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परीदेश की राजकुमारियां

हममें से ज्यादातर को बचपन में सुनी परी देश की राजकुमारियों या अन्य राजकुमारियों की कहानियां याद होंगी।

आज बड़ों को शिकायत है कि बच्चे कहानियां सुने बिना बड़े हो रहे हैं। शायद यह भला ही है कि वे इन कहानियों को नहीं सुन रहे। कम से कम उनके दिमाग को अनुकूलित किए जाने का यह रास्ता कुछ कमजोर पड़ा है, हालांकि दूसरी तमाम चीजें इसका स्थानापन्न बनाती हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

हममें से ज्यादातर को बचपन में सुनी परी देश की राजकुमारियों या अन्य राजकुमारियों की कहानियां याद होंगी। कितनी सुंदर थीं वे कि कोई भी देखता रह जाए, कितनी नाजुक थीं वे कि फूल भी शरमा जाएं, कितनी गुणवंती कि कितना भी काम करवा लो, कितनी नेक कि कोई भी बहला-फुसला कर राह भटका दे! हमारे मन मस्तिष्क में स्त्री के सौंदर्य का पहला बिंब उन्हीं से तैयार होता है और इतने गहरे पैठता है कि उससे मुक्त होना आसान नहीं रह जाता। तब भी नहीं, जबकि आप एक लेखक बन चुके होते हैं! स्त्री असमानता को लेकर रचे गए इस मोहक पाठ से मुक्त होना तब भी मुश्किल होता है, इसलिए अधिकतर लेखक इस गड़बड़झाले के शिकार होते हैं और स्त्री पात्रों के आते ही अपने लेखन में चुपके से असमानता के इसी पाठ के प्रमोटर बन जाते हैं।

जाहिर है कि नानी की कहानियों ने हमारी कल्पनाशक्ति बढ़ाने में मदद की है, जो कि कहानी सुनाने के पीछे सदा एक उद्देश्य की तरह रहा ही है। नतीजा, बचपन में कई बार हम खुद भी इन कहानियों को आगे बढ़ाने में बढ़-चढ़ कर भाग लेने लगते रहे हैं, कुछ न कुछ जोड़ते जाते, कहानी खिलती जाती, इस तरह कहानी कहने का हमारा भी एक हुनर प्रशंसा पा जाता। लेकिन बिना यह जाने कि आगे बढ़ाने की इस प्रक्रिया में हम कौन सी चीजें, कौन से विचार आगे बढ़ा रहे हैं! कौन सी थाती हमें ऐसे अनजाने थमा दी गई है, जिसे आगे ट्रांसफर करते जाने की जिम्मेदारी बिना किसी के कहे हंसते-हंसते हम उठाते चले जाते हैं!

क्या इन कहानियों ने बचपन में आपको दुखी नहीं किया? मुझे तो बचपन में इन कहानियों ने खूब रुलाया था, कितनी रातों की नींद छीनी थी, कितने प्रश्नों ने मथा था, कितना बेचैन और असंतुष्ट बनाया था, लेकिन न किसी को इसकी फिक्र थी न प्रश्नों के उत्तर ही थे। ‘कहानी गई वन में, सोचो अपने मन में’ वाले अंदाज में सिर्फ सोचना हाथ आता। सोचने में बड़ा दुख होता, जब दिखता कि परी देश की राजकुमारियां हों या अन्य राजकुमारियां, जब भी अकेले बाहर निकली हैं, राक्षसों या असामाजिक तत्त्वों ने उन्हें कैद कर लिया है। उनका अकेले बाहर निकलना निषिद्ध है, यह बात कितने प्यार से समझा दी गई है। जो नहीं मानता, ‘वो रोए अपने मन में, किलसे अपने घर में!’

तो, ये प्यारी-प्यारी राजकुमारियां अकेले सैर पर निकलने का या दुनिया जान लेने के लिए घर से बाहर निकलने का जोखिम लेती हैं और पकड़ी जाती हैं, दंडित तो होना होगा, नियम जो तोड़ा है उन्होंने। ‘दुस्साहस’ शब्द स्त्री के लिए नहीं बनाया गया था! ये कहानियां लड़कियों के मन में डर भरने का बारीक मनोविज्ञान हैं। जब भी लड़कियां बाहर निकलेंगी, उन्हें वह डर याद आएगा, जो बचपन में ही समझा दिया गया था। इतने मोहक तरीके से समझा देने का कोई और माध्यम शायद है भी नहीं! और अब, जब कि वे कैद में हैं तो उन्हें उस दिए गए जबर्दस्त फार्मूले को याद करना होगा- किस्मत! किस्मत है, तो कोई राजकुमार आएगा और उन्हें मुक्त कराएगा! न आया तो फिर उसी किस्मत का दोष! पता नहीं हजारों मामलों में किसी एक में राजकुमार आ भी जाता हो! फिलहाल उसके बाद की कहानी की जरूरत नहीं होती। क्योंकि राजकुमार के हाथों मुक्त होने के बाद और क्या चाहिए?

सोती सुंदरी की कहानी बहुत प्यार से बताती है कि एक राजा-रानी के यहां बहुत समय से संतान नहीं हुई। फिर कन्या हुई, जिसे पाकर वे खुश हुए, कम से कम किन्हीं परिस्थितियों में तो कन्या को पाकर खुश होना है। राजा ने दावत में सात परियों को बुलाया, लेकिन बूढ़ी परी छूट गई। बूढ़ी होकर वह इतनी उपेक्षित हुई कि दावत के निमंत्रण के समय राजा उसे भूल गए! बूढ़ी स्त्री अपनी उपादेयता खोकर चिड़चिड़ी हो जाए तो कुछ अस्वाभाविक भी नहीं। लेकिन वह तो प्रतिशोध पर उतर आई। यानी जो इस समाज के काम का नहीं, उसे निमंत्रित करने में भूल होना बड़ी बात नहीं, दूसरे वह खल पात्र ही होगा, स्त्री हुई तो कुटिल कुटनी। बूढ़ी परी भी ऐसी ही दिखती है, न्याय पक्ष को समलत बनाती हुई। वह शाप देती है कि नन्ही राजकुमारी की अंगुली में तकुआ चुभ जाएगा और वह मर जाएगी।

हांलाकि सातवीं परी उसके शाप को कुछ कमजोर कर देती है, तथापि समाज के उपेक्षित हिस्से का शाप भय तो पैदा करता ही है, तभी तो राजा उससे डरता है, कहानी भी यही बताती है।
इसलिए राजा पूरे राज्य में चरखे पर प्रतिबंध लगा देता है। प्रश्न उठता है कि चरखा बंद करा कर राजा ने कितने बड़े हिस्से को बेरोजगारी की सौगात दी? उन लोगों का खर्चा-पानी कैसे चलता रहा, जिनके व्यवसाय बंद करा दिए गए? इसका जवाब मुझे आज तक नहीं मिला। फिर भी राजकुमारी के सोलह वर्ष के होते ही उसके हाथ में तकुआ चुभा और वह बेहोश हुई। इसका मतलब चुपके-चुपके चरखा चलाया जा रहा था, बुनाई-कताई जारी थी, ठीक राजा की नाक के नीचे, उन्हीं के महल में चरखा था! यानी राजा ने अपनी सुविधा नहीं खोई थी! महलवालों के कपड़े तैयार किए जा रहे थे! जादू से चरखा आ गया, जैसी बात बेकार होगी। लेकिन राजकुमारियों के लिए यह सीख जरूर है कि रोजगार सीखने की कोशिश न करना, वरना ऐसे ही सौ वर्ष तक सुला दी जाओगी!
तो राजकुमारी सो गई, वह भी सौ वर्षों के लिए। सौ वर्ष कोई मामूली समय नहीं होता। यह समय बच्चों को कितना बेचैन बनाता है। यह कुछ ज्यादा लंबा है, पर समाज को देखें तो बिल्कुल लंबा नहीं! समाज में स्त्री के लिए तय भूमिकाओं में परिवर्तन की यही गतिकी है शायद! सौ वर्ष की नींद है या दिमाग का बंद कर दिया जाना है! सारा महल राजकुमारी की नींद के साथ ही नींद में चला गया है। या राजकुमारी के लिए ‘सो गए’ जैसा हो गया है। नींद में कही गई, सुनी गई बातों का क्या अर्थ! ध्यान रहे कि राजकुमारी उस उम्र में सुला दी गई है, जो संभावनाओं की सबसे चमकती उम्र है। इसके बाद नींद ही है, जहां से व्यवस्था जारी रखी जा सकती है।

चलिए, आखिर सौ साल बाद ही सही, एक राजकुमार शिकार खेलता, महल के जंगल-झाड़ियां साफ करता, रास्ता बनाता, शौर्य के भरपूर प्रदर्शन के साथ दाखिल होता है। इस सोती सुंदरी का जीवन भी बिना राजकुमार के आए नींद से नहीं जग पाता! जैसा कि भारतीय राजकुमारियों के साथ था। इनके पास अपने को बचाने की न कोई तरकीब है, न तैयारी, न दिशा, सिर्फ दंड का भय है! और एक सपना, यह सपना कितनी कोमलता से इन्हें थमाया गया है, यही एकमात्र तय रास्ता है- किसी राजकुमार की प्रतीक्षा! यह प्रतीक्षा भी किस्मत से जुड़ी हुई है। ‘किस्मत’ एक फार्मूला है, जो नींद में पंहुचाने और फिर जगाने, दोनों स्थितियों में काम का है।
आज बड़ों को शिकायत है कि बच्चे कहानियां सुने बिना बड़े हो रहे हैं। शायद यह भला ही है कि वे इन कहानियों को नहीं सुन रहे। कम से कम उनके दिमाग को अनुकूलित किए जाने का यह रास्ता कुछ कमजोर पड़ा है, हालांकि दूसरी तमाम चीजें इसका स्थानापन्न बनाती हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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