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शांताराम : सामाजिक फिल्मकार

फिल्म कलाकार, निर्माता और निदेशक राजाराम वेंकूडरे शांताराम यानी व्ही शांताराम का जन्म कोल्हापुर में 18 नवंबर, 1901 में हुआ था। उस समय हिंदुस्तान गुलामी के के दंश..

Author नई दिल्ली | Updated: November 18, 2015 6:02 PM

फिल्म कलाकार, निर्माता और निदेशक राजाराम वेंकूडरे शांताराम यानी व्ही शांताराम का जन्म कोल्हापुर में 18 नवंबर, 1901 में हुआ था। उस समय हिंदुस्तान गुलामी के के दंश से मुक्ति पाने के लिए छटपटा रहा था। साथ ही, अपराध, जातपांत, छुआछूत, ऊंच-नीच, दहेज जैसी विभिन्न सामाजिक बुराइयां भी अपना फन फैलाए हुए थीं। भारतीय स्वतंत्रता के लिए भले ही एकजुटता दिख रही हो, लेकिन समाज में कई तरह का बिखराव भी देखने को मिल रहा था। अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति से देश की एकता और अखंडता प्रभावित हो रही थी। ऐसे समय शांताराम जैसे फिल्मकार के सामने नफा-नुकसान की सोचे बगैर समाज को एकजुट करने और उसे अपनी फिल्मों के जरिए सामाजिक विसंगतियों से मुक्ति दिलाने के लिए निरंतर प्रयासरत रहना एक बड़ी चुनौती थी। शांताराम को ऐसा करने के लिये लंबी चुनौतियों और संघर्ष के दौर से भी गुजरना पड़ा।

शांताराम को शिक्षा प्राप्त करने का अवसर नहीं मिला और उन्हें किशोरावस्था में ही सीधे रोजी-रोटी की जुगाड़ में लगना पड़ा। अपने जीवन के प्रारंभिक दौर में उन्हें रेलवे की मामूली नौकरी और फिर गंधर्व नाटक मंडली में मजदूरी करके अपना गुजारा करना पड़ा, लेकिन शांताराम महज पेट भरने के लिए पैदा नहीं हुए थे। उनके दिल और दिमाग में तो कुछ और ही चल रहा था। इस प्रकार उनकी महत्त्वाकांक्षा और देश समाज के लिए कुछ नया कर दिखाने की ललक ने उन्हें बाबूराव पेंटर की शरण में ला खड़ा किया। वे बाबूराव पेंटर की महाराष्ट्र फिल्म कंपनी में शामिल हो गए। वहीं रह कर उन्हें फिल्म निर्माण की बारीकियों का अध्ययन करने का अवसर भी मिला। और बाद में उसी कंपनी में रहते हुए प्रयोगशाला सहायक से लेकर अभिनेता बनने की उनकी इच्छा पूरी हुई। पच्चीस साल की अवस्था में उन्हें बाबूराव पेंटर की फिल्म में एक किसान की भूमिका मिली और सत्ताईस साल की उम्र में ही उन्हें अपनी पहली फिल्म ‘नेताजी पालकर’ (1927) का निर्देशन करने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ। अभिनेता के रूप मे सिंहनाद, स्त्री, परछार्इं और दो आंखें बारह हाथ जैसी फिल्मों में भी उन्होंने अपनी कला के जौहर दिखाए।

1929 में ही शांताराम ने अपने चार साथियों-वीजी दामले, केआर धाईबर, एस फतेलाल और एसबी कुलकर्णी के साथ मिलकर ‘प्रभात’ फिल्म कंपनी की स्थापना की। इस कंपनी के तहत राजा हरिश्चंद्र के जीवन पर आधारित फिल्म को उनकी पहली महत्त्वपूर्ण फिल्म का दर्जा दिया जा सकता है। इस बैनर के तले उनके निर्देशन में गोपाल कृष्ण, खूनी खंजर, रानी साहेबा और उदयकाल जैसी फिल्में भी बनीं, जो तत्कालीन फिल्मों से किसी न किसी मायने में हट कर थीं। इस बीच कुछ समय जर्मनी में रह कर उन्होंने फिल्म निर्माण की उन्नत तकनीकों को समझने में भी समय बिताया। इसके बाद उन्होंने हिंदी, मराठी और तमिल दर्शकों के लिए बेहतर तकनीक वाली अनेक फिल्मों का निर्माण किया। जर्मनी प्रवास के बाद शांताराम ने 1934 में ‘अमृत मंथन’ का निर्माण किया।

बुद्धवाद को लेकर बनी इस फिल्म में मानवीय त्याग और बलिदान का सुंदर चित्रण देखने को मिलता है। ‘अमर ज्योति’ (1934) में अन्याय के विरुद्ध एक महिला के संघर्ष का बेहतरीन फिल्मांकन किया गया है। बाद में, महिलाओं से संबंधित मुद्दों पर शांताराम द्वारा निर्देशत फिल्म ‘दुनिया न माने’ (1937) भी सभी वर्ग के दर्शकों द्वारा सराही गई।

इस फिल्म के जरिए एक ऐसी महिला का संघर्ष दिखाया गया, जिसने अपने से बड़ी उम्र के व्यक्ति से विवाह करने से इनकार कर दिया था। इस फिल्म के पार्श्व संगीत को उस समय के विशेष संगीत का दर्जा दिया जा सकता है। इससे पूर्व शांताराम ने भारतीय फिल्म के इतिहास में पहली बार फिल्म ‘संत तुकाराम’ (1936) के चलते अपनी और भारतीय फिल्म उद्योग की मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई, जिसे 1937 में वेनिस फिल्म फेस्टिवल में सम्मानित किया गया।

प्रेम कहानी और वेश्यावृत्ति पर आधारित फिल्म ‘आदमी’ (1939) को शांताराम की बेहतरीन फिल्मों में से माना जा सकता है। सांप्रदायिक उन्माद पर आधारित फिल्म ‘पड़ोसी’ (1941) के बाद उन्होंने प्रभात फिल्म कंपनी को छोड़कर 1942 में मुंबई में राजकमल कला मंदिर की स्थापना की। ‘शकुंतला’ (1943) राजकमल कला मंदिर की पहली फिल्म थी, जिसने व्यावसायिक रूप से विशेष सफलता अर्जित की। इस फिल्म ने मुंबई में लगातार दो साल चलने का रिकॉर्ड बनाया और विदेशों में भी प्रदर्शित हुई।

द्वितीय विश्व युद्ध के परिप्रेक्ष्य में अभिनेत्री पत्नी जयश्री के साथ निर्मित देशभक्ति के जज्बे से भरपूर उनकी फिल्म ‘डॉ कोटनीस की अमर कहानी’ को अपने समय की अद्भुत फिल्मों में से एक कहा जा सकता है। अपने कर्तव्य के निर्वहन में शहीद हो जाने वाले कोटनीस की, केए अब्बास के उपन्यास पर आधारित कहानी पर बनी इस फिल्म को टोरंटो में कनेडियन फिल्म प्रदर्शनी में प्रदर्शित किया गया। ‘दहेज’ (1950) में उन्होंमने जहां दहेज की समस्या को उठाया, वहीं ‘दो आँखें बारह हाथ’ (1957) में एक जेलर (स्वयं श्री शांताराम) द्वारा सजा पाए कुख्यात अपराधियों को सुधारने के लिए किए गए अनोखे व प्रेरक तरीकों का मार्मिक चित्रण देखने को मिलता है। इस फिल्म ने अभिनय, गीत, संगीत आदि अनेक दृष्टि से फिल्म को विशेष ख्याति दिलाई।

अपनी विभिन्न खूबियों के चलते राष्ट्रपति द्वारा गोल्ड मैडल पुरस्कार सहित इस फिल्म ने अनेक राश्ट्रीय व अंतर्राश्ट्रीय अवार्ड अपने नाम किए। 1955 में निर्मित श्री शांताराम की फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ को पहली टेक्नीकलर फिल्म और नृत्य के लिए विशेष जाना जाता है। इस फिल्म ने भी बाक्स आफिस पर अनेक रिकार्ड बनाए। श्री शांताराम की विभिन्न सामाजिक विषयों को लेकर बनी अन्य उल्लेखनीय फिल्मों में दो आंखें बारह हाथ (1957), नवरंग (1959), स्त्री (1961), सेहरा (1963), गीत गाया पत्थरों ने (1964) और पिंजरा (1972) का नाम लिया जा सकता है। झंजार (1986) श्री शांताराम की अंतिम फिल्म थी लेकिन यह फिल्म बाक्स आॅफिस पर बुरी तरह से फ्लाप रही। इस प्रकार से लगभग 50 के करीब फिल्मों में उन्होंने किसी न किसी रूप में जुड़कर न केवल अपनी निर्देशन, अभिनय कला के जौहर दिखाये बल्कि समाज को संदेश देते हुए अनेक ज्वलंत मुद्दों को अपनी फिल्मों का माध्यम बनाया।

फिल्मों को दिए गए अपने उल्लेखनीय योगदान के चलते 1985 में उनको दादा साहेब फाल्के अवार्ड और मरणोपरांत पद्म विभूषण अवार्ड से नवाजा गया। इनके अलावा उन्हें झनक झनक पायल बाजे, दो आंखें बारह हाथ फिल्मों के लिए अनेक राष्ट्रीय फिल्म अवार्ड भी मिले। साथ ही 1951 और 1959 में उन्हें कान फिल्म फेस्टिवल के ग्रांड प्राइज और गोल्डेन ग्लोबल अवार्ड के लिए भी मनोनीत किया गया। शांताराम का निधन 30 अक्तूबर 1990 को मुंबई में हुआ। उनके निधन से उपजा खालीपन फिल्म जगत के लिए एक बड़ी क्षति थी।

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