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वक्त की नब्ज: समस्याएं और भी हैं

अब उम्मीद कर सकते हैं क्या हम कि प्रधानमंत्री अतीत की समस्याओं को ताक पर रख कर वर्तमान की अति-गंभीर समस्याओं की तरफ ध्यान देंगे? ये समस्याएं इतनी गंभीर हैं और इतनी भिन्न कि शायद भगवान राम भी इनका समाधान ढूढ़ने में हमारी मदद नहीं कर सकेंगे।

भूमि पूजन के प्रति उत्साहित लोगों ने अपने घरों की बालकनी, बरामदों और छतों पर भगवान राम और हनुमान की तस्वीरों के साथ भगवा झंडे भी फहराए।

धूमधाम से पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री ने रखी नीव अयोध्या में ‘भव्य’ राम मंदिर की। मीडिया ने उनका हर कदम टीवी पर दिखाया। जैसे क्रिकेट मैच की कमेंट्री की जाती है वैसे ही हर हिंदी और अंग्रेजी समाचार चैनल ने दिन भर कमेंट्री दी। शुरू से। कुछ ही क्षणों से दिल्ली से निकलेंगे प्रधानमंत्री। अब उड़ान भर चुके हैं। अब उनका विमान लखनऊ हवाई अड्डे पर उतर चुका है। अब चॉपर में बैठ चुके हैं, अयोध्या पहुंचेंगे आधे घंटे में। फिर जब राम की नगरी के हवाई अड्डे पर उतरे नरेंद्र मोदी हल्के भगवा रंग का रेशमी धोती-कुरता पहने, तो उनके काफिले के पीछे दौड़ निकले हमारे बहादुर टीवी पत्रकार और हर मोड़ पर कमेंट्री देते रहे।

रामलला के सामने जब साष्टांग प्रणाम में दिखे प्रधानमंत्री, तो इसका भी विश्लेषण किया पूरी गंभीरता से टीवी के बड़े-बड़े पत्रकारों ने, ताकि हम दर्शकों को पूरी तरह समझ में आए इस तरह प्रणाम करने की अहमियत। फिर उनके परिक्रमा का विश्लेषण हुआ, आरती का विश्लेषण हुआ और शांत तभी हुई कमेंट्री जब प्रधानमंत्री ने मंदिर के गर्भगृह में पहुंच कर शिलापूजन शुरू किया खास मेहमानों की उपस्थिति में। पूजा की तस्वीरें दिखाई गर्इं देश भर के टीवी चैनलों पर और पूजा समाप्त होने के बाद प्रधानमंत्री का भाषण भी हमने सुना दूरदराज कस्बों-गांवों से लेकर महनगरों तक। पांच अगस्त की शाम चर्चाएं हुर्इं, जिनमें राजनीतिक दलों के प्रवक्ताओं और धर्मगुरुओं ने राम जन्मभूमि आंदोलन का हर पहलू विस्तार से समझाया।

अब उम्मीद कर सकते हैं क्या हम कि प्रधानमंत्री अतीत की समस्याओं को ताक पर रख कर वर्तमान की अति-गंभीर समस्याओं की तरफ ध्यान देंगे? ये समस्याएं इतनी गंभीर हैं और इतनी भिन्न कि शायद भगवान राम भी इनका समाधान ढूढ़ने में हमारी मदद नहीं कर सकेंगे। अब भी सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है यह महामारी। वे दिन गए, जब हमने थालियां बजा कर और दीये जला कर उम्मीद की थी, प्रधानमंत्री के कहने पर, कि इक्कीस दिन में हम कोरोना को भगा सकते हैं। वे दिन भी गए, जब ‘मोदी है तो मुमकिन है’वाले लोग सीना तान कर कहा करते थे कि मोदी न होते तो लाशों के ढेर होते सड़कों पर। अब हम जान गए हैं कि बाकी दुनिया की तरह हमको भी समय लगेगा इस महामारी से निपटने में। बल्कि यह भी जान गए हैं हम कि इस बीमारी के साथ हमको जीना सीखना होगा, क्योंकि यह कहीं नहीं जा रही है निकट भविष्य में।

महामारी आई है ऐसे समय, जब देश में गंभीर राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं का ऊंचा पहाड़ खड़ा हो गया है। पिछले सप्ताह जब प्रधानमंत्री रामलला की पूजा में व्यस्त थे, कश्मीर घाटी में दो दिन का कर्फ्यू लगा दिया गया था, ताकि देश के दुश्मन जिहादी आतंकवादी वारदात करके उस तिथि का अपने हिंसक तरीके से जश्न न मनाएं, जब अनुछेद 370 को हटाया गया था एक वर्ष पहले, और कश्मीर के दो टुकड़े कर दिए गए थे और उससे राज्य कहलाने का हक भी छीन लिया गया था। यह सब किया गया था अलगाववाद को समाप्त करने के लिए, ताकि शांति के माहौल में कश्मीर घाटी में विकास और तरक्की लाई जा सके। ऐसा होने के आसार भी नहीं दिख रहे दूर तक, बावजूद इसके कि पूरी घाटी में लाकडाउन रहा है पूरे साल।

लद्दाख ने खुशियां मनाई थी जम्मू-कश्मीर से अलग होकर, इसलिए कि पूर्व राज्य के इस प्रांत के साथ वास्तव में एक सौतेले भाई जैसा व्यवहार हुआ करता था। लेकिन अब जब सीमा पर तनाव बना हुआ है, तो लद्दाख के अच्छे दिन भी समाप्त हो चुके हैं, इसलिए कि जब तक तनाव रहता है सीमा पर, तब तक विकास की कौन बात कर सकता है। वैसे भी कोरोना ने पर्यटकों का आना बिल्कुल बंद कर दिया है और लद्दाख की अर्थव्यवस्था काफी हद तक पर्यटन पर निर्भर थी। इसलिए, ऐसा कहना कि मोदी की कश्मीर नीति सफल रही है, गलत होगा।

मोदी की आर्थिक समस्याएं और भी ज्यादा डरावनी हैं। देश भर में मंदी छाई रही है, जबसे कोरोना आया है मार्च के महीने में। कई छोटे उद्योग बिल्कुल बंद हो गए हैं और बड़ी कंपनियां भी बुरे हाल में हैं, क्योंकि उनके दफ्तरों में मुलजिम आ सकते हैं सिर्फ गिनेचुने। बेरोजगारी जितनी आज है, शायद कभी पहले नहीं हुई होगी। अभी तक भारत सरकार ने जो वादे किए थे बुनियादी ढांचे में लाखों-करोड़ों रुपए निवेश करने के, वे भी अभी तक वादे ही हैं। सरकारी राहत लोगों के पास इतनी धीरे आ रही है छोटी किश्तों में कि आम आदमी की जेब में पैसा ही अब नहीं है। सो, दुकानें खुल भी अगर गई हैं, ग्राहक इतने थोड़े आ रहे हैं कि खुलने के बाद भी मंदी चल रही है।

ये समस्याएं काफी नहीं, तो बारिश ऐसी आई है इस साल कि असम समेत पूर्वोत्तर राज्यों के कई हिस्से डूब गए हैं। यहां महाराष्ट्र में इतनी बारिश हुई पिछले हफ्ते कि मुंबई की कई सड़कें नदियां बन गर्इं और रेल सेवाएं ठप हो गर्इं। राम मंदिर का जिस दिन शिलान्यास कर रहे थे प्रधानमंत्री उस दिन तो इतनी बारिश हुई कि ऐसा लगा जैसे कभी रुकने ही वाली नहीं है। इस लेख को लिखने का मेरा एक ही मकसद है कि अगर प्रधानमंत्री अब इतिहास और अतीत को भूल कर वर्तमान समस्याओं पर अपना पूरा ध्यान नहीं देना शुरू करते हैं, तो राम भगवान भी नहीं बचा पाएंगे भारत माता को। बड़ी अच्छी बात है कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण शुरू हो गया है, लेकिन और भी समस्याएं हैं देश में बहुत सारी।

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