आदिवासी संस्कृति : आदिवासी समाज में स्त्री

आदिम समुदायों में लड़की को अपना पति चुनने की उतनी ही स्वतंत्रता होती है, जितनी लड़के को।

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एक महत्त्वपूर्ण बात कि भारत की अधिकतर आदिवासी भाषाओं में कोई स्त्री-सूचक गाली नहीं है।

आदिम समुदाय, जो सामाजिक विकास क्रम में आदिम अवस्था के अधिक निकट हैं, उनमें अब भी मातृसत्तात्मक परिवार पाए जाते हैं। जो कबीले मातृवंशीय हैं वे प्राय: मातृस्थानीय भी हैं, जहां पति परिवार का स्थायी या अस्थायी सदस्य होता है। पूर्वोत्तर के गारो कबीले में तो वह आगंतुक मात्र है, जो रात भर का मेहमान होता है। जिन मातृवंशीय और मातृस्थानीय कबीलों में मुखिया पुरुष है, उनमें भी स्त्री के अधिकारों और प्रतिष्ठा की दृष्टि से पितृवंशीय और पितृस्थानीय कबीलों की अपेक्षा इनकी स्थिति प्राय: अच्छी है। कई पितृवंशीय कबीलों में भी नर और नारी का दर्जा लगभग समान है। बहुत सारे आदिम कबीलों में विवाह विच्छेद और पुनर्विवाह का नियम है और इस संबंध से स्त्री और पुरुष को प्राय: समान अधिकार हैं। मातृस्थानीय कबीलों में परिवार अधिक स्थायी दिखाई पड़ता है। यह रक्तसंबंधियों का नैसर्गिक समूह मालूम पड़ता है। पूर्वोत्तर के अनेक आदिवासी समुदायों में विवाह के बाद युवक को प्राय: पांच वर्ष की अवधि तक ससुराल में रह कर यह सिद्ध करना पड़ता है कि वह गृहस्थी चलाने में सक्षम है।

आदिम समुदायों में लड़की को अपना पति चुनने की उतनी ही स्वतंत्रता होती है, जितनी लड़के को। सामूहिक जीवन और यौन शिक्षा के लिए ‘घोटुल’ जैसी प्रथाएं मध्य भारत के आदिवासियों में प्रचलित हैं, जहां युवक-युवती सामूहिक स्तर पर समान रूप से कुछ समय के लिए साथ-साथ जीवन गुजारते हैं। किसी कारणवश होने वाले पुनर्विवाह की दशा में भी स्त्री और पुरुष की इच्छा समान स्थान रखती है। परंपरा के स्तर पर आदिवासी समाज में दहेज प्रथा नहीं रही। यहां तो वर पक्ष द्वारा वधू पक्ष को कुछ न कुछ देना होता है। वर और वधू के बीच यहां विवाह पद्धति है, कोई ‘कन्यादान’ वगैरह नहीं होता। अगर कन्यादान कहा जाए तो साथ में ‘वरदान’ भी होता है। लड़की वालों के माथे पर लड़के वालों का कोई बोझ नहीं पड़ता।

स्त्री और पुरुष संबंधों की पड़ताल करते वक्त हमें श्रम की महिमा को समझना होगा। आदिम समुदायों में स्त्री और पुरुष दोनों समान रूप से श्रम करते हैं। स्त्री घर और बाहर के कामों में बराबर भागीदारी करती है। आदिवासी अंचलों के हाट-बाजारों में पुरुषों की तुलना में स्त्रियों की भूमिका अधिक दिखाई देती है। परिवार और कबीलाई पंचायत के स्तर पर लिए जाने वाले फैसलों में स्त्री स्वर का सम्मान किया जाता है। पुरुष के पक्ष में जो भी बदलाव हमें दिखाई देते हैं, वे सब तथाकथित मुख्यधारा समाज के प्रभाव के कारण हैं, अन्यथा आदिवासी परंपरा में ऐसा नहीं होता रहा है।

एक महत्त्वपूर्ण बात कि भारत की अधिकतर आदिवासी भाषाओं में कोई स्त्री-सूचक गाली नहीं है। हालांकि आदिम समाजों में भी गालियां हैं, मगर उनके लिए दूसरे शब्द हैं। बाप बेटे जैसे परिवार के सदस्यों के बीच झगड़ा हो जाने पर जब गुस्सा फूटता है तो एक जना पूरी तरह चुप्पी साध लेता है या घर से निकल जाता है। ‘मेरी आंखों से दूर हो जा’ या कि ‘मेरे सामने कभी नहीं आना’ जैसी प्रतिक्रिया व्यक्त कर देगा। झारखंड की खड़िया भाषा में सबसे बुरी गाली है ‘तुझे बाघ खा जाए’। इसी तरह बस्तर में ‘तुझे देवता उठा कर ले जाए’। क्रोध के उग्रतम आवेश में मारपीट या कत्ल जैसी घटनाएं भी हो सकती हैं, लेकिन स्त्री को लेकर गाली नहीं दी जाएगी।

भारत जैसे पुरुष वर्चस्ववादी गैर-आदिवासी समाज के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती है लिंगानुपात के गड़बड़ाने की। भारत के जो प्रदेश भौतिक समृद्धि और शिक्षा के क्षेत्र में सर्वोच्च स्थान रखते हैं, उनमें प्रति एक हजार पुरुषों के बीच स्त्रियों का अनुपात क्रमश: दिल्ली 866, पंजाब 893 हरियाणा 877 और चंडीगढ़ 818 है। चारों राज्यों का औसत 863.5 होता है। देश का कुल औसत एक हजार मर्दों पर 940 स्त्रियां हैं। आदिवासी बहुल प्रांतों में यह लिंगानुपात क्रमश: छत्तीसगढ़ 991, झारखंड 964, उत्तराखंड 963 और पूर्वोत्तर के आठों राज्यों का 950 है।

सामाजिक घटकों की दृष्टि से देखा जाए तो पता चलता है कि दलितों में यह अनुपात 945 का है और सवर्णों में प्रति एक हजार पुरुषों पर मात्र 937 स्त्रियां अस्तित्व में हैं। इससे भिन्न आदिवासी जनसंख्या में यह अनुपात 1000 : 990 का है। स्पष्ट है कि लिंगानुपात की दृष्टि से भारत के विकसित इलाकों और तबकों की तुलना में आदिवासी समाज बहुत बेहतर दशा में है। यहां स्वाभाविक रूप से यह संदेह और प्रश्न उत्पन्न होता है कि भौतिक उन्नति और शिक्षा जैसे विकास के प्रतिमानों का मनुष्य की समझदारी के साथ क्या सामंजस्य है?

इसी क्रम में हम महिलाओं पर किए जाने वाले अपराधों का विश्लेषण कर सकते हैं। पिछले तीन सालों में सर्वाधिक वृद्धि दिल्ली जैसे महानगरों में हुई है, जहां देश के सबसे अधिक पढ़े-लिखे और विकसित लोग निवास करते हैं। सबसे कम अपराध उन राज्यों में दर्ज हुए, जहां आदिवासी जनसंख्या की बहुलता है। महिला अत्याचारों के आंकड़ों पर दृष्टि डालें तो पता चलता है कि आदिवासी समाज की तुलना में सवर्ण या भद्र समाज में अत्याचार अधिक हैं। उल्लेखनीय है कि अंडमान के द्वीप समूहों में आदिम कबीलों की भाषिक परंपरा में ‘बलात्कार’ या ‘दुष्कर्म’ जैसे शब्दों के समानार्थी हैं ही नहीं। इससे स्पष्ट होता है कि ऐसी घटनाएं उनके समाज में घटित ही नहीं होतीं।

ऐसा नहीं कि सारे आदिम समुदाय स्त्री की दशा को लेकर दूध के धुले हैं। ऊपरी हवा यानी भूत-प्रेत, जादू-टोना, देवात्मा का किसी व्यक्ति के शरीर में आ जाना जैसी कुप्रथाओं से संबंधित खबरें देखने-सुनने को मिलती रहती हैं। स्त्री की दशा को लेकर सबसे खतरनाक डायन प्रथा मानी जाती है। इस प्रथा को पूरी तरह आदिवासी समाज से जोड़ कर देखा जाने लगा है।

भारत ही नहीं, इस प्रथा को वैश्विक संदर्भ में देखें तो ये तथ्य सामने आते हैं कि इसका अस्तित्व प्राचीन काल से संसार के अनेक भू-भागों में मिलता है। ओल्ड टेस्टामेंट में इसके लिए विधि प्रणाली तय की गई थी। कालांतर में चर्च की सहमति इस परंपरा को मिली थी। प्राचीन मध्य अफ्रीका, मिस्र, बेबीलोन के जीवन में इसके संदर्भ मिलते हैं। भारत में शाकिनी, डाकिनी, चुड़ैल और डायन जैसी संज्ञाएं इस परंपरा को दी गर्इं। वात्स्यायन के कामसूत्र में शाकिनी का जिक्र मिलता है। भगवान शिव के पौराणिक संदर्भों में शाकिनी, डाकिनी, पिशाचिनी, भैरवी, चंडिका, जोगिनी आदि नाम शक्ति की उपासना से संबंधित हैं। बौद्ध और जैन ग्रंथों में भी शकुनिका के नाम से स्त्री संबंधी इस मिथक को स्थान दिया गया है। इस तरह केवल भारत के आदिवासियों तक सीमित कर के इस इस प्रथा को नहीं देखा जाना चाहिए।

स्त्रियां नन्ही बालिकाएं हुआ करती हैं। उनके कंधों पर पंख होते हैं। उन्हें उड़ने दो। उनके चेहरे पर हंसी होती है। उन्हें चहकने दो। स्त्रियां युवतियां हुआ करती हैं। उनकी गति में नृत्य और वाणी में गीत हुआ करते हैं। उन्हें नाचने और गाने दो। स्त्रियां पुरुष की हमसफर हुआ करती हैं। उन्हें साथी होने का सम्मान दो। स्त्रियां मानव प्रजाति के वंशों को जन्म देती हैं, इसलिए वे माताएं हुआ करती हैं। उन्हें गरिमा के साथ जीने दो। स्त्रियों को अप्सरा, गणिका, देवदासी, वेश्या, सती, कुलक्षणा, वैधव्य-कलंकिनी वगैरह पुरुषों ने बनाया है, स्वयं स्त्रियों ने नहीं। सही कहा है सिमोन द बोउआ ने कि ‘स्त्री पैदा नहीं होती, उसे स्त्री बनाया जाता है।’ पुरुषों को ऐसी असंभव इच्छा नहीं करनी चाहिए कि स्त्री को सत्रह साल की पैदा होना चाहिए और हद से हद पैंतीस वर्ष की होने पर मर जाना चाहिए।

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