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वक्त की नब्ज: प्रवासी की पीड़ा

इसमें दो राय नहीं कि प्रवासी मजदूरों का आज जो हाल है उसके लिए जिम्मेवार है मोदी सरकार। इनके बारे में सोचा होता उनकी सरकार ने तो कम से कम रेल सेवाएं इतनी जल्दी नहीं बंद की होतीं, पहली तालाबंदी के समय।

बच्चों के साथ यात्रा करने वाले प्रवासियों की पीड़ा। (अरविंद चौहान / ट्विटर)

पिछले हफ्ते सोनिया गांधी और उनके दोनों बच्चों ने प्रवासी मजदूरों के हाल को लेकर मोदी सरकार की कड़ी आलोचना की। सोनियाजी ने तो यहां तक कह दिया कि बंटवारे के बाद पहली बार इस देश के लोगों को इतना कष्ट उठाना पड़ा है। जो लोग गरीबी रेखा के नीचे घुट-घुट कर जीते हैं सोनियाजी, उन्होंने इस तरह जीने की आदत डाली थी उस समय जब आपके परिवार के किसी न किसी सदस्य का शासनकाल हुआ करता था। उस समय तकरीबन अस्सी फीसद ग्रामीण भारतीय जीते थे गरीबी रेखा के नीचे। यानी दो वक्त की रोटी भी मिलनी मुश्किल थी। आपके पति जब प्रधानमंत्री थे तो मैंने बंधुआ मजदूरों से मुलाकात की थी पलामू जिले में, जिन्होंने कभी पैसा नहीं देखा था। सो, मेहेरबानी करके अपने घड़ियाली आंसू अपने पास रखिए।

ऐसा कहने के बाद यह भी कहना जरूरी है कि प्रवासी मजदूरों को कई सौ कोस अपने घरों तक पैदल जाते हुए देख कर मुझे निजी तौर पर बहुत तकलीफ हुई है। पिछले हफ्ते दो तस्वीरें देखीं मैंने, जिन्हें देख कर रोना आया। एक थी उस बच्चे की, जो अपनी मां के पहियों वाले सूटकेस पर थक कर सो गया था। मां उस सूटकेस को घसीट कर चलती रही कड़ी धूप में।

दूसरी तस्वीर थी एक बहुत छोटे बच्चे की, जिसके नंगे पैरों पर बंधे हुए थे बिसलेरी बोतल के टूटे टुकड़े जूतों की जगह। इस महामारी के असली शिकार वे लोग हैं, जिनको इस हालत में लंबी यात्रा पैदल अपने घरों तक करनी पड़ी है। तीसरी पूर्णबंदी समाप्त होने को आ रही, लेकिन अब भी पैदल चलते दिख रहे हैं ये थके-हारे लोग। लानत भेजती हूं उन राजनेताओं को, जिनकी लापरवाही के कारण इस देश के सबसे मेहनती लोगों का यह हाल हुआ है।

लेकिन यह महामारी अपने साथ लेकर आई है एक बहुत महत्त्वपूर्ण संदेश और वह यह है कि सत्तर वर्षों की समाजवादी आर्थिक नीतियों के कारण ही करोड़ों गरीब भारतवासियों से उनकी इंसानियत तक छीनी गई है। राजनेताओं को छोड़ो, हम पत्रकार भी उनको इंसान नहीं मानते हैं। उनको गरीब जरूर मानते हैं, लेकिन यह भी मानते हैं कि गरीबों की सहनशीलता हमसे ज्यादा है, सो हमारे दिल क्यों दर्द से भर आएं? सहनशक्ति इतनी कि हजारों किलोमीटर पैदल जा सकते हैं अपने घरों तक।

हमारी तरह मध्यवर्गीय होते तो उनका दर्द जरूर महसूस होता। सो, जब पिछले सप्ताह नौसेना के लड़ाकू जहाज और एअर इंडिया के विमान भेजे गए उन भारतीयों को वापस लाने के लिए जो न्यूयॉर्क, लंदन और दुबई में अटके हुए थे कोविड के कारण, हमने उनकी वापसी का हर कदम दिखाया टीवी पर। वंदे भारत अभियान की डट कर प्रशंसा की और नरेंद्र मोदी के खूब गुण गाए। शर्म आनी चाहिए हमें। शर्म आनी चाहिए हमारे सारे राजनेताओं और सरकारी अधिकारियों को।

पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री ने मुझे याद दिलाया कि मैंने उनका समर्थन क्यों किया था कभी। एक ऐसा भाषण दिया, उन्होंने जिसमें उन्होंने आत्मनिर्भरता अभियान का ऐलान किया और कहा कि इस अभियान के पांच खंभे होंगे : सशक्त अर्थव्यवस्था, आधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर, आधुनिक तकनी पर आधारित शासन, हमारी ‘डेमोग्राफी’ यानी जनसांख्यिकी और हमारे लोगों की हर जरूरत को पूरी करने लायक ‘डिमांड और सप्लाई’ की व्यवस्था। इस सुंदर सपने को यथार्थ में बदलने के लिए नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर वादा किया वह परिवर्तन और विकास लाने का, जिसने उनको 2014 में पहली बार प्रधानमंत्री बनाया था।

उन दिनों वे अपने तकरीबन हर भाषण में कहा करते थे कि देश को एक नई आर्थिक दिशा में चलना होगा, जिसका लक्ष्य समृद्धि होना चाहिए, सिर्फ गरीबी हटाना नहीं। उस समय मोदी ने कई बार इशारा किया कि वे जानते हैं अच्छी तरह कि भारत को गरीब रखा है समाजवादी आर्थिक नीतियों ने।

ऐसी नीतियां, जिन्होंने गरीबों को उन औजारों से वंचित रखा है, जिनसे गरीबी हटाई जा सकती है : बेहतरीन शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं। हमारे समाजवादी राजनेताओं ने इनकी नींव तक रखने की आवश्यकता नहीं समझी, क्योंकि उनके लिए व्यवस्था शुरू से अलग रही है। उनके बच्चे पढ़ते हैं उन निजी स्कूलों में, जिनमें शिक्षा इतनी अच्छी होती है कि विदेशों में जा सकते हैं कॉलेज के लिए।

हमारे समाजवादी राजनेता जब बीमार पड़ते हैं, तो विदेश जाया करते हैं आज भी इलाज करवाने हमारे पैसों से। हमारी समाजवादी नीतियां ऐसी रही हैं, जिनसे देश का धन पैदा करने की पूरी जिम्मेदारी हमने सौंप रखी थी सरकारी अधिकारियों को। उनसे धन तो पैदा नहीं हुआ, लेकिन खुद काफी धनवान हो गए।

इस घटिया समाजवाद की जगह है कूड़ेदान में और अगर आज भी नरेंद्र मोदी ऐसा करके दिखाते हैं, तो इस महामारी से निकल कर भारत एक रोशन भविष्य की तरफ चल सकता है। इस बार मोदी को वह आर्थिक दिशा में परिवर्तन लाकर दिखाना होगा जिसका वादा उन्होंने 2014 में किया था। चले थे नई दिशा में थोड़ी दूर, लेकिन भटक गए जब उन पर ‘सूट-बूट की सरकार’ वाला ताना कसा राहुल गांधी ने। जवाब होना चाहिए था कि वे चाहते हैं कि हर भारतीय में क्षमता हो सूट-बूट खरीदने की, लेकिन ऐसा कहने के बदले वे उस पुरानी आर्थिक दिशा में चल पड़े।

इसमें दो राय नहीं कि प्रवासी मजदूरों का आज जो हाल है उसके लिए जिम्मेवार है मोदी सरकार। इनके बारे में सोचा होता उनकी सरकार ने तो कम से कम रेल सेवाएं इतनी जल्दी नहीं बंद की होतीं, पहली तालाबंदी के समय। लेकिन यह भी कहना होगा कि जो गुरबत और लाचारी हमने इन पैदल यात्रियों के थके हुए चेहरों में देखा है पिछले दिनों, उसका दोष जाता है राहुल गांधी के परिवार को, जिसने समाजवाद के नाम पर गरीबों को गरीब रखा है।

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