ताज़ा खबर
 

चर्चा: पीड़ा से मुक्ति की राह, कसौटी पर इच्छा-मृत्यु

यह बहस लंबे समय से चल रही थी कि अगर कोई व्यक्ति बीमारी की हालत में पीड़ा के चरम से गुजर रहा हो और उसके इलाज की कोई गुंजाइश नहीं बची हो, तो उसके जीवन के बारे में क्या तय किया जाए! हमारे समाज में ज्यादातर लोग जिस तरह की संस्कृति में पले-बढ़े हैं, उसमें उनकी भावनाएं अपने किसी प्रियजन को लगभग मृत स्थिति में जीवन रक्षक प्रणाली पर निर्भर देखने को बाध्य करती हैं, लेकिन उनकी मृत्यु के बारे में सोचना उन्हें अच्छा नहीं लगता। दूसरी ओर, दुख की अति को लाचार देखने और निश्चित मौत का इंतजार करने की स्थिति में पीड़ित को इच्छा-मृत्यु देने के पक्ष में भी राय बन रही थी। इसी जटिल मसले पर हाल में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले से तस्वीर को एक तरह से साफ करने की कोशिश की। इसी पर केंद्रित इस बार की चर्चा - संपादक

Author March 18, 2018 4:01 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

अभिषेक कुमार सिंह

साबरमती आश्रम में लाइलाज बीमारी से जूझते बछड़े के जीवन-मृत्यु का सवाल उठा और यह साबित हो गया कि उसे जीवित रखना संभव नहीं है, तो गांधी जी ने कहा कि उस जीव की मृत्यु का प्रबंध करना असल में उसे तमाम कष्टों से निजात दिलाना होगा। हकीकत में ऐसा किया भी गया और जब इसके लिए गांधी जी की आलोचना हुई, तो उन्होंने अक्तूबर, 1928 के नवजीवन (गुजराती) में लिखा- ‘मेरी मौजूदगी में डॉक्टरों ने बछड़े को जहरीला इंजेक्शन दिया और सारी प्रक्रिया दो मिनट से कम में समाप्त हो गई। प्रश्न है कि क्या मैं लाइलाज बीमारी से जूझते किसी इंसान के प्रसंग में ऐसी ही प्रक्रिया (इच्छा-मृत्यु) के पक्ष में होऊंगा। और क्या मैं खुद पर ऐसा ही नियम लागू करना पसंद करूंगा। मेरा जवाब है- हां। ठीक उसी तरह जैसे एक डॉक्टर आॅपरेशन करते वक्त जब मरीज के शरीर पर तेज धार वाले चाकू का इस्तेमाल करता है और वह हिंसा नहीं कहलाता, वैसे ही यदि किसी के लिए जीवन मृत्यु से अधिक कष्टदायक हो तो उसे इस कष्ट से मुक्ति दिलाना हिंसा नहीं है।’

गांधी जी के इन विचारों के नवजीवन में प्रकाशन के नब्बे साल बाद कष्टों से निजात दिलाने वाली मृत्यु की नैतिकता का प्रश्न एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल में उस याचिका पर फैसला सुनाया है जिसमें मरणासन्न व्यक्ति द्वारा इच्छा-मृत्यु के लिए लिखी गई वसीयत (लिविंग विल) को इजाजत दी गई है। यह अनुमति एक प्रकार से पैसिव यूथेनेशिया (यानी मौत की तरफ बढ़ते व्यक्ति को इलाज समेत जीवित रखने के सभी प्रयासों को उसकी इच्छा के अनुरूप बंद कर देना) है। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाले पांच जजों के संविधान पीठ ने इसकी इजाजत देते हुए स्पष्ट किया है कि कोई मरणासन्न व्यक्ति पहले से ही सचेतावस्था में ऐसी वसीयत लिख सकता है, जिसमें वह अग्रिम निर्देश दे सकता है कि उसके जीवन को जीवन रक्षक प्रणाली पर लगाकर खींचा न जाए। एक गैर सरकारी संगठन- कॉमन कॉज ने वर्ष 2005 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा था कि संविधान की धारा-21 के तहत जिस तरह नागरिकों को जीने का अधिकार दिया गया है, उसी तरह उन्हें मरने का भी अधिकार है। इस पर हालांकि केंद्र सरकार ने पहले कहा था कि इच्छा-मृत्यु की वसीयत लिखने की अनुमति नहीं दी जा सकती, लेकिन मेडिकल बोर्ड के निर्देश पर मरणासन्न की जीवन रक्षक प्रणाली हटाई जा सकती है। सुनवाई के सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट का संविधान पीठ पहले सवाल उठा चुका है कि क्या किसी व्यक्ति को उसकी मर्जी के खिलाफ कृत्रिम जीवन प्रणाली पर जीने को मजूबर किया जा सकता है? जब सम्मान से जीने को अधिकार माना जाता है तो क्यों न सम्मान के साथ मरने को भी अधिकार माना जाए?

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि आजकल समाज में वृद्ध लोगों को बोझ समझा जाता है। अमदाबाद में कुछ समय पहले एक बेटे ने अपनी बीमार वृद्ध मां को छत से धकेल कर ऐसा ही उदाहरण पेश किया था। ऐसे में इच्छा-मृत्यु की कानूनी इजाजत में कई दिक्कतें रही हैं। कॉमन कॉज के वकील प्रशांत भूषण ने कहा था कि गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों को ‘लिविंग विल’ बनाने का हक होना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया था कि वह एक्टिव यूथेनेशिया की वकालत नहीं कर रहे, जिसमें लाइलाज मरीज को इंजेक्शन देकर मारा जाता है। हमारा संविधान जीवन का पक्षधर है और किसी भी रूप में मृत्यु की वकालत नहीं करता। मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने याचिका का विरोध किया था और सरकार की तरफ से अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने साफ किया था कि एक तो हमारे देश में इच्छा या दया मृत्यु को कोई कानूनी दर्जा हासिल नहीं है और इसे खुदकुशी माना जाता है। दूसरे, यदि इसका अधिकार दिया गया तो इसके दुरुपयोग की आशंका अधिक है। इच्छा मृत्यु की आवश्यकता से जुड़े दो पहलू ऐसे हैं, जिन्हें लेकर दुनिया के कई देशों में दुविधा की स्थिति रही है। इस बारे में पहला सवाल यह है कि क्या इच्छा-मृत्यु स्वैच्छिक रूप से की गई आत्महत्या है, और दूसरी दुविधा यह कि कहीं यह अनैच्छिक रूप से दूसरों के हाथों की गई हत्या तो नहीं है। इसमें दो राय नहीं कि मृत्यु की मांग खुद में एक जटिल प्रश्न है। इसे यह कह कर खारिज किया जा सकता है जो चीज मनुष्य दे नहीं सकता, उसे छीनने का अधिकार सिवाय प्रकृति के किसी को नहीं है।

भारत जैसे देश के संबंध में यह एक सामाजिक मुद्दा भी है। इच्छा-मृत्यु की इजाजत मिलने का एक खतरा यह भी है कि तब आत्महत्या के इच्छुक लोग इसकी आड़ में अपनी जिंदगी खत्म कर सकते हैं। यों तो चिकित्सा विज्ञान बेहोशी में पड़े लोगों के जीवन में कभी भी लौट आने की संभावना से इनकार नहीं करता, लेकिन इन तर्कों के बावजूद इसका एक पक्ष यह है कि जिस स्थिति में पहुंच चुके लोगों के लिए मृत्यु का अर्थ मरना नहीं, कष्टकर और असाध्य स्थितियों से छुटकारा पाना है, उसमें वे मौत को एक समाधान की तरह देखते हैं।
इच्छा-मृत्यु के प्रसंग में मुंबई की नर्स अरुणा रामचंद्र शानबाग के बेहद चर्चित मामले का उल्लेख करना प्रासंगिक होगा, जिनकी ओर से वकील पिंकी विरानी ने वर्ष 2009 में सुप्रीम कोर्ट को यह अर्जी दी गई थी कि अदालत उनके जीवन का अंत करने की इजाजत दे। करीब चार दशक पहले अरुणा के साथ मुंबई के उस अस्पताल में क्रूरतापूर्ण ढंग से बलात्कार किया गया था, जहां वह नर्स थीं। इस हादसे के कारण अरुणा को लकवा मार गया और वह अपनी आवाज खो बैठी थीं। लेकिन स्वाभाविक मृत्यु होने तक चार दशकों के दौरान डॉक्टरों और नर्सों ने नली से तरल भोजन देकर अरुणा को जिलाए रखा, जबकि उनकी हालत में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं थी। हालांकि उस वक्त इस पर अदालत में स्पष्ट राय नहीं बन सकी और इस बीच शानबाग का निधन हो गया।

जहां तक स्वेच्छा से मृत्यु को कानूनी जामा पहनाने का सवाल है, तो बहुस्तरीय भारतीय समाज में ऐसा कर पाना आसान नहीं रहा है। इसका सबसे जटिलतम पहलू यही बताया गया कि कानूनन ऐसी छूट देने पर इसका गलत फायदा न उठाया जाने लगे। बहरहाल, अब जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कई चीजें स्पष्ट कर दी हैं, उनके मद्देनजर कहा जा सकता है कि अदालत को इससे जुड़ी आशंकाओं का अहसास था। मुमकिन है कि आगे चल कर इस विषय पर समाज और कानून की राय अलग-अलग ही रहें, पर इसके विरोधियों को इस पर अवश्य विचार करना होगा कि अगर किसी वजह से एक मनुष्य की जीने की ललक और ऊर्जा खत्म हो जाती है और मृत्यु उसे जीवन से बड़ी और मुक्त करने वाली प्रतीत होती है, तो ऐसे व्यक्ति को इच्छा मृत्यु की दी जाने वाली छूट न तो अनैतिक है और न ही यह धर्मविरुद्ध कहलाएगी। जब कोई व्यक्ति दिमागी रूप से सक्रिय है, लेकिन उन लाइलाज बीमारियों के कारण भयंकर पीड़ा झेल रहा है जिनमें सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है, तो उसकी ऐसी मांग पर अवश्य विचार किया जाना चाहिए।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App