा भारतीय जनमानस की चेतना में इतनी गहराई में उतर गई है कि इसके अनादि होने के बारे में, आमतौर पर किसी को कोई संदेह नहीं होता।

छठी शताब्दी के बाद रचे गए ‘अग्नि’ और ‘गरुड़’ जैसे पुराणों में राम और कृष्ण को विष्णु के दशावतारों में स्थान दिया गया था, पर दसवीं शताब्दी के आसपास, भागवत पुराण ने राम और कृष्ण को ‘परब्रह्म’ के ‘साक्षात प्रकट होने वाले सगुणावतार’ की तरह स्थापित कर दिया। राम और कृष्ण का यह रूप अपने पूर्ववर्ती अवतारी रूपों से बहुत अलग है, हालांकि समय और आस्था के असर में यह भेद धीरे-धीरे भुला दिया गया।

इस अंतर को समझने के लिए हमें अवतारवाद के उस आरंभिक रूप को देखना होगा, जिसका संबंध विष्णु के दशावतारों से है और जिसे भगवद्गीता में ‘संभवामि युगे युगे’ के रूप में अभिव्यक्ति मिली। इस धारणा का संबंध इस विचार से है कि हर युग या कल्प के ‘अलग हालात’ के मद्देनजर, विष्णु ‘अलग रूप में’ अवतरित होते हैं।

पर दसवीं शती के बाद भागवत पुराण और वैष्णव भक्ति के आचार्यों ने राम और कृष्ण के स्वयं विष्णु होने और साक्षात परब्रह्म होने की बात करनी आरंभ कर दी। इसके बाद उनके किसी नए अवतार के रूप में जन्म लेने की संभावना का अंत हो गया।

दावा किया गया कि भक्तों की पुकार सुन कर वे अपने उसी मूल रूप में, यानी दशरथ पुत्र राम और यदुवंशी वासुदेव कृष्ण की शक्ल में साकार प्रकट हो जाते हैं। इस तरह भक्ति के प्रताप से अवतारवाद की मूल धारणा को ही आमूलचूल बदल दिया गया।

यहां दिलचस्प बात यह है कि राम और कृष्ण के दशरथ-सुत और यदुवंशी रूप को अनादि और सर्वव्यापी बना देने के बाद, विष्णु के दशावतार वाली धारणा की कमर ही टूट जाती है। विष्णु के जो दो अवतार कलिकाल से ताल्लुक रखते थे, वे फिर खोजे से भी नहीं मिलते। विष्णु के ये दो कलियुगीन अवतार हैं- बुद्ध और कल्कि।

ये भी विष्णु के ही अवतार हैं, इस बात को अब आग्रह करके याद दिलाना पड़ता है, फिर भी बहुत कम हैं, जिन्हें इस बात पर यकीन होता है।

वैष्णव अवतारवाद के एक धारणा की तरह गठित होने से अनेक सदियों पहले ही बौद्धों के यहां ‘मैत्रेय’ की चर्चा खासी लोकप्रिय हो जाती है। वह संभवत: भारत में किसी भी अवतारवादी विचार के पनपने का आधार प्रतीत होती है। बुद्ध की मैत्रेय के रूप में जो मूर्तियां मिलती हैं, वे पहली शती की ग्रीक गांधार कला की उदाहरण हैं।

इससे यह अनुमान लगाना कठिन नहीं कि गौतम बुद्ध के मैत्रेय के रूप में अवतरित होने की बात उससे काफी पहले से प्रचलित रही होगी। भगवद्गीता का रचनाकाल भी पहली शताब्दी के आसपास माना जाता है।

उसमें अवतारवाद की धारणा की मौजूदगी का संबंध बौद्ध दर्शन के मैत्रेय से है या नहीं, यह विवेचन-विश्लेषण का मुद्दा है। पर इन दोनों के बीच जो समानताएं हैं, वे हमारा ध्यान अवश्य खींचती हैं।

पहली बात, अवतार के विविध युगों में, अलग रूपों में संभव होने की है। बौद्ध वज्रयान में ‘बोधि चेतना के अवतरण’ को विविध ‘कल्पों’ में विभाजित किया गया है। दूसरी बात, ‘महाभारत’ में कृष्ण दर्शन के सार की है।

भगवद्गीता के उपदेश के बहुत अरसा बाद उद्धव के आग्रह पर कृष्ण ने अपने दर्शन के सार के रूप में ‘मैत्री’ की बात की है। इस बात का गौतम बुद्ध के भविष्य में ‘मैत्रेय’ के रूप में अवतरित होने की संभावना से है या नहीं, इसे इन दोनों बातों के दरम्यान मौजूद समानता को महज संयोग कह कर खारिज नहीं किया जा सकता।

एक अन्य बात गौरतलब है, जो अग्नि और गरुड़ जैसे आरंभिक पुराणों से संबंध रखती है। वहां विष्णु के सातवें और आठवें अवतार के रूप में राम और कृष्ण के नाम आते हैं, तो नौवें अवतार के रूप में गौतम बुद्ध हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि भागवत अवतारवाद की जड़ें और कहीं नहीं, बौद्ध दर्शन में हैं।

बुद्ध का प्रभाव उस दौर में इतना बढ़ गया था कि विष्णु के दशावतारों में उन्हें भी स्थान दे दिया गया। पर अवतारवाद की वे आरंभिक धारणाएं धीरे-धीरे पीछे छूट या बदल गईं। बदलाव ये आए कि भागवत पुराण ने राम और कृष्ण के सर्वोपरि होने पर मोहर लगा दी।

इसके बाद भक्तिकाल में राम और कृष्ण का महत्त्व, विष्णु से भी अधिक हो गया और वे साक्षात परब्रह्म का अवतार मान लिए गए। सोच के इस परिवर्तन के पीछे भक्तिकाल में इस्लाम की चुनौती मुख्य कारण बनी।

रामचंद्र शुक्ल ने तो भक्ति को पराजित हिंदू जाति के हत-पौरुष की क्षतिपूर्ति की तरह ही देखा था। तब हिंदू समाज को ऐसे अवतारों की जरूरत पड़ी, जो दरपेश संकट से उबारने के लिए, भक्तों की पुकार सुनकर, जब तब साक्षात प्रकट हो सकते हों।

इसलिए उस दौर के अनेक भक्त-जन राम और कृष्ण के साकार होने और उनका साक्षात दर्शन करने की बात करते अक्सर दिख जाते हैं। पर इससे भारतीय जनमानस का मनोवैज्ञानिक रूप में जो नुकसान हुआ, उसकी भरपाई, आज तक संभव दिखाई नहीं देती।

आधुनिक काल में ज्ञान-विज्ञान के अभूतपूर्व विकास-विस्तार के बावजूद, भक्तिवादी मानसिकता के संदर्भ में बहुत अंतर नहीं पड़ता। भारतेंदु से लेकर द्विवेदी काल तक, हमारे कवि उसी परंपरागत अवतारवादी मानसिकता से पूर्ववत घिरे रहे हैं।

हमारे आधुनिक दौर के कवि लेखक, अधिक से अधिक, वेदांत या बौद्ध करुणा की बात, समांतर रूप में इस तरह करने लगते हैं कि वैष्णव भक्ति और अवतारवाद में उनकी आस्था पर कोई खास आंच न आए।

द्विवेदी काल के बाद वाले छायावादी और नई कविता के दौर में यही प्रवृत्तियां प्रभावी बनी रहती हैं। निराला की ‘राम की शक्तिपूजा’ हो या नरेश मेहता की ‘संशय की एक रात’, दोनों में राम का अवतारी रूप संकटग्रस्त तो दिखाई देता है, खंडित नहीं होता।

हालांकि ‘प्रिय प्रवास’ जैसी कृतियां उन्हें महामानव की तरह देखती हैं, पर उससे उनकी अवतारवादी आस्था में, समांतर रूप से बचे रह जाने की स्थिति में, कोई खास फर्क नहीं पड़ता। पर अब यह स्वागत-योग्य है कि काव्य-नाटक और उपन्यास जैसी मुख्यधारा की विधाएं भी इस ओर रुख कर रही हैं।

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First published on: 25-09-2022 at 04:26:07 am
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