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मान्यता की मुश्किल

सवाल है कि भारत जैसे देश में इच्छा-मृत्यु के मसले पर सामाजिक धारणा क्या रही है! ऐसे मामले आम हैं, जिनमें किसी बीमार व्यक्ति की निश्चित मृत्यु के बावजूद उनके परिजन अंतिम समय यानी मौत होने तक हर संभव इलाज या देखभाल सुनिश्चित करते हैं। यहां यथार्थ और तथ्य के बावजूद भावनात्मक संबंध कई बार भारी पड़ते हैं।

Author March 18, 2018 4:07 AM
इच्छा-मृत्यु यानी यूथेनेशिया मूलत: ग्रीक शब्द है, जिसका अर्थ अच्छी मृत्यु होने से लगाया जाता है।

प्रभुनाथ शुक्ल

हाल ही में भारत की सर्वोच्च अदालत ने दया-मृत्यु यानी इच्छा-मृत्यु पर अपना अहम और ऐतिहासिक फैसला सुनाया और सरकार से इस विषय पर कानून बनाने को कहा है। भारत में कई सालों से यह लड़ाई लड़ी जा रही थी। फरवरी 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मसले पर दायर एक याचिका को संविधान पीठ में भेज दिया था, जिसमें ऐसे बीमार व्यक्ति की बात थी, जिसके बचने की संभावना नहीं थी। बिहार में पटना के निवासी तारकेश्वर सिन्हा ने 2005 में राज्यपाल को याचिका दी कि उनकी पत्नी कंचनदेवी सन 2000 से बेहोश हैं और उन्हें दया-मृत्यु देने की अनुमति दी जाए। यों मुंबई की नर्स अरुणा शानबाग की मौत के बाद देश में इस तरह की मांग तेज हो चली थी। कई संगठन लंबे समय से यूथनेशिया यानी इच्छा-मृत्यु को सरकार से कानूनी दर्जा देने की मांग करते आ रहे थे। लेकिन सरकार इस पक्ष में नहीं थी। इच्छा-मृत्यु का मतलब किसी गंभीर और लाइलाज बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को दर्द से मुक्ति दिलाने के लिए डॉक्टर की सहायता से उसके जीवन का अंत करना होता है। स्वाभाविक रूप से भारत जैसे सहिष्णु और धार्मिक मान्यता वाले देश में इस पर सहज अनुमति नामुमकिन थी, लेकिन अदालत के आदेश के बाद सरकार की राह आसान हो गई है। लेकिन सवाल उठता है कि इस मसले पर अगले कदम क्या होंगे! इच्छा-मृत्यु यानी यूथेनेशिया मूलत: ग्रीक शब्द है, जिसका अर्थ अच्छी मृत्यु होने से लगाया जाता है। इससे पहले भी इच्छा-मृत्यु या ‘मर्सी किलिंग’ दुनिया भर में बहस का मसला बना है। कई मुल्कों में इसे कानूनी मान्यता मिल गई है, जबकि कई देश इस तरह के कानून बनाए जाने के खिलाफ हैं। उनका मानना है कि यह मानवीयता और इंसानी उसूलों के खिलाफ है। जिसे हम जिंदगी दे नहीं सकते तो उसे मौत देने का अधिकार हमें कैसे है!

दुनिया के सबसे विकसित देश अमेरिका में इच्छा-मृत्यु गैरकानूनी है। लेकिन वाशिंगटन और मोंटाना राज्यों में डॉक्टर की सलाह और उसकी मदद से मरने की इजाजत है।स्विट्जरलैंड में जहरीली सुई के जरिए आत्महत्या की इजाजत है, हालांकि तकनीकी रूप से यहां भी इच्छा-मृत्यु गैरकानूनी है। नीदरलैंड में डॉक्टरों के हाथों सक्रिय इच्छा-मृत्यु और मरीज की मर्जी से दी जाने वाली मृत्यु की अनुमति है। बेल्जियम में 2002 में इस प्रकार की मृत्यु को वैधानिक मान्यता मिली। लेकिन ब्रिटेन, स्पेन, फ्रांस और इटली जैसे यूरोपीय देशों सहित दुनिया के ज्यादातर देशों में इच्छा-मृत्यु आज भी गैर-कानूनी है। भारत जैसे भावनात्मक संबंधों पर आधारित समाज और धार्मिक मान्यताओं वाले देश में इच्छा-मृत्यु को कानूनी मान्यता सवालों के घेरे में रही। हालांकि जैन धर्मावलंबियों में संथारा की प्रथा को एक तरह से इच्छा-मृत्यु ही कहा जा सकता है। पारंपरिक कथाओं में इससे मिलते-जुलते कई उदाहरण मिल जाते हैं। यों न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने इस विषय पर अपना मत रखते हुए कहा कि जीवन और मृत्यु को अलग नहीं किया जा सकता है। हर क्षण हमारे शरीर में बदलाव होता है और बदलाव एक नियम है। लेकिन अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 का इस्तेमाल कर यह फैसला लिया, जिसमें कहा गया कि जीने के अधिकार में गरिमा से मरने का अधिकार भी शामिल है। इच्छा-मृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों के संविधान पीठ ने फैसला सुनाया और इससे संबंधित सुरक्षा उपायों के लिए दिशा-निर्देश जारी किए। इसके मुताबिक अगर किसी व्यक्ति को दया-मौत चाहिए तो उसके परिवार या करीबी लोग उच्च न्यायालय जाएंगे। इसके बाद अदालत के आदेश पर मेडिकल बोर्ड गठित होगा और वही यह तय करेगा कि संबंधित व्यक्ति के लिए पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छा-मृत्यु की जरूरत है या नहीं। यह व्यवस्था कानून बनने तक वैकल्पिक होगी, लेकिन कानून के आने के बाद यह प्रक्रिया उसी पर आधारित होगी। हालांकि संविधान पीठ ने यह साफ किया कि हम यह नहीं कहते कि जीने के अधिकार में गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार भी शामिल है, लेकिन गरिमापूर्ण मृत्यु पीड़ारहित होनी चाहिए। जीवन और मौत के बीच संघर्ष कर रहे व्यक्ति को इस प्रक्रिया के दौरान कोई पीड़ा नहीं होनी चाहिए। फैसले में मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा कि इच्छा-मृत्यु के लिए वसीयत मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज हो, जिसमें दो स्वतंत्र गवाह भी हों। इसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। हालांकि अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि जब सम्मान से जीने के अधिकार को स्वीकार किया जाता है तब फिर सम्मान के साथ मरने के अधिकार को भी क्यों नहीं माना जाए!

सवाल है कि भारत जैसे देश में इच्छा-मृत्यु के मसले पर सामाजिक धारणा क्या रही है! ऐसे मामले आम हैं, जिनमें किसी बीमार व्यक्ति की निश्चित मृत्यु के बावजूद उनके परिजन अंतिम समय यानी मौत होने तक हर संभव इलाज या देखभाल सुनिश्चित करते हैं। यहां यथार्थ और तथ्य के बावजूद भावनात्मक संबंध कई बार भारी पड़ते हैं। दरअसल, हमारे यहां परिवारों का ढांचा और संस्कृति जैसी रही है, उसमें संबंधों के भावनात्मक आधार का मजबूत होना लाजिमी है। दूसरी ओर, संपत्ति और संबंध में कई बार भावनाओं की यही बुनियाद नकारात्मक रुख अख्तियार कर लेती है। ऐसे में इच्छा-मृत्यु की कानूनी इजाजत के बाद उसके दुरुपयोग को लेकर आशंकाएं भी स्वाभाविक हैं। शायद इन्हीं वजहों से सरकार का कहना है कि वह इच्छा-मृत्यु के सारे पहलुओं पर गौर कर रही है। दरअसल, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ में इच्छा-मृत्यु को कानूनी दर्जा देने का विरोध किया था। लेकिन बाद में इसे मंजूरी देते हुए कहा कि इसके लिए कुछ सुरक्षा मानकों के साथ विधेयक का प्रारूप तैयार है। सरकार का कहना था कि जिसमें मरीज कहे कि वह अब जीने के लिए चिकित्सकीय सहायता नहीं चाहता, उसे मंजूर नहीं किया जा सकता। भारत में इच्छा-मृत्यु और दया-मृत्यु दोनों ही अवैधानिक कृत्य हैं। यह भारतीय दंड विधान यानी आइपीसी की धारा 309 के अंतर्गत आत्महत्या का अपराध है।

ताजा मसले में याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण की तरफ से कहा गया कि अगर ऐसी स्थिति आ गई कि व्यक्ति बिना सहायक प्रणाली के जीवित नहीं रह सकता तो ऐसे में डॉक्टरों की एक टीम का गठन किया जाना चाहिए जो यह तय करे कि बिना जीवन रक्षक प्रणाली के वह व्यक्ति बच सकता है या नहीं। उन्होंने अदालत के सामने अपनी बात रखते हुए कहा कि यह उस व्यक्ति का अधिकार है कि वह कृत्रिम जीवन रक्षक प्रणाली की सहायता लेना चाहता है या नहीं। अदालत के फैसले के वाजिब आधार होंगे और अब भारत में इसे कानूनी मान्यता भी मिल जाएगी। इसके बावजूद इस मसले पर व्यक्ति चाहे कितनी भी गंभीर बीमारी से ग्रस्त और पीड़ा में क्यों न हो, इच्छा-मृत्यु को सामाजिक मान्यता और स्वीकारोक्ति मिलने में अभी बहुत वक्त लगेगा। जहां मौत के बाद भी जीव की मुक्ति को लेकर धर्म और आस्था से जुड़ी कई धारणाएं हैं, अपने शत्रुओं को भी जीवनदान का इतिहास रहा है, वहां इस मसले पर सामाजिक स्वीकृति मिलना सहज नहीं होगा। इसके अलावा, आए दिन दूसरे कई कानूनों के दुरुपयोग की खबरें आती रहती हैं, इसलिए यह भी देखना होगा कि इस मसले पर बनने वाले कानून की आड़ में कुछ लोग अपना स्वार्थ न साधने लगें। अगर ऐसा हुआ तो इच्छा-मृत्यु को कानूनी दर्जे के सवाल पर पूरी मानवीयता कठघरे में खड़ी होगी।

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