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वक्त की नब्ज: कहां है पूरा हिंदुस्तान

कोई अच्छी खबर है अगर तो यह कि जान का नुकसान भारत में कम हुआ है और अब इस महामारी का इस साल के पहले महीनों में शायद टीका भी मिल जाएगा। सो, अर्थव्यवस्था का हाल सुधर सकता है शीघ्र ही, ऐसी आशा अब जानेमाने अर्थशास्त्री करने लगे हैं।

womenअपनी मांगों को लेकर धरना देतींं महिलाएं ।

सलमान और हिंदू की जान, कहां है मेरा हिंदुस्तान? मैं उसको ढूंढ़ रहा हूं।’ जिस शायर ने ये शब्द लिखे थे वे गए साल के अंतिम सप्ताह में इस दुनिया से चल बसे। 29 जनवरी की शाम अजमल सुल्तानपुरी के देहांत के बाद उनकी यह सबसे मशहूर नज्म सोशल मीडिया पर बहुत लोगों ने याद की। शायद इसलिए कि 2020 में इन शब्दों में नए मायने नजर आए। इस कविता में कवि ने याद दिलाई उस हिंदुस्तान की, जिसमें थे ‘तुलसी और कबीर, जायसी जैसे पीर फकीर, जहां थे मोमिन, गालिब, मीर’। इस शेर ने याद दिलाया कि 2020 में इस तरह की बातें सिर्फ वे कर सकते हैं, जो ‘नए इंडिया’ में गद्दार और राष्ट्र विरोधी माने जाते हैं।

इतिहासकार जब विश्लेषण करेंगे गए वर्ष का, तो उनको सबसे महत्त्वपूर्ण परिवर्तन यही दिखेगा कि यह वह वर्ष था, जब हिंदुत्व को हथियार बना कर हमारे राजनेताओं ने उन लोगों के खिलाफ इस्तेमाल किया, जिन्होंने नरेंद्र मोदी और उनकी भारतीय जनता पार्टी के विचारों के साथ असहमति जताई। वर्ष की शुरुआत हुई थी नागरिकता कानून के विरोध से।

संशोधन इस कानून में किया गया था धार्मिक आधार पर, यह कह कर कि भारत के दरवाजे मुसलमानों के अलावा किसी भी मजहब के शरणार्थियों के लिए खुले रहेंगे। संशोधन को संसद में पारित करवाने से पहले गृहमंत्री ने देश भर में भाषण दिए कि यह केवल पहला कदम है और दूसरा कदम होगा एनआरसी (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) लाना।

भारत के मुसलमानों को इन भाषणों से लगा कि उनकी नागरिकता को खतरा है। देश भर में तिरंगा और संविधान हाथों में लिए विरोध प्रदर्शन जब करने निकले, तो उनको देशद्रोही और पाकिस्तानी कहा गया। मोदी के मंत्रियों ने ‘देश के गद्दारों को गोली मारो…’ जैसे नारे आम सभाओं में लगवाए। शाहीन बाग में जब मुसलिम महिलाओं ने ठंडी रातों और दिल्ली की कड़ाके की सर्दी में अपना प्रदर्शन जारी रखा, तो उनको किराए के जिहादी कहा गया।

साल के अंतिम दिनों में दिल्ली की सीमाओं पर जब किसानों ने घेरा डाला नए कृषि कानूनों का विरोध करने, तो उनको खालिस्तनी और आतंकवादी कहा गया। जब किसानों ने याद दिलाया कि उन्हीं के बाप-बेटे देश की सीमाओं की सुरक्षा करते हैं, तो मोदी सरकार का अहंकार टूटा और जिन मंत्रियों ने किसानों को देशद्रोही कहा था, उन्हीं को घुटने टेकने पड़े। प्रधानमंत्री जब रकाबगंज साहब गुरद्वारे में माथा टेकने गए तो उनको ग्रंथी का क्रोधित भाषण सुनना पड़ा। लेकिन भारत के नागरिकों में जो दूरियां आई हैं, उनकी हिंदुत्व नीतियों के कारण वे कम नहीं हुई हैं। बहुत लोग याद करने लगे हैं उस ‘पुराने हिंदुस्तान’ को जहां ये दूरियां नहीं थीं।

सारी दुनिया के लिए 2020 एक डरावने सपने की तरह गुजरा है, लेकिन भारत के लिए यह सपना कुछ ज्यादा डरावना रहा, इसलिए कि महामारी के आने से पहले ही अर्थव्यवस्था पर मंदी के बादल मंडराने लगे थे। महामारी के आने के बाद ये बादल और घने हो गए और गांव-गांव दिखने लगे हैं बेरोजगार युवक, जो इन दिनों कोई भी नौकरी करने को तैयार हैं। महानगरों और कस्बों, बाजारों में तो नहीं दिखते हैं बेरोजगार युवकों के झुंड, लेकिन कई दुकानें और छोटे कारोबार बंद हो गए हैं और विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक करोना ने जितना नुकसान भारत की अर्थव्यवस्था का किया है उतना शायद ही किसी दूसरे देश की अर्थव्यवस्था को हुआ है।

कोई अच्छी खबर है अगर तो यह कि जान का नुकसान भारत में कम हुआ है और अब इस महामारी का इस साल के पहले महीनों में शायद टीका भी मिल जाएगा। सो, अर्थव्यवस्था का हाल सुधर सकता है शीघ्र ही, ऐसी आशा अब जानेमाने अर्थशास्त्री करने लगे हैं। लेकिन जो राजनीतिक नुकसान हुआ है अपने देश में उसकी कीमत हमको आने वाले कई सालों में चुकानी होगी।

इसका अहसास शायद मोदी को निजी तौर पर भी होने लगा है, क्योंकि 2020 के आखिरी महीने में उन्होंने न सिर्फ मुसलमानों की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया है, सिखों की तरफ भी बढ़ाया है। अब उनके मंत्री किसानों को खालिस्तनी नहीं, ‘अन्नदाता’ कहने लगे हैं, लेकिन अब भी हिंदुत्व को हथियार बना कर मुसलमानों के खिलाफ इस्तेमाल किया जा रहा है भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों में लव जिहाद जैसे कानून पारित करके।

दरार खाईं बन गए हैं हिंदुओं और मुसलमानों के बीच और सोशल मीडिया पर मोदी के समर्थक रोज गालियां देते हैं मुसलमानों को। ऐसी नीतियों से मोदी-शाह बेशक इस साल भी चुनाव जीत सकेंगे, लेकिन क्या मोदी जानते हैं कि उनकी इस जीत में हारता है कोई तो वह है भारत? क्या जानते हैं मोदी कि अगर इस साल वे पश्चिम बंगाल जीत भी लेते हैं, तो कितना नुकसान हुआ है उस राज्य में नफरत फैलाने के कारण? क्या जानते हैं मोदी कि देश की छवि पर कितना गहरा दाग लग गया है दुनिया की नजरों में? जिस दिन, 2020 के अंतिम दिनों में, पाकिस्तान में जिहादी भीड़ ने एक मंदिर तोड़ा था, उसी दिन मध्यप्रदेश में हिंदुत्ववादियों ने एक मस्जिद पर हमला बोला था?

कभी वह समय था जब भारत को लोकतंत्र का एक चमकता सितारा मानते थे दुनियावाले और पाकिस्तान को जिहादी आतंकवाद का केंद्र? गए वर्ष में इतना कुछ बदल गया है कि अब विश्व के बड़े-बड़े राजनेता कहने लगे हैं कि हिंदुत्ववादी नीतियों ने भारत को एक हिंदू पाकिस्तान बना दिया है। अफसोस के साथ कहना पड़ेगा कि शायद हमेशा के लिए खो गया है अजमल सुल्तानपुरी का वह ‘पूरा हिंदुस्तान’। परिवर्तन का वादा किया था मोदी ने प्रधानमंत्री बनने से पहले और 2020 में इस परिवर्तन को लाकर दिखाया है।

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