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मुद्दा: बदरंग होते गांव

आज का सबसे भयावह संकट यह है कि कृषि योग्य भूमि का रकबा बहुत तेजी से घटता जा रहा है। अब एक नगर से दूसरे नगर को जोड़ने वाले राजगार्मों के दोनों तरफ भी उद्योग-व्यवसाय और आवासीय इमारतें पसरती जा रही हैं, जिसके चलते सड़कों के किनारे की फसलों की स्वाभाविक हरित पट्टियां अनुपस्थित होती जा रही हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

सुधीर विद्यार्थी

विगत कुछ दशकों से रचनाकारों का ग्रामीण जीवन से रिश्ता छीजा ही नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर टूटा है। गांवों से नगरों और फिर महानगरों की ओर पलायन इसका सबसे बड़ा कारक है। शहर चले गए लोगों की वह खेती लायक जमीन भी बिक-चुक गई, जिससे कभी उनका मिट्टी का रिश्ता रहा आया था। जो लेखक गांव में पले-बढ़े थे, उनके लिए भी शहर पहुंचने के बाद गांव एक नॉस्टेल्जिया भर रह गया, जो उनके सपने में जीने और भावुक होने का मामला बना रहा। स्मृतियों में रहा-बचा गांव यथार्थ में अब कहीं नहीं है। अब वह एकदम बदले और विरूपित रूप में हमारे सम्मुख विद्यमान है, जिसे शहरों के अपार्टमेंट्स में रह कर समझा नहीं जा सकता।

हालांकि आजादी के बाद देर तक गांवों में सामंती ढांचे के अवशेष बने-जमे रहे, जिनके टूटने-दरकने में काफी समय लगा। पर यह टूटन अनेक मायनों में सार्थक नहीं रही। इसे सबसे पहले तो इस रूप में देखा-समझा जा सकता है कि गांव-समाज बुरी तरह विघटित ही नहीं, बल्कि अनुपस्थित हुआ है। पूंजी और बाजार की दखलंदाजी से गांव अब पहले जैसे इकाई के तौर पर नहीं रहे। उनकी आत्मनिर्भरता खत्म हुई है। वे भी धीरे-धीरे नगर और महानगरमुखी होकर पराश्रित हो गए। वे अपने जीवन-यापन के मामले में भी पराधीनता का शिकार हुए। एक तरह से यह उनका स्पंदनहीन हो जाना है। संसदीय चुनावी राजनीति ने गांवों को अत्यंत बेदर्दी से जिस तरह निगलना और बदरंग करना शुरू किया, वह सचमुच पीड़ादायक है। सामंती ढांचा मिटा नहीं, बल्कि वह तब्दील होकर राजनीतिक दलों की बुनावट और सांचे-ढांचे में बहुत निर्लज्जता से ढलता-समाता चला गया। आज गांव राजनीतिक शत्रुता के हिंस्र अखाड़ों और शराबखोरी-मुकदमेबाजी के सबसे बड़े टापुओं में तब्दील हो गए हैं। शहर में बैठे कथाकार के लिए दूर से इस बदले गांव के यथार्थ कोे पकड़ पाना सचमुच कठिन होता जा रहा है। गांवों में पहले भी जातियां थीं। सवर्ण और दबंगों का शोषण-दमन था, जो कमोबेश लंबे समय तक जाति-संघर्ष और जातीय शोषण के तौर पर बना रहा। धीरे-धीरे उसका चेहरा-मोहरा बदला। वोट की राजनीति ने जाति के आधार पर शोषितों-उत्पीड़ितों के भीतर नई चेतना का संचार किया। उनमें स्वयं के मनुष्य होने का भाव जागृत हुआ। उन्होंने सामंती वर्चस्व को तोड़ा। वे अपने अधिकारों के लिए उठ खड़े होने के रास्ते पर चल दिए। लेकिन इस स्थिति ने भी गांवों का बहुत भला नहीं किया। मसलन, जातिगत वैमनस्य और राजनीतिक खेमेबाजी की बुनियाद बेहद विषाक्त होती चली गई, जो किसी भी तरह ग्रामीण जीवन के नवनिर्माण के लिए उर्वर नहीं हो सकी। राजनीति में पहले जातियों का इस्तेमाल और बर्चस्व बढ़ा तो लगा कि यह जातिविहीन समाज के निर्माण के सपने को सार्थक और जीवंत करने का जरिया बनेगा, लेकिन दुर्भाग्यवश वैसा नहीं हो सका। जातिविहीन समाज के बनने की अवधारणा एक यूटोपिया ही बनी रही।

शहरों के अनाप-शनाप और उसके अनियोजित विकास के दैत्य ने विगत डेढ़-दो दशकों में ही कितने गांवों को निगल लिया, इसका मीजान लगाने का न किसी के पास समय है और यह सब समाज के नीति-निर्धारकों की चिंता के दायरे में भी नहीं आता। गांव के दुश्मन वे भवन निर्माता हैं, जो उनकी जमीनों को लगातार अजगर की मानिंद निगलते जा रहे हैं। इसका एक कारण यह भी है कि खेती-माटी के प्रति पहले जैसा मोह और लगाव किसानों के भीतर नहीं रहा-बचा, सो ऊंची कीमत मिलने पर उससे अपना रिश्ता तोड़ने में उन्हें कतई संकोच नहीं होता। गांव पहले इकाई थे। किसानी अपने जीवन-जरूरत की चीजें स्वयं उपजाती थी। धीरे-धीरे पैसे का महत्त्व बढ़ा और नकदी फसलों का चलन रूझान में आता गया। खेती-किसानी की जरूरत की चीजें कस्बे और शहरों से खरीद कर लाई जाने लगीं। गांवों की आत्मनिर्भरता के क्षतिग्रस्त होने का यह सबसे बड़ा कारण था। अब सोचिए कि एक गांव की कई फसली उपजाऊ धरती बिक कर जब शहर की सीमा में समा कर पलक झपकते अपनी छाती पर कंक्रीट का जंगल खड़ा कर लेती है, तो यह सिर्फ एक गांव और उसकी देहाती बस्ती का नष्ट हो जाना नहीं है, बल्कि उस गांव का रहन-सहन, रीति-रिवाज, वहां का लोक जीवन, गीत-गवनई, कथा-किस्से, खलिहान, अखाड़े, खान-पान, उनके लोक देवताओं के पूजा-थान, पालतू पशुओं के रंभाने की आवाजें, उनके बाड़े, खुरों के निशान, गोधूलि सब कुछ नष्ट हो जाता है, जिसकी भरपाई किसी तरह संभव नहीं।

शहरों के विकास का एक प्रतिबिंब यह भी है कि विस्तारित होती शहरी बस्तियों के बाहर बाईपास के निर्माण का सिलसिला इधर एक दशक से बेहद तेजी के साथ बना-पनपा और संचालित हुआ है। शहर के बाहर बनने वाले इन चमकीले और चौड़े मार्गों के निर्माण का फैसला और घोषणाएं बाद में होती हैं, लेकिन उससे पहले ही अपनी साठ-गांठ के चलते बिल्डरों और कॉलानाइजरों को इसका पता चल जाता है और वे औने-पौने दामों में किसानों की जमीनें खरीदना शुरू कर देते हैं। किसान इस मुुनाफे और षड्यंत्र से बेखबर रहा होता है और अंतत: ठगा जाता है। आज का सबसे भयावह संकट यह है कि कृषि योग्य भूमि का रकबा बहुत तेजी से घटता जा रहा है। अब एक नगर से दूसरे नगर को जोड़ने वाले राजगार्मों के दोनों तरफ भी उद्योग-व्यवसाय और आवासीय इमारतें पसरती जा रही हैं, जिसके चलते सड़कों के किनारे की फसलों की स्वाभाविक हरित पट्टियां अनुपस्थित होती जा रही हैं। खेत और खेती पर यह नए ढंग का संकट है, जिसकी ओर किसी का ध्यान नहीं है। छोटे किसान की किसी को चिंता नहीं है। उसे बचाने और संरक्षण देने का मकसद भी सत्ता-व्यवस्था और किसी राजनीतिक दल के पास नदारद है। फसल पैदा होने के बाद उसके मंडी (समितियों) तक पहुंचने-पहुंचाने तक भी बिचौलियों का साम्राज्य छोटे किसान की रीढ़ तनने नहीं दे रहा। हरी सब्जियां तक पॉलिथिन में पैक होकर अब मॉल में बिकने लगी हैं। नकदी फसलों के मोह ने गांव की अर्थव्यवस्था को चौपट कर दिया है। पुराना ढांचा टूटा, लेकिन नया निर्मित नहीं हो पाया। यह त्रासदी है गांवों की। हिंदी कथा संसार इसे ठीक ढंग से पकड़ नहीं पा रहा है। वहां शहरी जीवन के प्रतिबिंबन के पीछे यही है कि रचनाकार शहरवासी ही नहीं हुआ, बल्कि वह शहरी संस्कृति में इस कदर रच-बस गया है कि गांव अब उसके लिए पूरी तरह उपेक्षणीय और गैरजरूरी हो चुके हैं।

गांव में आज भी सघन अंधेरा है, जिससे उसे निकाल पाना बिजली के खंभों के बूते का तो बिल्कुल नहीं है। कथा-कहानी ही नहीं, फिल्मों में भी ग्रामीण जीवन के दृश्य पूरी तरह अनुपस्थित हो चुके हैं। नई पीढ़ी का गांव के प्रति आकर्षण खत्म हो चुका है। चमक-दमक और रंगीनी ही आधुनिकता और प्रगति का पर्याय बन चुकी है। ऐसे में गांव की तस्वीर पूरी तरह श्रीहीन और भयावह दिखाई पड़ रही है। एकदम बदरंग और दयनीय। धुंधलाते चित्रों की ओर देखना कोई पसंद नहीं करता। देहाती खुरदरा जीवन किसी कोे नहीं मोहता। गांवों से शहरों की ओर पलायन को अनेक स्तरों पर चीन्हा जा सकता है। पढ़ी-लिखी नई पौध गांव में रहना नहीं चाहती। उसके लिए वहां अवसर भी नहीं हैं और उनके भीतर उस कठोर जिंदगी को जीने की इच्छाशक्ति भी पराजित हो चुकी है, जिसे कभी उसके पुरखों ने जिया था। गांव अब सुख-चैन या शांति की जगहें भी नहीं रहीं। वहां झगड़े-झंटे और व्यर्थ के वैमनस्य हैं। यही कारण है कि ग्रामीण जीवन की थाने-अदालतों में आवाजाही और उनका हस्तक्षेप अधिक बढ़ा है। सुलह-समझौतों और जीवन की सहभागिता का क्षरण इसके लिए जिम्मेदार है। हमारी बेशुमार और बेलगाम होती जीवन लालसाओं ने भी गांवों की शांति भंग की है। गांव अब सिर्फ खेतों के मध्य कुछ कच्चे और ज्यादा पक्के घरों की आबादी भर रह गए हैं जहां जीवन-रस पूरी तरह सूख-निचुड़ चुका है।

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