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संगीत-बौद्धिक संपदा में अनधिकार

हिंदी संगीत जगत की कोकिला मानी जाने वाली लता मंगेशकर के साथ भी है। उनकी आवाज को बेच कर कंपनियां करोड़ों-अरबों रुपए बना रही हैं, लेकिन उन्हें इसका छोटा-सा हिस्सा भी नहीं मिल पाता है।
Author April 9, 2017 04:17 am
प्रतीकात्मक चित्र।

संगीत की दुनिया से हमारा दिल का रिश्ता है। हम सुख में, दुख में, बोरियत में, हर समय संगीत का सहारा लेते हैं। हमें लगता है कि संगीत रचना तो शुद्ध आत्मिक आनंद का संसार होगा। लेकिन यह दुनिया इतनी सरल नहीं है। जो कुछ एक प्रोडक्ट के रूप में हमारे पास पहुंचता है, उसमें बहुत से कलाकार अलग-अलग स्तर पर शामिल होते हैं। यह एक पूरा सामूहिक उत्पादन जैसा है। हमें मालूम है कि भारतीय संगीत का विशाल बाजार हमारे देश में और देश के बाहर है। लेकिन शायद हम यह नहीं जानते कि संगीत की लोकप्रियता के बाजार से उगाहे जाने वाले धन का ज्यादातर हिस्सा इनमें से केवल कुछ लोगों को मिल पाता है।  हाल में यह सवाल बार-बार उठने लगा है कि इस सांस्कृतिक उद्योग में शामिल लोगों के बीच उत्पादित मूल्यों का बंटवारा न्यायोचित नहीं है। प्रसिद्ध संगीतकार इल्लैयाराजा ने एसपी बालसुब्रह्मण्यम पर आरोप लगाया है कि वे विदेशों में आयोजित अपने कार्यक्रमों में उनके संगीत का उपयोग तो करते हैं, लेकिन उन्हें उस आय का कोई हिस्सा नहीं मिलता है। यह मामला बौद्धिक संपदा कानून का बनता है। हालांकि, बालसुब्रह्मण्यम ने कानूनी सूचना मिलते ही इसका संतोषजनक उत्तर दिया और कहा कि भारत वापस आते ही इस विवाद को सुलझा लिया जाएगा। लेकिन इस घटना ने संगीत जगत के सामने कई सवाल खड़ा कर दिए हैं।

इसी तरह की बात हिंदी संगीत जगत की कोकिला मानी जाने वाली लता मंगेशकर के साथ भी है। उनकी आवाज को बेच कर कंपनियां करोड़ों-अरबों रुपए बना रही हैं, लेकिन उन्हें इसका छोटा-सा हिस्सा भी नहीं मिल पाता है। एक मशहूर गायिका, जिनकी आवाज ने करोड़ों हिंदुस्तानियों की भावनाओं को व्यक्त करने में सहयोग किया है, खुद एक छोटे से घर में रहती हैं। कमोबेश यही हाल अन्य संगीतकारों और गायकों का भी है। जबकि इनकी आवाज को बेचने वाली कंपनियों के मालिक आलीशान बंगालों में रहते हैं। आज के डिजिटल युग में इन कंपनियों का मुनाफा कई गुना बढ़ गया है, लेकिन उस अनुपात में कलाकारों को कुछ भी नहीं मिल पाता। पुराने जमाने में कला बाजार में बेचने की चीज नहीं थी। कलाकारों का सम्मान था। उनके लिए राजकोष से धन की व्यवथा की जाती थी। आज तो बाजार का युग है। अब कला और कलाकृति को भी बौद्धिक संपदा मान लिया गया, ताकि बाजार में उसकी कीमत तय की जा सके। कला के सृजन के लिए जो प्रोत्साहन पहले राजदरबार से मिलता था अब उम्मीद की जाने लगी है कि बाजार में मिली कीमत में कलाकारों को अच्छी हिस्सेदारी मिलेगी। इसके लिए बौद्धिक संपदा कानून बनाए गए। भारत में 1957 के कानून को बदल कर 2012 में नया कानून बनाया गया। इस कानून में संगीत के उत्पादन में लगे हर कलाकार के अधिकारों की सुरक्षा का प्रयास किया गया। यहां तक कि डिजिटल माध्यमों के कारण संगीत के बाजार में आए फैलाव का फायदा कलाकरों को मिल सके इसका भी ध्यान रखा गया।

लेकिन इल्लैयाराजा और लता मंगेशकर जैसे कलाकारों के उदाहरण से तो यही लगता है कि इस नए कानून का इन कलाकारों को कोई खास फायदा नहीं मिल पाया है। शायद इसके लिए पश्चिमी जगत की तरह ही एक विश्वसनीय संस्था की जरूरत है, जो इस उद्योग के फायदे को सही तरह से कलाकारों तक पहुंचाने में सहायता कर सके। भारत में भी साठ के दशक में संगीत और अन्य प्रदर्शन कलाओं के बौद्धिक संपदा संबंधी व्यवस्था के लिए संस्थाओं का निर्माण हुआ। उदाहरण के लिए 1969 में इंडियन परफॉर्मिंग राइट सोसायटी बनी, जिसका काम है संगीत के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े कलाकारों के बौद्धिक संपदा अधिकार की सुरक्षा करना। कला प्रदर्शनों के आयोजकों से फीस लेकर संबंधित कलाकारों को उसका हिस्सा देना। दुनिया भर में ऐसी संस्थाएं बनी हुई हैं और इन सबका आपसी संबंध है। दुनिया की सारी संस्थाएं पेरिस में स्थित इंटरनंशनल कंफेडरेशन आॅफ आॅथर्स कंपोजर सॉसाययटी से जुड़ी हैं, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कलाकारों के बौद्धिक अधिकारों की सुरक्षा करती है।

लेकिन मजे की बात यह है कि इंडियन परफॉर्मिंग राइट सोसायटी के काम से भारतीय कलाकार खुश नहीं हैं। इसका पता इस बात से चलता है कि शायद इल्लैयाराजा इस भारतीय संस्था के सदस्य होने के बदले इंग्लैंड की ऐसी ही संस्था के सदस्य हैं। भारत के लिए यह कोई नई बात नहीं है। खेल के क्षेत्र में ऐसी संस्थाओं के क्रियाकलापों से हम वाकिफ हैं। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि 2016 में दक्षिण अफ्रीकी संस्था ने लगभग दो सौ पच्चीस करोड़ रुपए कमाए, रूसी संस्था ने साढ़े पांच सौ करोड़, ब्राजील की संस्था ने 1,825 करोड़ रुपए कमाए। इनकी तुलना में भारतीय संस्था की आमदनी केवल चालीस करोड़ रुपए रही। स्पष्ट है कि कहीं कुछ गड़बड़ है। ज्ञातव्य है कि नियमों के न पालन करने के कारण इंटरनेशनल कनफेडरेशन आॅफ आॅथर्स कंपोजर सोसायटी ने 2015 में एक साल के लिए इसकी सदस्यता भी रद्द कर दी थी। इल्लैयाराजा बनाम बालसुब्रह्मण्यम विवाद ने पहली बार संगीत की इस रहस्यमयी दुनिया की झलक जनता को दी है। जरूरत इस बात की है कि 2012 के नए बौद्धिक संपदा कानून के आलोक में संगीत के कलाकारों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए एक बेहतर पारदर्शी संस्था का निर्माण किया जाए। जिसका काम कला का विकास हो न कि खेल की संस्थाओं की तरह यह भी राजनीतिकरण का शिकार हो। आज की दुनिया में भारतीय संगीत का महत्त्व बढ़ रहा है और आप उम्मीद कर सकते हैं कि आगे इसके विस्तार की गति जारी रहेगी। संगीत राष्ट्र के लिए एक तरह के सॉफ्ट पावर का काम भी करता है। संस्कृति उद्योग देश को आर्थिक योगदान भी दे सके, इसके लिए हमें एक लता या दो इल्लैयाराजा नहीं, बल्कि अनेक चाहिए होंगे। अगर उनके लिए कोई सरकारी पहल न संभव हो सके तो कम से कम इतना तो बनता है कि छोटे-बड़े कलाकारों के बौद्धिक संपदा की सुरक्षा प्रदान कर संगीत के क्षेत्र को आकर्षक बनाया जा सके, ताकि नई पीढ़ी में भी हमें लता और आशा जैसे कलाकार मिल सकें।

चलते-चलते एक और बात कर लेनी जरूरी है। बौद्धिक संपदा के अधिकार का महत्त्व पूंजीवादी आर्थिक व्यवस्था में है, जिसमें केवल व्यक्तिगत अधिकारों की बात की जाती है। लेकिन भारत जैसे देश में जहां कलाकार धड़ल्ले से समुदायों के गीतों और धुनों को चुरा लेते हैं, क्या हम उनके अधिकारों की बात भी कर सकते हैं। कला और ज्ञान व्यक्तिगत नहीं हो सकते हैं। उनके सृजन से लेकर संवर्द्धन और युगों-युगों तक सुरक्षित रखने में भी समाज का महत्त्वपूर्ण योगदान है। सवाल है कि क्या उस समुदाय को भी इसमें से कुछ दे सकते हैं, जिसकी यह बौद्धिक संपदा है। उम्मीद है कि ऐसा कुछ कर पाने की प्रक्रिया को जटिलता के नाम पर इस सवाल को टाल नहीं दिया जाएगा।

 

 

 

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