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मुद्दा: भूख बनाम भोजन की बर्बादी

अन्न की बर्बादी पर लगाम लगाने की हमारी व्यक्तिगत जिम्मेदारी तो है ही, इस संवेदनशील मामले पर सरकार को नियम बनाने की जरूरत है। गौरतलब है कि फ्रांस में एक नए नियम के तहत खाना फेंकने पर प्रतिबंध लगाया गया है।

Author October 14, 2018 2:24 AM
जिस देश में कुपोषण और भुखमरी के आंकड़े डराने वाले हों, वहां दिखावे के नाम पर भोजन की बर्बादी वाकई दुर्भाग्यपूर्ण है।

मोनिका शर्मा

भोजन पर सबका अधिकार है। ऐसे में अन्न का हर दाना, जो किसी को जीवनदान दे सकता है, उसका व्यर्थ जाना अन्न का ही नहीं, इंसानियत का भी अपमान है। भारतीय संस्कृति में अन्न को ब्रह्म कहा गया है। ‘अन्न ब्रह्म’ कहते हुए इसे एक पावन सोच से जोड़ा गया है। शायद इसलिए मन, जीवन को ऊर्जा देने वाले अन्न को सहेजने की हिदायत भी हमारे संस्कारों का हिस्सा रही है। परंपरागत रूप से देखा जाए तो हमारे यहां भोजन का अर्थ केवल पेट भर लेना नहीं माना गया है। हमारे यहां अन्न को सम्मान देने की रीत और व्यर्थ न करने की सीख बचपन से दी जाती है। इसीलिए थाली में जूठन छोड़ना भी अन्न का अपमान माना जाता है। लेकिन देखने में आता है कि घरों में ही नहीं, शादी समारोहों में भी जूठन के रूप में खाने की खूब बर्बादी होती है। बदलती जीवनशैली और दिखावे की सोच ने इस बर्बादी को और बढ़ा दिया है।

जिस देश में कुपोषण और भुखमरी के आंकड़े डराने वाले हों, वहां दिखावे के नाम पर भोजन की बर्बादी वाकई दुर्भाग्यपूर्ण है। हम अक्सर भूल जाते हैं कि खाना कितना कीमती है? अब न केवल वे संस्कार गुम हो गए लगते हैं, बल्कि बदलते माहौल में दिखावे की संस्कृति ने अन्न की बर्बादी में और इजाफा कर दिया है। रुतबा दिखाने के नाम पर अब छोटे-छोटे समरोहों में भी कई व्यंजन परोसे जाते हैं। यह प्रवृत्ति आम हो चली है कि शादी ब्याह जैसे सामाजिक समारोहों में खाने-पीने के सामान की फेहरिस्त बढ़ा कर अपनी हैसियत दिखाई जाए। वैवाहिक समारोहों में तो हमारे यहां खाने की जम कर बर्बादी होती ही है।

खाद्य मंत्रालय के एक अध्ययन के मुताबिक शादी जैसे समारोह में बनने वाले खाने का बीस फीसद हिस्सा बर्बाद हो जाता है। विडंबना देखिए कि अन्न की यह बर्बादी साल-दर-साल बढ़ रही है। जबकि बीते कुछ सालों में शिक्षा का स्तर बढ़ा है। लोगों में कुपोषण, भुखमरी और अनाज उगाने में किसान के सामने आने वाली समस्याओं को लेकर जागरूकता बढ़ी है। बावजूद इसके सभ्य और पढ़े-लिखे तबकों में भी भोजन को लेकर संवेदनशीलता नहीं दिखती। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अकेले राजधानी दिल्ली में हर रोज 384 टन जूठन फेंकी जाती है। बंगुलुरु पर किए गए अध्ययन के मुताबिक हर साल शहर में केवल विवाहों के दौरान साढ़े नौ सौ टन खाद्यान्न बर्बाद होता है। ऐसे में जिस अन्न को उपजाने में समय और श्रम दोनों लगता है, उसका यों कूड़े में फेंका जाना हम सबके लिए विचारणीय है। लेकिन समारोह हों या घरेलू आयोजन, खुशियों के धूम-धड़ाके में हम सब अपनी इस नैतिक जिम्मेदारी को भूल जाते हैं।

संयुक्त राष्ट्र के एक अध्ययन में सामने आया है कि दुनिया के जिन महानगरों में जूठन सबसे ज्यादा फेंका जाता है, उनमें भारत के दिल्ली और कोलकाता भी शामिल हैं। आज दुनिया भर में 1.3 अरब टन खाने की किसी न किसी कारण बर्बादी होती है। यह इंसानों की जरूरत के लिए तैयार किए गए कुल भोजन का लगभग एक तिहाई हिस्सा है। हर अमेरिकी सालाना एक सौ पंद्रह किलो खाने की चीजें फेंकता है और यूरोपीय अस्सी किलो। जर्मनी में ही औसतन हर व्यक्ति साल में तीन सौ यूरो का सामान कूड़े में फेंक देता है। सचमुच, कुछ लोगों का भूखे पेट सोना और खाने का कचरे में फेंका जाना, कैसा विरोधभासी व्यवहार है?

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन ‘एएफओ’ की रिपोर्ट ‘द स्टेट ऑफ फूड इनसिक्युरिटी इन द वर्ल्ड 2015’ के मुताबिक भारत में 19.4 करोड़ लोग भुखमरी के शिकार हैं। यह विचारणीय और चिंतनीय है कि खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर होकर भी हमारे देश में भूख से जूझ रहे लोगों की संख्या चीन से भी ज्यादा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत ने अपनी जनसंख्या में भोजन से वंचित लोगों की संख्या घटाने में महत्त्वपूर्ण प्रयास किए हैं, लेकिन एफएओ के अनुसार अब भी बड़ी आबादी भूखे सोने को मजबूर है। निस्संदेह, इसकी एक बड़ी वजह हर स्तर पर होने वाली अन्न की बर्बादी है। हमारे यहां हर साल करोड़ों टन अनाज बर्बाद होता है। कभी खाद्यान्न भंडारण की सही व्यवस्था के अभाव में, तो कभी सामाजिक-पारिवारिक समारोहों की दिखावा संस्कृति के चलते।

असल में देखा जाए तो कूड़े में फेंका गया खाना और दुनिया के सात लोगों में से एक का हर रोज भूखे सोना, इस दिखावे की होड़ से दूरी बनाने की सीख देने को काफी है। अन्न की बर्बादी पर लगाम लगाने की हमारी व्यक्तिगत जिम्मेदारी तो है ही, इस संवेदनशील मामले पर सरकार को नियम बनाने की जरूरत है। गौरतलब है कि फ्रांस में एक नए नियम के तहत खाना फेंकने पर प्रतिबंध लगाया गया है। ‘फूड डंपिंग’ की समस्या से निपटने के लिए वहां यह नया नियम लागू किया गया है। इस नियम के तहत सभी फूड मार्केट अपने यहां बचे हुए भोजन को जानवरों या खाद के लिए दान देंगे। फ्रांस सरकार को उम्मीद है कि इस नियम से 2025 तक खाद्यान्न बर्बादी की आधी समस्या हल हो जाएगी।

आमतौर पर भोजन की सबसे अधिक बर्बादी सामाजिक समारोहों में होती है। इस मामले में हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान का ‘वन-डिश’ कानून भी सराहनीय है। वहां शादी समारोहों में एक ही व्यंजन बनाने रीत है। इसे दिखावा न करने और खाने की बर्बादी रोकने की सकारात्मक पहल माना जा सकता है। हमारे देश में भी इस दिशा में कुछ स्वयंसेवी संस्थाएं आगे आई हैं, जिन्होंने विभिन्न पार्टियों-समारोहों आदि में बचे हुए स्वच्छ अन्न को वैज्ञानिक ढंग से रेफ्रीजरेटेड पात्रों में एकत्रित करके जरूरतमंदों तक पहुंचाने की अच्छी पहल की है। ये संगठन आयोजनों में बचे हुए खाने को इकठ्ठा कर उसे जरूरतमंदों को खिलाते हैं। देश के बीस शहरों में कार्यरत ‘फीडिंग इंडिया’ एक ऐसा ही संगठन है, जिसकी चौबीसों घंटे चलने वाली हेल्पलाइन सेवा पर संपर्क कर बचे हुए भोजन का दान किया जा सकता है। यह खाना जरूरतमंदों तक पहुंचाया जाता है।

इसी तरह मुंबई में डिब्बेवालों ने भी रोटी बैंक की शुरुआत की है, जिसमें बचे हुए खाने को गरीब भूखे लोगों तक पहुंचाया जाता है। टाटा कन्सल्टेन्सी सविर्सेज ने एक अनोखा कदम उठाया और अपने कर्मचारियों को एक बोर्ड पर लिख कर रोज खाने की बर्बादी के बारे में चेताया। ऐसा ही विचारणीय कदम स्विट्जरलैंड के बड़े होटल ने भी उठाया है। यहां खाने की मेज के इर्द-गिर्द कुपोषण और भूख से जूझ रहे बच्चों की तस्वीरें लगाई गई हैं। इन तस्वीरों के साथ संदेश भी लिखा है कि ‘प्यारे मेहमानो, नैतिक कारणों से हम स्विट्जरलैंड में खाना फेंकते नहीं हैं, कृपया अपनी थाली में वही भोजन डालें जो आप खाते हैं। निस्संदेह, अन्न के हर दाने को सहेजने के प्रयास हर स्तर पर जरूरी हैं। भारत में भी जरूरी है कि हम फिर अपनी परंपराओं का चिंतन करें और अपनी आदतों में सुधार लाएं। दिखावे की जीवनशैली के फेर में अनाज बर्बाद न करें।

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