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वक्त की नब्ज: महामारी के बीच सरकार

उनके बारे में कभी कहा जाता था कि शासन चलाने में वे माहिर हैं, अब दिखने लगा है कि ऐसा नहीं है। शासन की समझ होती तो तालाबंदी का फैसला लाखों प्रवासी मजदूरों को ध्यान में रख कर करते। राहत पहुंचाने का काम भी सोच-समझ कर करते, सो इतना बुरा हाल न होता अर्थव्यवस्था का, जो आज हो गया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह।

बुरे दिन सबके चल रहे हैं, यह महामारी जबसे आई है, लेकिन हमसे ज्यादा बुरे दिन देख रहे हैं इस साल हमारे प्रधानमंत्री। उनके दूसरे दौर का पहला वर्ष समाप्त होने को है और जश्न मनाने के लिए ढूंढ़ने पर नहीं मिलती है एक भी चीज। दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी के बुरे दिन शुरू हुए अरुण जेटली के देहांत के साथ पिछले वर्ष अगस्त के महीने में। उनके जाने के बाद मोदी सरकार का जैसे चेहरा ही बदल गया और सरकार की प्राथमिकताएं भी। जहां प्राथमिकताएं थीं भारत को एक आर्थिक महाशक्ति बनाने की, भारत को एक बार फिर जगतगुरु बनाने की, अचानक प्राथमिकताएं बन गईं भारत को एक हिंदू राष्ट्र की दिशा में लेकर जाने की।

इस दिशा में ले जाना आसान वैसे भी नहीं है, लेकिन इसको और कठिन बनाया गृहमंत्री अमित शाह ने ऐसे भाषण देकर, जिनमें इशारा किया गया बार-बार कि भारत के मुसलमानों को अब स्वीकार करना होगा कि उनकी जगह इस देश में हिंदुओं से कम होने वाली है। गृहमंत्री ने नागरिकता को हथियार बना कर इस्तेमाल तब शुरू किया, जब उन्होंने अवैध तरीके से आए बांग्लदेशी मुसलमानों के बारे में कहा कि ‘दीमक’ की तरह फैल गए हैं भारत में और उनको ‘चुन-चुन’ कर निकाल दिया जाएगा। साथ में यह भी कहा कि किसी भी ‘हिंदू, सिख, बौद्ध, ईसाई, जैन, पारसी’ को कोई तकलीफ नहीं होने वाली है। मुसलमानों को जानबूझ कर इस फेहरिस्त से बाहर रखने का मतलब तब समझ में आया, जब लोकसभा में नागरिकता कानून में संधोधन पारित हुआ और स्पष्ट हो गया कि भारत में पहली बार ऐसा कानून बना है, जो मजहब पर आधारित है।

सो, 2019 के आखिरी दिनों में मुसलमान निकल कर आए सड़कों पर इस नए नागरिकता कानून का विरोध करने। तिरंगा लहराते निकले, हाथ में भारत का संविधान लिए, और जब जामिया मिल्लिया में पुलिस ने घुस कर ज्यादती की छात्रों के साथ, विरोध प्रदर्शन होने लगे अन्य विश्वविद्यालों में और दिल्ली के शाहीनबाग में विरोध करने बैठ गर्इं मुसलिम महिलाएं। दिन-रात बैठी रहीं कड़ाके की ठंड में, बावजूद इसके कि भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ताओं ने उन पर आरोप लगाया कि उनको विरोध करने के लिए पैसा मिल रहा है पाकिस्तान से। बैठी रहीं ये औरतें, बावजूद इसके कि उनको गद्दार कहा गया और दिल्ली विधानसभा चुनावों में प्रचार करते समय देश के गृहमंत्री ने अपने एक भाषण में कहा कि इवीएम का बटन दबाना चाहिए इतनी जोर से कि ‘करंट’ शाहीनबाग में लगे।

दिल्ली का चुनाव बुरी तरह हार गई भाजपा। नुकसान कम करने के लिए प्रधानमंत्री ने आश्वासन दिया कि भारतीय मुसलमानों को नागरिकता कानून में संशोधन लाने से कोई खतरा नहीं है। यह भी कहा रामलीला मैदान में भाषण देते हुए कि एनसीआर या नागरिकता रजिस्टर बनाने के लिए उनकी सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया है और न उठाया जाएगा निकट भविष्य में। तब तक बहुत देर हो चुकी थी और देश के आम मुसलमानों में खौफ और गुस्सा इतना फैल चुका था कि मोदी सरकार में उनका विश्वास समाप्त हो चुका था। दिल्ली में माहौल इतना बिगड़ चुका था कि दंगे हुए ऐन उसी दिन जब अमेरिका के राष्ट्रपति के लिए राष्ट्रपति भवन में भारत सरकार दावत दे रही थी। डोनाल्ड ट्रम्प के साथ जो अमेरिकी पत्रकार आए थे उन्होंने दंगों में ज्यादा और ट्रम्प के दौरे में कम रुचि दिखाई।

नतीजा यह कि मोदी बदनाम हुए दुनिया की नजरों में। जो छवि उन्होंने अपनी बना कर रखी थी अपने पहले दौर में एक ताकतवर, लेकिन उदारवादी राजनेता की, उस छवि के टुकड़े-टुकड़े हो चुके थे इस महामारी के आने से पहले ही। ऊपर से अर्थव्यवस्था का हाल कमजोर हो चुका था। जब किसी देश में अराजकता फैलती है, निवेशक अक्सर दूर भागने की कोशिश करते हैं।

ऐसे माहौल में आई है यह महामारी और जब आई तो मोदी सरकार ने पूरे देश को चौबीस मार्च की रात को बंद कर दिया बिना यह सोचे कि शहरों में उन प्रवासी मजदूरों का क्या होगा, जिनके रोजगार और आवास के साधन उनसे एक झटके में छीन लिए गए। पहली तालाबंदी का आदेश देते समय मोदी ने कहा था कि अठारह दिन में जैसे समाप्त हुआ था महाभारत का युद्ध उसी तरह इस महामारी से युद्ध में इक्कीस दिन में विजय होगी। जब इक्कीस दिनों के बाद भी पूर्णबंदी रही, तो अपने घरों तक निकलने लगे प्रवासी मजदूर, चाहे उनको कई सौ किलोमीटर पैदल क्यों न जाना पड़े।

अब दो महीने गुजर गए हैं और कुछ रेल गाड़ियां शुरू हो गई हैं उनको घर तक ले जाने के लिए, कुछ बसें भी शुरू कर दी गई हैं, लेकिन मोदी को निजी तौर पर बहुत नुकसान हो गया है। उनके बारे में कभी कहा जाता था कि शासन चलाने में वे माहिर हैं, अब दिखने लगा है कि ऐसा नहीं है। शासन की समझ होती तो तालाबंदी का फैसला लाखों प्रवासी मजदूरों को ध्यान में रख कर करते। राहत पहुंचाने का काम भी सोच-समझ कर करते, सो इतना बुरा हाल न होता अर्थव्यवस्था का, जो आज हो गया है।

सोच-समझ कर फैसले किए होते तो तालाबंदी समाप्त करने के लिए कोई ठोस रणनीति पेश की होती उनकी सरकार ने। इसके अभाव में अब उनके मंत्री कहते फिर रहे हैं कि तालाबंदी खोलने का काम राज्य सरकारों का है, केंद्र सरकार का नहीं। लेकिन दोष दिया जा रहा है मोदी को निजी तौर पर, इसलिए कि पूर्णबंदी का आदेश उन्होंने खुद दिया था। कभी मोदी के दिन अच्छे ही अच्छे हुआ करते थे। इस साल अच्छे दिन गायब-से हो गए हैं।

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