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जनसत्ता चर्चा: संस्कृत से युगांतर संभव

पिछले कुछ समय से एक बार फिर संस्कृत भाषा को प्रतिष्ठा दिलाने पर जोर है। संसद में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय विधेयक पारित होने से इस दिशा में कुछ बेहतरी की उम्मीद जगी है। संस्कृत को लेकर कई लोगों का विश्वास है कि इसमें बदलती जरूरतों के मुताबिक खुद को ढालने की असीम संभावनाएं हैं। पर बहुत सारे लोग इसे ज्ञान-विज्ञान की प्रगति और रोजगार सृजन के पैमाने पर काफी कमजोर मानते हैं। एक भाषा और संस्कृति की संवाहक के तौर पर संस्कृत के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता, पर नई स्थितियों में उसकी क्या जगह है, इस बार की चर्चा इसी पर। - संपादक

Author Published on: March 29, 2020 3:19 AM
संस्कृत भाषा विश्व की प्राचीनतम भाषा है। इससे कई अन्य भाषाएं निकली हैं।

राधावल्लभ त्रिपाठी
अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जब भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी जड़ें जमाईं, तो प्राच्यविद्या के नाम से ज्ञान के एक नए विषय का भी विकास हुआ। यह विषय संस्कृत और उसके साहित्य पर विशेष रूप से केंद्रित था। चार्ल्स विल्किंस ने, जो वारेन हेस्टिंग्स के मातहत एक अधिकारी थे, बनारस में जाकर संस्कृत पढ़ी, उन्होंने गीता का अंग्रेजी अनुवाद किया, जो 1785 में छपा। विलियम जोंस 1784 में भारत आए, उन्होंने कालिदास के अभिज्ञानशाकुंतल और मनुस्मृति का अनुवाद किया। इसके कुछ समय बाद मैक्समूलर से चालीस वर्षों के अथक परिश्रम से विश्वसाहित्य की पहली पुस्तक ऋग्वेद का पहला प्रामाणिक संस्करण प्रकाशित किया। इन विद्वानों के कार्यों से दुनिया में भारत की छवि बदल गई, यूरोप के दार्शनिक और साहित्यप्रेमी चौंके, भारत में भी नवजागरण की लहर को प्राच्यविद्या के तहत हुए काम से बढ़ावा मिला। पर विलियम जोंस और चार्ल्स विल्किंस से लगा कर बीसवीं शताब्दी के शुरुआती दशकों तक यूरोप और अमेरिका के संस्कृत और उसके साहित्य की अतीत की वस्तु के रूप में पंडितों ने ऐसी उज्ज्वल गरिमामयी छवि गढ़ी, जिसके आगे सारा संसार माथा झुकाए। पर इन पंडितों की संस्कृत की समकालीनता और उसमें उनकी आंखों के सामने हो रही हलचल को लेकर कोई रुचि नहीं थी।

ये विदेशी पंडितजन जब संस्कृत को अजायबघर की वस्तु के रूप में दुनिया के सामने परोस रहे थे, उस समय संस्कृत में बड़ी मात्रा में नया साहित्य रचा जा रहा था, सैकड़ों पत्रिकाएं संस्कृत में छप रही थीं, जिनमें अंग्रेजी शासन के विरोध में लेख छप रहे थे, संस्कृत में क्रांतिगीत लिखे जा रहे थे। संस्कृत की समकालीनता पर इन विद्वानों का मौन उपनिवेशवादी साजिश का एक हिस्सा था। आजादी के बाद हमें उनके द्वारा गढ़ी हुई संस्कृत की देवमंदिर में स्थापित प्रतिमा जैसी छवि से मुक्त हो जाना चाहिए था। दुर्भाग्य से आजादी के बाद संस्कृत के ही भारतीय पंडितों, शिक्षाविदों और हमारी सरकारों ने इस प्रतिमा पर फूलमाला चढ़ा-चढ़ा कर संस्कृत के विषय में उपनिवेशवादी धारणाओं की जड़ें लगातार सीचीं हैं।

नतीजन बड़े पैमाने पर समाज में यह गलत धारणा रूढ़ होती गई है कि संस्कृत भाषा और उसका साहित्य हमारी विरासत तो है, हमारा वर्तमान और भविष्य नहीं। यह मान लिया गया है कि संस्कृत अपनी ऐतिहासिक भूमिका का निर्वाह कर चुकी, वह अजायबघर की तरह अब हमारे अतीत का हिस्सा है। यह कहना भी कई तबकों में प्रगतिशीलता का चिह्न हो जाता है कि संस्कृत लुप्त होती जा रही है, या हो चुकी; उसका साहित्य और उससे संवलित परंपराएं छीज चुकी हैं, उनकी संभावनाएं नि:शेष हो गई हैं, विश्वसंस्कृति के विकास में संस्कृत पहले जितना कर सकती थी, कर चुकी, अब उसकी भूमिका स्थानांतरित हो गई है। संस्कृत को एक ऐसी बूढी दादी मां बना दिया गया है, जो खंडहर हो चुके पुराने किसी महल में विराजमान है और आदरणीय ही रह गई है। संस्कृत अक्सर एक खिलखिलाती लड़ती-झगड़ती तेज-तर्रार लड़की के रूप में भी हमारे समय में सामने आ जाती है, तो उसे उसी तरह नकार दिया जाता है, जिस तरह अंग्रेजी राज में नकार दिया जाता था।

शेल्डन पोलक प्रखर अध्येता, विचारक और संस्कृत के इस समय सर्वाधिक अधीती पंडितों में से एक हैं। उन्होंने अपने ‘डेथ आफ संस्कृत’ शीर्षक विस्तृत लेख में बताया है कि संस्कृत बारहवीं शताब्दी के बाद से तीन बार मरी, एक बार कश्मीर में विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा किए गए ध्वंस के समय, दूसरी बार विजयनगर साम्राज्य के अस्त होते समय, तीसरी बार मुगल साम्राज्य के अवसान के समय। तीसरी बार मर कर वह फिर नहीं जी पाई। पर संस्कृत ने शेल्डन की निष्पत्तियों को गलत साबित किया है। संस्कृत हर बार अपने ध्वंसावशेष से अपने को और भी उज्ज्वल रूप में नया बनाती रही है। उसका कम से कम पिछले पांच हजार वर्षों का इतिहास यही प्रमाणित करता है।

संस्कृत में विद्यमान ज्ञान और विज्ञान के वांग्मय तथा ललित वांग्मय के विकास का इतिहास चार युगों में बांटा जा सकता है। वैदिक काल से लेकर 1000 ईपू तक का समय उसका उद्भवकाल है। ईसा पूर्व की पहली सहस्राब्दी इन संभावनाओं के प्रस्फुटन का और ईसा के बाद की पहली सहस्राब्दी इनके विकास और अभ्युदय का काल है। ग्यारहवीं शताब्दी से बीसवीं शताब्दी तक की दूसरी सहस्राब्दी को संस्कृत के विस्तार और व्याख्यान का काल कह सकते हैं। इस काल में यूरोप का संस्कृत से सामना होने पर तुलनात्मक पुराकथाशास्त्र, तुलनात्मक भाषाशास्त्र और तुलनात्मक धर्म जैसे नए प्रस्थान निर्मित हुए, जिनसे संसार का ज्ञानात्मक मानचित्र पूरी तरह से बदल गया। इक्कीसवीं शताब्दी वास्तव में संस्कृत की नवीन संभावनाओं और नवोन्मेष का काल है। इस काल में संस्कृत अपने आप को फिर से पहचान रही है, इस भूमंडल पर उसका एक नया अवतार हो रहा है।

इस समय हर महीने संस्कृत में सौ से ज्यादा मौलिक और नए विषयों पर लिखीं पुस्तकें छप जाती हैं। राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान द्वारा प्रकाशित ‘आधुनिकसंस्कृतसाहित्यसन्दर्भसूची’ का 2012 में दूसरा संस्करण छपा, जिसमें पांच हजार से अधिक मौलिक संस्कृत ग्रंथ उल्लिखित हैं, जो 1900 से 2011 तक की अवधि में लिखे गए तथा प्रकाशित हुए। ऐसे ग्रंथों की वास्तविक संख्या इससे कई गुना अधिक है, क्योंकि कोई भी संदर्भ सूची सर्वथा परिपूर्ण कभी नहीं हो सकती। इस समय पचास से अधिक ऐसे श्रेष्ठ साहित्यकार संस्कृत में सर्जन कर रहे हैं, जिनकी गिनती विश्व के श्रेष्ठ साहित्यकारों के साथ की जा सकती है। संस्कृत में इस समय शताधिक पत्र-पत्रिकाएं नियमित प्रकाशित हो रही हैं।

इनमें दैनिक अखबार भी हैं, साप्ताहिक और पाक्षिक भी हैं, तथा मासिक और त्रैमासिक पत्रिकाएं भी हैं। हमारे समय में भास, कालिदास, शूद्रक, विशाखदत्त, भवभूति आदि महाकवियों की नाट्यकृतियों के साथ संस्कृत के नए नाटककारों की कृतियां रंगमंच पर बड़ी मात्रा में प्रस्तुत हो रही हैं। संस्कृत रंगमंच की विश्वनाट्य में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका इन प्रयोगों से रेखांकित की जा रही है। आज प्रतिवर्ष देश के विभिन्न नगरों में ‘संस्कृतकविसमवायों’ का आयोजन होता है। संस्कृत में लिखी जा रही नई कविता समझी और सराही जाती है। संस्कृत में वे गद्य और पद्य में रचना करते हैं, संस्कृत में वहां व्याख्यान दिए जाते हैं, काव्य लिखे जाते हैं।

संस्कृत द्वारा आज संसार में नए युग का निर्माण संभव है। संस्कृत द्वारा एक शांतिमय, सौहार्दमय और सद्भावयुक्त नए संसार की रचना की जा सकती है। संस्कृत का ज्ञान जहां-जहां पहुंचा, वहां-वहां उसने सार्थक परिवर्तन की दिशाएं खोलीं। अत: संस्कृत से युगांतर संभव है।

संस्कृत की ज्ञानपरंपराओं से शक्ति लेकर जो नए प्रस्थान विश्वपटल पर उभर रहे हैं उनमें दो का विशेष उल्लेख का जा सकता है। एक है संगणकीय (कंप्युटेशनल) संस्कृत और दूसरा संस्कृत रंगमंच। 1985 में नासा के कंप्यूटर वैज्ञानिक रिक ब्रिग्स ने घोषणा की कि कंप्यूटर के कृत्रिम अवबोध (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के लिए जिस भाषा की जरूरत है, वह संस्कृत हो सकती है। ब्रिग्स ने दो शोधपत्र भी संस्कृत की ज्ञान परंपराओं- विशेष रूप में पाणिनि की व्याकरणात्मक कोटियों और नव्यन्याय की अभिव्यक्ति प्रणाली के आधार पर अपने मंतव्य की पुष्टि में प्रकाशित किए। मशीनी अनुवाद के जो पैकेज संस्कृत व्याकरण की सहायता से हाल ही में बनाए गए हैं, उनसे लगता है कि इस दिशा में और भी संभावनाएं हैं।

इन संभावनाओं और उनकी चरितार्थ होने की प्रक्रिया के चलते संस्कृत के सामने चुनौतियां और खतरे भी हैं। बड़ा खतरा उस उपनिवेशवादी नजरिए का है, जो आजादी के बाद और ज्यादा फल-फूल रहा है। एक खतरा संस्कृत को माल्यार्पण और अक्षत-चंदन वाली मानसिकता से भी है, जो उसकी समकालीनता और तेजस्विता से कन्नी काटती है। संस्कृत के लिए बड़ी चुनौती सारे देश की एकमात्र संपर्क भाषा बना दिए जाने या राजकाज की भाषा बन जाने के थोथे और प्रवंचक प्रलोभन को ठुकरा कर इस देश के बहुभाषी परिदृश्य में अपनी जगह हासिल करने की है। यह भी उतना ही सत्य है कि संस्कृत में एक अंतर्निहित सर्जनात्मकता और जिजीविषा है, जो उसे इन खतरों और चुनौतियों से उबारती रहेगी।

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