ताज़ा खबर
 

वक्त की नब्ज: शिक्षा और स्वास्थ्य के मोर्चे पर

माना कि बिजली, पानी, सड़क, रोजगार भी अति-महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन उन पर ध्यान थोड़ा बहुत तो दिया गया है शुरू से। अभाव रहा है स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्रों में और जब तक इन क्षेत्रों में सुधार नहीं लाए जाते हैं तब तक भारत की गाड़ी अशिक्षा और गुरबत के कीचड़ में अटकी रहेगी और देश का भविष्य रोशन नहीं दिखेगा।

Coronavirus, COVID-19, New Delhiदिल्ली में साकेत स्थित मैक्स हॉस्पिटल में बनाए गए कोरोना वैक्सिनेशन सेंटर पर शनिवार सुबह का नजारा।

दो खबरों ने ध्यान दिलाया पिछले हफ्ते कि नरेंद्र मोदी क्यों पूर्ण बहुमत हासिल करके दो बार बने हैं प्रधानमंत्री। एक, उनका अपना बयान कि राजनीति में परिवारवाद बहुत नुकसान करता है लोकतंत्र को। दूसरी खबर यह कि महाराष्ट्र के भंडारा स्थित सरकारी अस्पताल में दस नवजात बच्चे जिंदा जल गए दुनिया में अपनी पहली सांसें लेने के कुछ क्षण बाद। दोनों खबरों में वास्ता यह है कि दशकों से परिवारवाद ने हमारे सबसे पुराने राजनीतिक दल को दीमक की तरह चाट कर खोखला कर दिया था।

हाल यह हो गया था कांग्रेस पार्टी का 2014 वाले आम चुनावों के पहले कि जनता की सेवा करने के बदले इस दल के तकरीबन सारे सदस्य अपने परिवार की सेवा करने में लगे हुए थे। पंचायत से लेकर संसद तक यही हाल था। याद है मुझे कि जब घूम रही थी देहातों में चुनावी हवा परखने, तो अक्सर सरपंच मिलते थे, जो अपनी गद्दी अपने परिवार के किसी सदस्य को सौंप कर ही छोड़ते थे। संसद में अक्सर वही लोग पहुंचते थे, जिनकी मम्मी या पापा ने उनको वारिस बना कर अपना चुनाव क्षेत्र निजी जायदाद समझ कर दिया था। हां, एक और श्रेणी थी, महिलाओं की, जिनको या तो अपने पतिदेव या दिवंगत पति की जगह दी जाती थी।

जब चुनाव जीते जाते हैं सिर्फ अपने परिवार के नाम पर, तो जनता की सेवा किसको करने की जरूरत है? जनता के लिए रद्दी अस्पताल और स्कूल हों तो किस जनप्रतिनिधि को परवाह रहे जब वे अपने पापा या मम्मी के नाम पर वोट हासिल कर लेते हों? नतीजा यह कि न हमारे सरकारी अस्पतालों में वे आधुनिक सेवाएं उपलब्ध हैं, जिनसे नवजात बच्चे आग लगने से मर जाते हैं और न हमारे सरकारी स्कूलों में वह शिक्षा दी जाती है, जो दुनिया की नजरों में असली शिक्षा मानी जाती हो। विश्व बैंक के एक सर्वेक्षण से जानकारी मिली है कि भारत के पचपन प्रतिशत बच्चे अनपढ़ हैं आज भी। जो स्कूलों में पढ़ते हैं उनका भी हाल यह है।

प्रधानमंत्री मोदी का इसमें दोष सिर्फ इतना है कि उन्होंने देश की शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की तरफ इतना ध्यान नहीं दिया, जितनी आवश्यकता है। ये सेवाएं राज्य सरकारों के तहत आती हैं, लेकिन याद रखिए कि शायद ही कोई बड़ा राज्य है आज, जिसमें भारतीय जनता पार्टी का मुख्यमंत्री न हो। सो, अगर प्रधानमंत्री ने इशारा किया होता कि उनको इन सेवाओं में युद्ध स्तर पर सुधार चाहिए, तो पिछले सात सालों में ये सुधार जरूर लाए गए होते। जितना ध्यान उन्होंने स्वच्छ भारत अभियान पर दिया है उसका आधा ध्यान भी दिया होता, तो इन सेवाओं में आज परिवर्तन दिख रहा होता। कांग्रेस के लंबे शासनकाल में अगर उनके राजनेताओं की सबसे बड़ी गलतियां रही हैं तो शिक्षा और स्वास्थय क्षेत्रों में।

माना कि बिजली, पानी, सड़क, रोजगार भी अति-महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन उन पर ध्यान थोड़ा बहुत तो दिया गया है शुरू से। अभाव रहा है स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्रों में और जब तक इन क्षेत्रों में सुधार नहीं लाए जाते हैं तब तक भारत की गाड़ी अशिक्षा और गुरबत के कीचड़ में अटकी रहेगी और देश का भविष्य रोशन नहीं दिखेगा। याद कीजिए कि पिछली बार जब हमारे बच्चों ने किसी अंतरराष्ट्रीय परीक्षा में भाग लिया था, तो उनका हाल इतना शर्मनाक रहा कि किर्गिस्तान के बच्चे ही रहे उनके पीछे। हमारे शासक होशियार हैं, लेकिन उन्होंने उपाय यही ढूंढ़ा कि अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में हमारे बच्चों का हिस्सा लेना ही बंद कर दिया है।

मुझे हर हफ्ते इस लेख के छपने के बाद गांधी-नेहरू परिवार के समर्थक खूब गालियां देते हैं सोशल मीडिया पर। शिकायत है कि मेरे जैसे लोगों ने मोदी की प्रशंसा करके उनको इतना बड़ा बनाया कि वे प्रधानमंत्री बनने के लायक हुए। कहते हैं ये लोग कि गांधी परिवार से मेरी नफरत इतनी ज्यादा है कि मैंने एक ‘फासिस्ट’ के हाथों में देश की डोर देने में सहायता की। विनम्रता से कहना चाहती हूं कि राजनीतिक विश्लेषण निजी भावनाओं के आधार पर नहीं होता है। न नफरत को आधार बनाया जाता है, न प्रेम को।

ऐसा कहने के बाद लेकिन इतना जरूर मानती हंू मैं कि इस देश के करोड़ों लोगों की तरह मैं भी तंग आ गई थी ऐसे राजनेताओं से, जो अपने परिवार के भले के लिए ही आए थे राजनीति में, जनता का भला करने नहीं। इसका सबूत है कि आज भी हमारी सरकारी सेवाएं इतनी रद्दी हैं कि न राजनेता अपने बच्चे भेजते हैं सरकारी स्कूलों में और न ही हमारे आला अफसर।

रही बात सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्र्रों की, तो उनका हाल इतना खराब है कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में मैंने ऐसे अस्पताल देखे हैं, जो बनाए गए हैं सिर्फ इसलिए कि किसी भ्रष्ट अफसर या राजनेता ने उनके निर्माण से पैसे बनाए हैं। सो, इमारतें खड़ी होने के बाद उनको अपने हाल पर छोड़ दिया जाता है और देर नहीं लगती है उनके खंडर हो जाने में।

बहुत आशा थी मेरे जैसे लोगों को कि मोदी के आने के बाद इन क्षेत्रों में परिवर्तन आएगा। पर ऐसा अभी तक नहीं हुआ है। सो, बिल्कुल वैसे जैसे ये क्षेत्र बन गए थे कांग्रेस सरकारों की सबसे बड़ी कमजोरी, उसी तरह बन सकते हैं भारतीय जनता पार्टी की भी सबसे बड़ी कमजोरी।

मेरा मानना है कि मोदी दूसरी बाद प्रधानमंत्री बने इसलिए कि समाज कल्याण योजनाओं में उन्होंने परिवर्तन लाकर दिखाया। तीसरी बार उनको बनने का अधिकार इस देश के मतदाता शायद खुशी-खुशी देंगे अगर उनको सरकारी अस्पतालों और स्कूलों में परिवर्तन दिखेगा। परिवारवाद को पराजित करके दिखाया है मोदी ने, तो अब दोष किसका है?

Next Stories
1 दूसरी नजर: हर बार हैरान करते जाना
2 बाखबरः दिल्ली दर्प दलन
3 शिक्षाः अनुसंधान और आर्थिकी
ये पढ़ा क्या?
X