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वक्त की नजर- उपचुनावों के संकेत

जब मोदी ने 2014 में सबका साथ, सबका विकास का वादा किया, भारत के आम आदमी को लगा कि आखिर में उनके जीवन में परिवर्तन का समय आ गया है। अब जब चार सालों बाद ऐसा नहीं हुआ है, तो वही मायूसी का माहौल फिर से छाने लगा है, जो सोनिया-मनमोहन सरकार के आखिरी दिनों में फैल गया था।
Author February 4, 2018 08:09 am
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (फाइल फोटो)

अलवर और अजमेर से जो संदेश आया पिछले हफ्ते, उसे प्रधानमंत्री को ध्यान से सुनना चाहिए। वैसे तो दो सीटें उपचुनाव में हारना कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन जरा सुनिए, मैं क्यों इनकी अहमियत ज्यादा मानती हूं। कुछ हफ्ते पहले मैं बाड़मेर के करीब देहाती दौरे पर थी। जिन गांवों में गई, वे हाइवे से थोड़ी दूरी पर थे और दशकों से यहां के लोगों के साथ विकास के नाम पर ढोंग ही किया है राजस्थान के मुख्यमंत्रियों ने। इस बार मैं इसलिए इनको देखने गई, क्योंकि मालूम करना चाहती थी कि वसुंधरा राजे ने इतनी शानदार जीत के बाद इस राज्य के सबसे गरीब लोगों के लिए क्या किया है विकास और परिवर्तन के नाम पर। याद रहे कि लोकसभा की सारी सीटें भारतीय जनता पार्टी को मिली थीं 2014 में और विधानसभा में 199 में से 162 सीटें मिली थीं 2013 में।

इस शानदार जीत का मुख्य कारण एक और था, वह यह कि राजस्थान के मतदाताओं को नरेंद्र मोदी का परिवर्तन और विकास वाला वादा अच्छा लगा। अफसोस के साथ लेकिन कहना पड़ता है कि इस वादे को ताक पर रख कर वसुंधरा राजे ने हिंदुत्व से जुड़े मुद्दों को ज्यादा अहमियत दी है शुरू से। सो, बाड़मेर क्षेत्र के जिन गांवों का मैंने दौरा किया, वहां परिवर्तन के नाम पर कुछ नहीं हुआ है। रेतीले इलाकों में ढाणियों में रहने वाले लोगों के पास पीने का पानी तक उपलब्ध नहीं है। स्कूल इतने दूर हैं गांवों से कि बच्चे जाते नहीं हैं और उनके मां-बाप तकरीबन सारे अनपढ़ हैं। रोजगार ढूंढ़ने जाते हैं उनके पिता पचास किलोमीटर दूर पत्थरों की खानों में मजदूरी करने या फिर किसी दूर-दराज शहर में जाने पर मजबूर हैं। ऐसे गांव देखे मैंने इस दौरे में, जिनमें एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं मिला, जिसके पास सेलफोन हो। ऐसी गरीबी महाराष्ट्र के नंदुरवार क्षेत्र में भी देखी है मैंने और उत्तर प्रदेश के कई दूरदराज देहाती क्षेत्रों में भी। और जहां गई हूं वहां पाया है कि भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्रियों ने न परिवर्तन लाने की कोशिश की है और न विकास लाने के वादे पूरे हुए हैं। सो, नरेंद्र मोदी को विपक्ष नहीं हराएगा 2019 में, उनको हराएंगे उनके अपने मुख्यमंत्री। खतरे की घंटी काफी देर से बजने लगी थी, लेकिन मालूम नहीं क्यों प्रधानमंत्री निवास तक इसकी आवाज अभी नहीं पहुंची है। सो, दावोस में प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में विदेशी निवेशकों को संबोधित करते हुए यकीन दिलाने का प्रयास किया कि उनके प्रधानमंत्री बन जाने के बाद भारत का एक नया दौर शुरू हुआ है। यकीन दिलाने का प्रयास किया कि इतना बदल गया है भारत उनके आने से कि लालफीताशाही समाप्त हो गई है और लाल कालीन बिछ गया है विदेशी निवेशकों के स्वागत के लिए। ऐसा शायद हो भी गया है केंद्र सरकार के स्तर पर, लेकिन ऐसा कहना बिलकुल गलत होगा कि जिन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी का शासन है आज, वहां भी ऐसा परिवर्तन दिखने लगा है। कड़वा सच यह है कि देश के राज्यों में परिवर्तन जब तक नहीं आएगा क्रांति बन कर, तब तक भारत परिवर्तित नहीं हो सकता है।

जिन देहाती क्षेत्रों में मैं गई हूं पिछले दिनों, वहां पाया है कि मोदी की लोकप्रियता अब भी कायम है, उनकी बातों पर आम लोग आज भी विश्वास करते हैं, लेकिन साथ-साथ यह भी कहते हैं कि उनके मुख्यमंत्रियों ने कुछ नहीं किया है उनके लिए। बल्कि यहां तक कहना गलत न होगा कि भ्रष्टाचार उसी तरह आज भी है सरकारी दफ्तरों में जैसे कोंग्रेस के दौर में हुआ करता था। रही बात आम सेवाओं की, तो यहां भी कोई फर्क नहीं दिखता है भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों में। ऊपर से सत्ता का नशा न सिर्फ मुख्यमंत्रियों को चढ़ चुका है, मोदी के अपने मंत्री भी सत्ता के नशे में डूबे हुए दिखते हैं। यानी इन चीजों में परिवर्तन नहीं आया है कहीं भी। पिछले हफ्ते जिस दिन बजट पेश किया वित्तमंत्री ने उस दिन प्रधानमंत्री ने एलान किया कि उनकी सरकार गरीब भारतीयों के लिए इतने बड़े पैमाने पर स्वास्थ्य बीमा योजना तैयार कर चुकी है, जो विश्व की अपनी तरह की सबसे बड़ी योजना होगी। बड़ी अच्छी बात है प्रधानमंत्रीजी, बहुत नेक हैं आपके इरादे, लेकिन जरा जमीन पर उतर कर देखें कि अन्य नेक योजनाओं का क्या हाल है। उज्ज्वल भारत और स्वच्छ भारत योजनाओं का ऐसे गांवों में क्या असर हो सकता है, जहां पक्के मकान तक नहीं हैं, जहां पीने का पानी तक नहीं है? इन क्षेत्रों में अगर भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्रियों ने परिवर्तन लाकर दिखाया होता तो 2019 में मोदी का प्रधानमंत्री बनना तय होता। इसलिए कि ये वही क्षेत्र हैं, जहां कांग्रेस मुख्यमंत्री पिछले सत्तर वर्षों से नाकाम रहे हैं। यानी बुनियादी आम सेवाएं भारत के आम आदमी को उपलब्ध नहीं करा पाए हैं। सो, 2014 में जब मोदी ने सबका साथ, सबका विकास का वादा किया, भारत के आम आदमी को लगा कि आखिर में उनके जीवन में परिवर्तन का समय आ गया है।

अब जब चार सालों बाद ऐसा नहीं हुआ है, तो वही मायूसी का माहौल फिर से छाने लगा है, जो सोनिया-मनमोहन सरकार के आखिरी दिनों में फैल गया था।
इसलिए अलवर और अजमेर की सीटें हारने में है एक ऐसा संदेश, जो नरेंद्र मोदी को बहुत गंभीरता से लेना होगा, अगर 2019 में फिर से बनना चाहते हैं भारत के प्रधानमंत्री। जीतना है 2019 में मोदीजी आपको, तो अपने मुख्यमंत्रियों के कानों में ‘न्यू इंडिया’ का नारा ऊंची आवाज में सुनाना होगा।

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