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वक्त की नब्जः गुनहगार कौन

निवेश वही कर सकते हैं कारोबार में, जो जोखिम उठाने से नहीं डरते हैं। माल्या ने निजी एयरलाइन में निवेश किया होगा यह जानते हुए कि जोखिम उठा रहे हैं। माल्या नाकाम कारोबारी माने जा सकते हैं, अपराधी नहीं।

Author September 16, 2018 3:57 AM
उद्योगपतियों के पैसों से चलती है चुनावों की गाड़ी, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में माहौल इतना खराब हो गया है इनके लिए कि माल्या के अलावा कई छोटे और बड़े उद्योगपति देश छोड़ कर भाग गए हैं।

इस हफ्ते मैं विजय माल्या के पक्ष में बोलने जा रही हूं। इसलिए नहीं कि मेरी उनके साथ दोस्ती है। मेरा जो थोड़ा-बहुत रिश्ता रहा है माल्या के साथ, दुश्मनी का रहा है। पहली मुलाकात से ही यह दुश्मनी शुरू हुई थी। हुआ यह कि कोई पंद्रह साल पहले मैं एनडीटीवी के लिए इंडियानामा प्रोग्राम बनाया करती थी। सो, माल्या ने जब एलान किया कि ऐशो-आराम की जिंदगी त्याग कर वे चुनावी राजनीति में आने वाले हैं, तो यह सोच कर कि इंडियानामा में इस पर अच्छी स्टोरी बन सकती है, मैं बंगलुरू गई उनका इंटरव्यू करने और उनका चुनाव अभियान देखने। साथ में मेरे थे अजमल जामि नाम के मशहूर कैमरामैन। बंगलुरू पहुंचने पर मालूम हुआ कि माल्या अपना चुनाव अभियान बागलकोट से शुरू करने वाले हैं और उनके चॉपर में सिर्फ एक आदमी के लिए जगह है। तय हुआ कि जामि उनके साथ चॉपर में जाएंगे और मैं सड़क के रास्ते।

बरसात का मौसम था और चॉपर लैंड करने के बजाय मेरी आंखों के सामने क्रैश हो गया, जिसके फौरन बाद माल्या अपनी मर्सडीज वैन में सवार होकर दौड़ते हुए रवाना हुए और उनके पीछे था कोई बीस-तीस महंगी विदेशी गाड़ियों का काफिला। और मैं इस काफिले के पीछे। उनकी वैन तक पहुंचने पर देखा कि माल्या साहब अपने दोस्त अभिनेता संजय खान के साथ वोदका पी रहे थे और उनके बगल में बैठी थी उनकी प्राइवेट सेक्रेटेरी। मोटी, मगरूर, नाटी-सी उस महिला से मैंने जब पूछा कि जामि कहां है, तो उसने कहा, ‘अरे, उनकी तो दाहिनी बांह में फ्रैक्चर आ गया था चॉपर क्रैश में, सो हमारे कार्यकर्ता उनको बागलकोट के अस्पताल में ले गए हैं।’

अस्पताल क्या क्लीनिक भी नहीं था, जहां जामि को पटक आए थे। वहां जब मैं पहुंची तो मुझे डॉक्टरों ने सलाह दी कि जितनी जल्दी मरीज को बंगलुरू पहुंचाया जाए, उतना अच्छा होगा। चॉपर दूसरा आ नहीं सकता था मौसम के कारण, सो सड़क के रास्ते जाने पर हम मजबूर थे। लेकिन जब मैंने माल्या की सेक्रेटेरी से वह गाड़ी मांगी, जिसमें हमारे कैमरा और क्रू थे, तो उसने किसी नौकर के हाथ पांच हजार रुपए भेजे और बोला- टैक्सी कर लो। मैं आज तक वे रुपए उस महिला के मुंह पर फेंकने का मौका ढूंढ़ रही हूं। एक टूटी, पुरानी टैक्सी में टूटी-फूटी ग्रामीण सड़कों पर गिरते-लुढ़कते हमको हाइवे तक पहुंचने में चार घंटे लगे। माल्या ने मदद की होती, तो कम से कम जामि को तकलीफ कम हुई होती और शायद सारी रात न लगती बंगलुरू पहुंचने में। दिल्ली लौटने के बाद इस घटना और माल्या की घटिया भूमिका के बारे में मैंने खूब प्रचार किया और उनकी दुश्मनी मोल ली।

इस दुश्मनी के बावजूद आज मैं उनके पक्ष में कुछ कहने जा रही हूं। पिछले हफ्ते जब कांग्रेस अध्यक्ष ने माल्या को अपराधी कहा, तो बुरा लगा। माल्या अपराधी नहीं हैं, उनका दोष सिर्फ यह है कि उन्होंने एक निजी एयरलाइन में निवेश किया और एयरलाइन सफल नहीं हुई, सो बैंकों के पैसे डूब गए। मेरी जानकारी के मुताबिक वे बैंकों का पैसा लौटाने की कोशिश कर रहे थे और वित्तमंत्री ने अब स्पष्ट कर दिया है कि उनसे जब संसद में मिले तो माल्या ने इसका जिक्र किया और उन्होंने उनको बैंकों के साथ बात करने का सुझाव दिया था। जनता का पैसा था, सो अगर बैंकों को वापस मिलता, तो देश का भला होता। समस्या यह है कि माहौल ऐसा बन गया है कि हर उद्योगपति को हम चोर-उचक्का मानने लगे हैं, यानी माल्या अगर देश छोड़ कर भागते नहीं तो आज जेल में होते।

उद्योगपतियों के खिलाफ ऐसा माहौल आज नहीं बना है। नेहरूजी के जमाने से बना हुआ है। मगर मेरे जैसे लोग सोचते थे कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद निजी क्षेत्र को वह सम्मान मिलने लगेगा, जो मिलना चाहिए। भारत की बेहतरीन आम सेवाएं सब निजी क्षेत्र में हैं। एयरपोर्ट, एयरलाइनें, अस्पताल, स्कूल, कॉलेज और अन्य आम सेवाएं सब निजी निवेशकों ने तैयार की हैं। सरकारी सेवाओं पर ही हम निर्भर होते, तो भारत का शायद अब तक वही हाल हो गया होता, जो पूर्व सोवियत संघ का हुआ। वहां भी तय किया था कम्युनिस्ट राजनेताओं ने कि सरकार का ही अधिकार होना चाहिए धन पैदा करना देश के लिए। सरकारी अधिकारी लेकिन धन पैदा करने में अक्सर नाकाम रहते हैं।

लाइसेंस राज जब तक नहीं समाप्त हुआ था, भारतीय नौजवानों का एक ही सपना था- सरकारी नौकरी। आज फिर से उस दौर के वापस आने के संकेत मिलने लगे हैं। कुछ हफ्ते पहले जब रेलवे में नब्बे हजार नौकरियां खुलीं, तो दो करोड़ नौजवानों ने दरख्वासतें भेजीं। ऐसा न होता अगर प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया होता अपने कार्यकाल के शुरू होते ही कि निजी निवेशकों का सम्मान करना जरूरी भी है और देश के लिए लाभदायक भी। आखिर यही लोग तो पैदा कर रहे हैं वह धन, जिसे बटोर कर सरकारें अपनी समाज कल्याण सेवाएं चला रही हैं। मेरे एक पत्रकार दोस्त के शब्दों में, ‘एक करोड़ लोग होंगे इस देश में, जिनके टैक्स देने से देश चल रहा है और इन्हीं को अब चोर मानने लगे हैं।’

उद्योगपतियों के पैसों से चलती है चुनावों की गाड़ी, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में माहौल इतना खराब हो गया है इनके लिए कि माल्या के अलावा कई छोटे और बड़े उद्योगपति देश छोड़ कर भाग गए हैं। निवेश वही कर सकते हैं कारोबार में, जो जोखिम उठाने से नहीं डरते हैं। माल्या ने निजी एयरलाइन में निवेश किया होगा यह जानते हुए कि जोखिम उठा रहे हैं। माल्या नाकाम कारोबारी माने जा सकते हैं, अपराधी नहीं।

 

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