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वक्त की नब्ज: तेरी रहबरी का सवाल है

एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने के लिए समय है इनके पास, लेकिन बेहाल मजदूरों के लिए इतना भी समय नहीं कि उनको कम से कम खाना और पानी दे सकें, जो दिल्ली और मुंबई की सड़कों और रेलवे स्टेशनों के बाहर लंबी कतारों में खड़े रहते हैं कई-कई दिन।

Migrant Labour, News in HindiLockdown में फंसे मजदूर पैदल ही अपने घरों को निकल पड़े हैं। (फाइल फोटो)

राजनेताओं की रहबरी पर सवाल उठ रहे हैं इन दिनों दुनिया भर में इस महामारी के कारण। कोविड-19 के हमाम में सब नंगे हैं। डोनाल्ड ट्रंप के बारे में कहा जा रहा है कि उन्होंने कई हफ्ते इस बीमारी के बारे में इतनी लापरवाही दिखाई कि युद्ध स्तर की तैयारी के बजाय उन्होंने कहा कि फ्लू है और फ्लू से कौन डरता है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री पर पिछले सप्ताह इल्जाम लगा कि उनके एक करीबी अधिकारी ने लॉकडाउन की पाबंदियां तोड़ कर लंबी यात्रा की, सिर्फ इसलिए कि ऐसा उल्लंघन कर सकते थे। चीन के शी जिनपिंग को तो दुनिया ने कठघरे में खड़ा कर दिया है और आरोप उन पर यह है कि जब इस महामारी के पहले आसार दिखे वुहान में, उनकी सरकर ने विश्व को सावधान करने के बजाय उन वैज्ञानिकों और चिकित्सकों को दंडित किया, जिन्होंने कहा कि एक नया विषाणु पाया गया है, जिससे पूरे विश्व को खतरा हो सकता है।

इन चीजों को ध्यान में रख कर ही आगे पढ़िए। भारत में भी गलतियां हुई हैं गंभीर किस्म की, जिनमें दो सबसे बड़ी गलतियां ये रही हैं कि इस महामारी को लेकर भारत सरकार ने इतनी लापरवाही दिखाई थी शुरू में कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के महामारी घोषित करने के दस दिन बाद दिल्ली में तबलीगी जमात के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को गृहमंत्री ने रोका नहीं। क्यों नहीं रोका, आज तक हम नहीं जानते। इसलिए सवाल अब भी उठाए जा रहे हैं।

इससे भी बड़ी गलती भारत सरकर की रही है प्रवासी मजदूरों को लेकर। पिछले हफ्ते कड़ी धूप में घंटों खड़े, भूखे-प्यासे मजदूरों ने टीवी पत्रकारों को खुल कर कहा कि उनको घर वापस जाने के लिए मोहलत और मदद मिलनी चाहिए। सही कहते हैं ये बेहाल, परेशान लोग। अन्य देशों में भी लॉकडाउन हुए हैं, लेकिन न्यूयॉर्क जैसे महानगर में जहां इस संक्रमण ने हजारों लोगों को मौत के घाट उतारा है, रेल सेवाएं रोकी नहीं गई हैं, ताकि आम शहरी को असुविधा न हो। ऐसा हम भी कर सकते थे।

समझ में नहीं आता कि हमारे शासकों ने इसके बारे में क्यों नहीं सोचा। समझ में नहीं आता कि नरेंद्र मोदी ने जब बालकनियों पर आकर लोगों को दीये जलाने का आदेश दिया था, कैसे उनके जेहन में नहीं आया कि देश के करोड़ों लोगों के घरों में बालकनियां छोड़ो, पक्की छतें भी नहीं हैं। सो, आज तक लाखों की तादाद में बेरोजगार, बेघर किए गए मजदूर इंतजार उस मदद की कर रहे हैं, जिससे वे अपने गांवों तक जा सकें। पिछले हफ्ते उस नन्हे बच्चे का वीडियो वायरल हुआ, जो अपनी मरी हुई मां के ऊपर से चादर उठा कर उसको जगाने की कोशिश कर रहा था।

ऐसी तस्वीरें इतनी सारी देखने को मिली हैं कि सर्वोच्च न्यायालय को आखिरकार पिछले हफ्ते प्रवासी मजदूरों के हाल को लेकर भारत सरकर को कठघरे में खड़ा करना ही पड़ा। कुछ सप्ताह पहले जब कई लोगों ने प्रवासी मजदूरों के हाल पर पीआइएल दर्ज किए थे तो न्यायाधीशों की राय थी कि उनको हस्तक्षेप करने की जरूरत ही नहीं है।

अब जब पानी सिर के ऊपर से निकल चुका है तो प्रधानमंत्री को बचाने के लिए उनके समर्थक कहते फिर रहे हैं कि दोष नरेंद्र मोदी का नहीं है, दोष उन मुख्यमंत्रियों का है, जिन्होंने मजदूरों को शहरों में रोक कर रखने के लिए व्यवस्था नहीं की है। कीचड़ अब इतना उछाल रहे हैं हमारे राजनेता एक-दूसरे पर कि भूल से गए हैं कि अब भी ये लाचार लोग मदद की प्रतीक्षा कर रहे हैं। भूल गए हैं कि अब भी इनको मदद की जा सकती है।

पिछले सप्ताह इंसानियत का चमकता उदाहरण बंगलुरू के राष्ट्रीय न्याय कॉलेज के छात्रों ने दिखाया, जब उन्होंने लाखों रुपए चंदा इकट्ठा करके मुंबई से रांची तक एक विमान का इंतजाम किया, जिसमें कुछ मजदूरों को घर वापस भेजा गया। झारखंड सरकार ने भी इनकी मदद की, रांची एयरपोर्ट पर बसों की व्यवस्था करके उनको अपने गांवों तक लेकर गई। अभिनेता सोनू सूद ने भी अपने पैसों से बसों की व्यवस्था की है मुंबई में, जो मजदूरों को उनके घरों तक पहुंचा रही हैं। उनके फोन पर मदद के लिए इतने दरखास्त आ रहे हैं कि उन्होंने ट्वीट करके दिखाया कि कितने आ रहे हैं ये दरखास्त। आश्वासन उन्होंने यह भी दिया है कि जब तक प्रवासी मजदूरों की समस्या समाप्त नहीं होती, तब तक वे उनकी सहायता करते रहेंगे।

इतना कुछ अगर आम नागरिक कर सकते हैं, तो सोचिए सरकारें क्या कर सकती थीं अगर करना चाहतीं? मोदी के कुछ करीबियों से मैंने जब भी इन मजदूरों के बारे में बात की, तो उनका एक ही जवाब होता है, ‘मोदी न प्रधानमंत्री होते तो हमारे देश में लोग कीड़े-मकोड़ों की तरह मरते। लाशों के ढेर लग गए होते।’ हो सकता है कि पहली पूर्णबंदी में सिर्फ चार घंटों की मोहोलत जरूरी थी। लेकिन क्या दो महीनों के बाद भी हमारे राजनेताओं के पास इन बेहाल लोगों की सहायता करने के लिए न फुरसत रही है न कम से कम इतनी हमदर्दी, जितनी आम नागरिक दिखा रहे हैं?

एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने के लिए समय है इनके पास, लेकिन बेहाल मजदूरों के लिए इतना भी समय नहीं कि उनको कम से कम खाना और पानी दे सकें, जो दिल्ली और मुंबई की सड़कों और रेलवे स्टेशनों के बाहर लंबी कतारों में खड़े रहते हैं कई-कई दिन। पूर्णबंदी का मकसद अगर था कि सोशल डिस्टेंसिंग रखी जाए, तो यह कहना जरूरी हो गया है कि इस मामले में हमारे शासक पूरी तरह नाकाम रहे हैं और इंसानियत दिखाने में भी।

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